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डॉक्टर यूं ही स्ट्राइक नहीं करते... उनकी मजबूरी भी जान लीजिए

सोशल मीडिया पर डॉक्टर्स कुछ कह रहे हैं, जिसे सुनने की जरूरत है.

FP Staff Updated On: Mar 24, 2017 01:39 PM IST

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डॉक्टर यूं ही स्ट्राइक नहीं करते... उनकी मजबूरी भी जान लीजिए

महाराष्ट्र में सामूहिक छुट्टी पर गए 4,000 डॉक्टर वापस अपने काम पर लौट गए हैं. चार दिन चले इस छुट्टी विरोध का कोई हल नहीं निकला है. खास बात ये भी है कि ये विरोध तब खत्म हुआ, जब कोर्ट की तरफ से डॉक्टरों के 6 महीने की सैलरी काटने की बात कही गई.

पहली बार डॉक्टरों की तरफ से इतने बड़े स्तर पर किए गए इस विरोध के बाद देशभर के डॉक्टर अपना विरोध जता रहे हैं. सोशल मीडिया पर एक्टिव कुछ डॉक्टरों ने इस मुद्दे पर अपने विचार रखे हैं और डॉक्टरों की परेशानियों को सबके सामने रखा है, जिन पर इस बहस में कहीं कोई नामलेवा नहीं है.

फेसबुक पर एम्स के पूर्व डॉक्टर हैं अव्यक्त अग्रवाल. उन्होंने अपनी वॉल पर डॉक्टरों की जिंदगी का स्याह पक्ष दिखाया है. इस सर्वव्यापी बहस में उन मुद्दों पर एक बार नजर डालना जरूरी है, जिसपर कोई बहस नहीं हो रही.

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हम डॉ. अव्यक्त अग्रवाल और उन जैसे कई डॉक्टरों के पोस्ट को हम जैसे का तैसा रख रहे हैं:

आपमें से बहुत कम लोग जानते हैं कि तीन साल की MD या MS की कठिन ट्रेनिंग में खासकर पहले वर्ष में प्रतिदिन औसत 4 घंटे की नींद भी उन युवा चिकित्सकों को नहीं मिल पाती.

बीमारी,डिप्रेशन भी कुछ युवा चिकित्सकों को इस दौरान घेर लेता है. गाइनिक में MS करने वाली लड़कियां तो आए दिन रोती मिलेंगी. 23 से 30 वर्ष के ये युवा कमरे में आंसू बहाते मिल जाएंगे. एम्स में प्रति 2 वर्ष एक सुसाइड आपको सुनने मिल जायेगा.

मेरे अनेक MD स्टूडेंट स्वाइन फ्लू, TB ,Dengue जैसी बीमारियों के शिकार हो चुके. हर सरकारी मेडिकल कॉलेज में होते हैं. खाना खाने का वक्त नहीं होता और कई बार घंटों पानी पीने तक का.

जहां मानवाधिकार एक हफ्ते में 40 घंटे काम की बात कहते हैं. वहीं ये चिकित्सक कई बार लगातार 90 घंटे की ड्यूटी करते हैं.

मीडिया को ,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को मैं एक अच्छा विषय दे रहा हूं. वादा करता हूँ बहुत TRp मिलेगी.

डॉ अव्यक्त के पोस्ट को शेयर करते हुए एमएलएन मेडिकल कॉलेज के एक डॉक्टर त्रिभुवन सिंह ने भी अपने अनुभव बांटे हैं.

मेरा खुद का रेजीडेंसी में लगातार 96 घण्टे काम करने का रिकॉर्ड है. एक काबिल डॉक्टर बनने के लिए जितना पढ़ना पड़ता है उसमें कोई भी व्यक्ति चार बार आईएएस या जज बन सकता है. फिर हाइकोर्ट में जज बनने के लाइन में लगे काबिल मित्र वकील का कहना है कि जज बनने के लिए ज्यूडिशियल टेम्परामेंट चाहिए, ज्ञान नही.

रेजीडेंसी में मैंने और मेरे सहयोगियों ने न जाने कितने गरीब मजलूम अनाथों की दवा दारू, खाना पीना और इम्प्लांट की व्यवस्था की थी मुझे आज भी याद है.

ये रेजिडेंट भी यही करते होंगे. या शायद बदल गए हैं?

इलाहाबाद के डॉ. अनुज गुप्ता लिखते हैं कि आपको दुनिया में लाने से लेकर आपको बीमारियों से बचाए रखने वाला डॉक्टर बस इसलिए बुरा हो जाता है क्योंकि वो आपसे आपके बुरे वक्त में पैसे ले रहा है? क्या उसका परिवार नहीं है? क्या उसकी प्राथमिकताएं नहीं हैं? हम भगवान नहीं हैं. लेकिन हम अपनी पूरी कोशिश करते हैं. डॉक्टरों में विश्वास रखिए.

महाराष्ट्र के डॉक्टर भले ही वापस लौट गए हों, लेकिन अभी भी अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं. एम्स के डॉक्टरों ने पिछले दिनों हेलमेट पहनकर मरीजों की जांच की. और महाराष्ट्र के डॉक्टरों ने भी विरोध का यही तरीका अपनाया है. इससे ज्यादा फिलहाल वो कुछ नहीं कर पा रहे. लेकिन जो भी है, प्रशासन की ओर से बड़ा और गंभीर कदम उठाने के लिए काफी है.

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