S M L

लोया प्रकरण में न्यायाधीशों पर आरोप लगाने पर महाराष्ट्र सरकार एक्टिविस्ट वकीलों पर बरसी

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी और अतिरिक्त सालिसीटर जनरल तुषार मेहता पर उंगलियां उठाई हैं

Bhasha Updated On: Mar 09, 2018 09:04 PM IST

0
लोया प्रकरण में न्यायाधीशों पर आरोप लगाने पर महाराष्ट्र सरकार एक्टिविस्ट वकीलों पर बरसी

महाराष्ट्र सरकार ने न्यायाधीश बी एच लोया की मृत्यु के मामले में कुछ एक्टिविस्ट वकीलों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में कुछ न्यायाधीशों पर कथित रूप से लांछन लगाने और उन्हें धमकाने के रवैये की शुक्रवार को तीखी आलोचना की और कहा कि न्यायपालिका और न्यायिक अधिकारियों को ऐसे कथनों से बचाने की आवश्यकता है.

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की तीन सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने कहा कि कुछ वकील बंबई उच्च न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीशों और जिला न्यायाधीशों पर उंगली उठा रहे हैं और अगर न्यायपालिका की इतनी बुरी हालत है तो फिर न्यायिक समीक्षा और न्यायिक सक्रियता का कोई मतलब ही नहीं है.

राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने पीठ से कहा, ‘कृप्या ऐसा होने की अनुमति मत दीजिए. यदि समूची व्यवस्था, जैसा कि आरोप लगाया गया है, एक व्यक्ति के इशारे पर चल रही है तो हमें इस संस्था को ही खत्म कर देना चाहिए. इसे तुरंत रोकने का समय आ गया है.’

साल्वे का यह तीखा हमला वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंह ओर वकील प्रशांत भूषण की ओर लक्षित था जिन्होंने न सिर्फ पीठ के सदस्य न्यायाधीशों के खिलाफ बल्कि इस मामले में सरकार का प्रतिनिधत्व कर रहे वकीलों पर भी आक्षेप लगाए थे.

साल्वे ने1978 की एक घटना को याद करते हुए कहा कि एक बार इसी न्यायालय में न्यायमूर्ति वाई वी चन्द्रचूड़ ने प्रख्यात विधिवेत्ता ननी पालखीवाला को ध्यान दिलाया था कि भाषण संसद में होते हैं, न्यायालय में नहीं.

साल्वे ने सुनवाई के अंतिम क्षणों में कहा, ‘मेरे40 साल के करियर के दौरान इस तरह के आक्षेपऔर आरोप कभी नहीं लगाए गए. यह दर्शाता है कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं. इस न्यायालय को इसे रोकना होगा. हमारी बार हर अवसर पर मामले को पेश करने के लिये आगे आई है. सार्वजनिक जीवन, संसद में भाषण अच्छे हो सकते हैं. यह हमारे ओर उनके बीच में नहीं है. यह कभी भी हमारे और उनके बीच में नहीं था. कृपया ऐसा होने की अनुमति मत दीजिए.’

खचाखच भरे प्रधान न्यायाधीश के न्यायालय कक्ष में खंडपीठ साल्वे की दलीलें सुनने के लिए शीर्ष अदालत के कामकाज के निर्धारित समय शाम चार बजे से 20 मिनट देर तक बैठी.

साल्वे बहस के दौरान दवे, जयसिंह और भूषण के उस आग्रह का हवाला दे रहे थे कि उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों सहित चार न्यायाधीशों, जो न्यायाधीश लोया के अंतिम क्षणों में उनके साथ थे, से पूछताछ की अनुमति दी जाये.

साल्वे ने अनेक सवाल उठाते हुये पूछा, ‘क्या ये चार न्यायाधीश हत्या की साजिश का हिस्सा हैं? क्या उन्होंने ही अपने सहयोगी( लोया) को खत्म कर दिया? इस मामले में जांच शुरू करने के लिये इस न्यायालय को किस स्तर का सबूत चाहिए? क्या न्यायाधीशों से जिरह की अनुमति दी जानी चाहिए? क्या हमें उनकी विश्वसनीयता पर संदेह करने की आवश्यकता है? क्या हमारी व्यवस्था इस अवस्था में पहुंच गई है? इस न्यायालय को मामले में नोटिस जारी नहीं करना चाहिए क्योंकि यह उनकी विश्वसनीयता पर संदेह करने जैसा होगा.’

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी और अतिरिक्त सालिसीटर जनरल तुषार मेहता पर उंगलियां उठाई हैं. उन्होंने कहा, ‘यह न्यायालय ऐसे आरोपों से निबटने में पूरी तरह सक्षम है और इस तरह के आचरण को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.’

उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों में उच्चतर न्यायपालिका का भारोसा होना चाहिए वरना इन न्यायाधीशों से न्याय पाने वाले लोग क्या कहेंगे कि वे हत्या के आरोपी हैं.

साल्वे ने भावनात्मक तरीके से बहस करते हुये कहा, ‘न्यायाधीशों को संरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता है और इस न्यायालय को उन्हें संरक्षण देना चाहिए. हमारे जिला न्यायाधीश सबसे अधिक कमजोर वर्ग में हैं और उन्हें अधिक संरक्षण की जरूरत है. यदि उनके साथ जिरह की जाती है तो उनसे हत्या के आरोपी के रूप में ही पूछताछ होगी. वे अत्यधिक दबाव में होंगे. हमारी व्यवस्था की निन्दा होगी जिसमे कोई भी जांच उन्हें मुक्त नहीं करेगी.’

प्रशांत भूषण के इस कथन का कि न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड़, जो महाराष्ट्र में सेवायें दे चुके हैं, को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए, का जिक्र करते हुए साल्वे ने कहा, ‘मैं कहता हूं कि ये दोनों न्यायाधीश चूंकि महाराष्ट्र से हैं, इसलिए वे इस मामले की सुनवाई के लिये और अधिक उपयुक्त हैं.’

सुनवाई के दौरान महारष्ट्र का प्रतिनिधत्व करने वाले रोहतगी ने भी इस आरोप का खण्डन किया कि न्यायाधीश लोया की ईसीजी रिपोर्ट गढ़ी गई है और इससे ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता है कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था.

रोहतगी ने कहा, ‘ये सारे आरोप कारवां पत्रिका के लेखों के आधार पर लगाए जा रहे हैं. एम्स के फॉरेन्सिक विभाग के डाक्टर और किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल के डाक्टर ने इस तरह के किसी भी अनुमान से इंकार किया है कि ईसीजी रिपोर्ट सही नहीं है.’ रोहतगी की बहस अधूरी रही. इस मामले में अब12 मार्च को आगे बहस होगी.

सोहराबदुदीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश लोया का एक दिसंबर, 2014 को नागपुर में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था. वह अपने एक सहयोगी की पुत्री के विवाह में शामिल होने वहां गए थे.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
SACRED GAMES: Anurag Kashyap और Nawazuddin Siddiqui से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi