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सबसे बड़ी नहीं, सबसे गड़बड़ योजना है महाराष्ट्र में किसानों की कर्जमाफी!

योजना की गड़बड़ियों को सुधारने के लिए सरकार को कम से कम छः महीने चाहिए जबकि उसके पास कुछ हफ्ते भी नहीं हैं

Updated On: Nov 25, 2017 04:51 PM IST

Sanjay Sawant

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सबसे बड़ी नहीं, सबसे गड़बड़ योजना है महाराष्ट्र में किसानों की कर्जमाफी!

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस का सपना किसानों के लिए कर्जमाफी की एकदम बेदाग योजना पेश करने का था. आधार-नंबर से लिंक होने के कारण यह देश में कर्जमाफी की अपनी तरह की पहली योजना होती लेकिन देवेन्द्र फड़नवीस का ख्याल अब एक बुरे ख्वाब में तब्दील हो गया है.

बैंकों ने मुख्यमंत्री की इस योजना को इस कदर पटरी से उतार दिया है कि अगले कुछ हफ्तों में भारी उतावली के बीच जब कर्जमाफी की राशि का वितरण शुरु होगा तो देवेन्द्र फड़नवीस अपनी इस योजना को ठीक से पहचान नहीं पाएंगे. कर्जमाफी की राशि सिर्फ उन किसानों को मिले जो सबसे ज्यादा परेशानी की हालत में है, इसे पक्का करने के लिए जो नियम सबसे अहम मानकर बनाए गए थे वे राशि के वितरण के वक्त तक कूड़ेदान के हवाले हो चुके होंगे.

भला हो बैंकों की काहिली और कामचोरी का! बैंक चाहे वे राष्ट्रीय हों या जिलास्तरीय, व्यावसायिक हों या सहकारी, सरकारी हों या निजी—हर तरह के बैंक ने कर्जमाफी की राशि के वितरण के काम को इस तरह पटरी से उतार दिया है कि उसे अब अमली जामा पहनाना तकरीबन नामुमकिन हो चला है. कर्जमाफी का ऐलान 24 जून को हुआ था. एक लंबी देरी के बाद सरकार ने कर्जमाफी की राशि बांटने के लिए 18 अक्तूबर का दिन तय किया.

इस दिन प्रभारी मंत्रीगण अलग-अलग जिलों में पहुंचे और टकटकी बांधकर बाट जोहते किसानों को कर्जमाफी के कुछ सौ प्रमाणपत्र थमाकर चलते बने. (कर्जमाफी की राशि का भुगतान बैंकों को हुआ है. किसानों को प्रमाणपत्र दिया जा रहा कि अब आप कर्जमुक्त हुए. इस प्रमाणपत्र के बाद किसान नया कर्ज लेने के योग्य माने जायेंगे)

Devendra Fadnavis

लेकिन यह तो लोगों को दिखाने के लिए रचा गया एक खेल था, यह सिर्फ सियासी ड्रामा था ताकि लोगों के सामने ये जताया जा सके कि कर्जमाफी की योजना उसी दिन से शुरु हो गई है जिस दिन का वादा किया गया था. सच्चाई ये है कि सरकार एकदम बेचैनी में थी, चाह रही थी कि योजना को कैसे कुछ देर के लिए रोका जाए.

निर्धारित तारीख से महज दो दिन(16 अक्तूबर) पहले सरकार के आईटी वेंडर इन्नोवेव आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर ने लाभार्थियों की एक मास्टर लिस्ट तैयार की थी. इस लिस्ट ने महाराष्ट्र सरकार के मंत्रालय यानि उसके सत्ता-प्रतिष्ठान का जब दरवाजा खटखटाया, उसके होश फाख्ता हो गए.

सरकार को किसानों की तरफ से कर्जमाफी की 1.05 करोड़ अर्जियां आयी थीं. बैंकों ने 77.29 लाख किसानों की सूची बनायी. बैंकों के मुताबिक इतने ही किसान (तकरीबन 56.59 लाख परिवार) कर्जमाफी के योग्य थे. लेकिन इन्नोवेव ने दोनों सूचियों के मिलान के आधार पर जो मास्टर लिस्ट बनायी उसमें सिर्फ 2.39 लाख किसानों की अर्जियों को वैध माना गया. वैध करार दी गई अर्जियों वाले किसानों की सूची को ग्रीन लिस्ट का नाम मिला. ग्रीन लिस्ट तैयार होने पर पता चला कि उसमें कर्जमाफी की अर्जी वाले कुल 3 फीसद किसान ही शामिल हैं और 97 प्रतिशत किसान कर्जमाफी के अयोग्य करार हो गए हैं.(अमूमन होता इसका उलटा है.)

जल्दी ये बात साफ हो गई कि लिस्ट में कोई गड़बड़ी है. आधार से लिंक करके पूरे सद्भाव के साथ तैयार किया गया लोन अकाउंट(कर्ज संबंधी खाता) एक ना एक कारण से मुंह के बल भरभराकर गिर गया.

कर्ज की राशि के वितरण की निर्धारित तारीख के आने में अब बस दो दिन ही शेष थे और सरकार माथापच्ची करने में जुटी थी कि वह उलझन कैसे सुलझे जो उसके अलग-अलग विभागों (सहकारिता, सूचना प्रौद्योगिकी तथा मुख्यमंत्री कार्यालय), इन्नोवेव और 66 बैंकों ने आठ हफ्ते की मशक्कत के बाद आखिर को आंख के आगे ला खड़ा किया है. आगे इस रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट होगा कि सारी कवायद आगे बढने की जगह पीछे खिसकने की हो चली थी.

गड़बड़झाला इतना जटिल है कि 18 अक्तूबर की तारीख को बीते हुए अब 36 दिन हो चुके हैं लेकिन कर्जमाफी का कोई प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सका है. कर्जमाफी का एक भी सर्टिफिकेट जारी नहीं हुआ है. सरकार बैंकों से मिले बेकाम के आंकड़ों के ढेर पर बैठी है और उसे समझ नहीं आ रहा है कि सत्यापित लाभार्थियों की मास्टरलिस्ट कैसे तैयार हो. येलो लिस्ट( ऐसी सूची जिसके आंकड़े दोबारा से हासिल किए जा सकते हैं) से कुछ नाम हटाने में कामयाबी मिली है. लेकिन हिफाजती इंतजाम के तौर पर रखे गए कुछ फिल्टर्स को हटाने के बाद ही ऐसा संभव हो पाया है.

Aadhaar

बीते एक महीने में आबंटन की नीति में 20 से ज्यादा बदलाव किए गए हैं लेकिन किसी को ठीक-ठीक नहीं पता कि ग्रीन लिस्ट, जिसमें एक हफ्ते के भीतर कर्जमाफी के योग्य माने गए किसानों के नामों की संख्या 2.39 लाख से बढ़कर 15 लाख हो गई है( और सूची में बढ़वार हर बीतते दिन के साथ जारी है), सही है या भ्रष्ट.

कर्जमाफी की शुरुआत की निर्धारित तारीख यानि 18 अक्तूबर के दिन लोगों के बीच में मुंह दिखाने के काबिल बना रहे, इसके लिए सरकार ने कुछ सौ-पचास संभावित लाभार्थियों के नाम चुन लिए और उन्हें प्रमाणपत्र थमा दिया. अचरज नहीं कि ऐसा करने पर भद्द पिटने की नौबत आई. प्रमाणपत्र कुछ ऐसे किसानों को भी मिल गए जिन्होंने कर्जमाफी की अर्जी ही नहीं डाली थी जबकि अर्जी डालने वाले कुछ किसानों को जो प्रमाणपत्र मिले उनमें ढेर सारी गलतियां थीं. किसी में नाम गलत लिखा था तो किसी में कर्ज का ब्यौरा गलत दर्ज था( लेख में आगे ऐसी गलतियों की चर्चा की गई है)

फड़नवीस ने सोचा था कि कर्जमाफी का ऐलान तुरुप का पत्ता साबित होगा—वाहवाही में कहा जायेगा कि फड़नवीस सरकार ने तो आधार-नंबर से जुड़ी हुई कर्जमाफी की कारगर योजना चलायी है और ऐसा करने वाली वह पहली सरकार है. लेकिन चंद महीनों में फड़नवीस सरकार के लिए यह योजना सबसे बड़ी सियासी और प्रशासनिक चुनौती बन चली है. यह फड़नवीस के लिए गले की फांस साबित हो रहा है और 11 दिसंबर को शुरु होने जा रहे विधानसभा के शीतकालीन सत्र से पहले उन्हें इससे निजात पाना होगा. अगर इसके बाद भी कर्जमाफी का ये जाल नहीं सुलझा तो सियासत का पारा उबलकर वहां जा चढे़गा जहां वह जून(2017) में था, जब सभी सियासी दलों के समर्थन वाले किसान आंदोलन के आगे घुटने टेकते हुए फड़नवीस सरकार को बेमन से ही सही लेकिन कर्जमाफी का ऐलान करना पड़ा.

गड़बड़ी कहां हुई?

गड़बड़ी कहां हुई इसे समझने के लिए उस प्रक्रिया को जानना जरुरी है जो सरकार ने कर्जमाफी के योग्य किसानों की मास्टरलिस्ट तैयार करने के लिए अपनायी. मोटे तौर पर मानक कुछ यों तय किए गए थे: सरकार प्रति किसान-परिवार अधिकतम 1.50 लाख रुपये के कर्ज को माफ करेगी. इससे सुनिश्चित होगा कि कर्जमाफी का लाभ ज्यादा से ज्यादा किसान-परिवारों को मिले, साथ ही बड़े किसान कर्जमाफी का फायदा ना उठा सकें, फायदा सिर्फ छोटे और सीमांत किसानों को हो.

नियम रखा गया कि जिन किसानों ने कर्जे की किश्त चुकायी है उन्हें 25 हजार रुपये प्रोत्साहन राशि के रुप में दिए जायेंगे. अगर कोई किसान-परिवार कर्जमाफी और प्रोत्साहन-राशि के लिए समान रुप से दावेदार हो( मतलब परिवार के अलग-अलग सदस्यों ने कर्ज लिए हों और किसी ने कर्ज चुकाया हो जबकि किसी ने नहीं) तब भी इन दोनों मदों में सरकारी सहायता की कुल अधिकतम राशि 1.50 लाख ही रहेगी.

प्रक्रिया को ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी रखने और लाभार्थियों के सत्यापन को सही रखने के लिए मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस का जोर था कि किसानों के बैंक खातों को उनके आधार-नंबर से जोड़ा जाय. यह एक चुनौती भरा काम था क्योंकि बैंकों ने 2009 से किसानों को कर्ज दिया था और उस वक्त आधार-नंबर जैसी कोई चीज नहीं थी और फिर आधार-नंबर के साथ बैंक खातों को जोड़ने का काम अब भी शुरुआती हालत में ही है तथा ज्यादातर शहरी इलाकों तक सीमित है. लेकिन फड़नवीस का आधार-नंबर से बैंकखातों से लिंक करने पर जोर कायम रहा. वे चाहते थे कि राशि का वितरण एकदम पारदर्शी तरीके से हो, 2009 जैसी हालत दोबारा ना हो जाय जब सीएजी(कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जेनरल) ने अपनी रिपोर्ट में कर्जमाफी के क्रम में हुई भारी गड़बड़ी का उल्लेख किया था.

आंकड़ों को एकत्र करने के लिए दोरुखी प्रक्रिया अपनायी गई. पूरे महाराष्ट्र के किसानों से कहा गया कि वे आपले सरकार पोर्टल के जरिए अर्जी दें. दूसरी तरफ सूबे के बैंकों से कहा गया कि वे कर्ज ना चुकाने वाले किसानों की लिस्ट सौंपें. आईटी वेंडर इन्नोवेव को महाराष्ट्र सरकार की 40 योजनाओं में महा-ऑनलाईन डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर(डीबीटी) की जिम्मेदारी दी गई थी सो इस वेंडर को कर्जमाफी की योजना में प्रोसेसिंग सिस्टम तैयार करने के लिए शामिल किया गया.

सूचना प्रौद्योगिकी और सहकारिता विभाग के ऊंचे पदों पर कायम सूत्रों ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि इन्नोवेव ने किसानों और बैंकों दोनों के लिए ब्यौरे दर्ज करने वाले डेटा-कैप्चर फार्म बनाये थे. बैंकों को दिया गया फार्म बहुत विस्तार में था. बैंक अपने लोन अकाउंट के ब्यौरे 46 शीर्षकों( नाम, उम्र, नगर, कर्ज की राशि, कर्ज अदायगी की राशि, बकाया राशि आदि) से दर्ज करते हैं. लेकिन बैंकों को जो डेटा कैप्चर फार्म मिला उनमें 66 शीर्षकों से ब्यौरे भरने थे यानि उनके लोन अकाउंट में जितने शीर्षक होते हैं उससे इन्नोवेव के फार्म में 20 शीर्षक ज्यादा थे.

Ganna Kisan

इन्नोवेव ने मान लिया था कि जो जानकारियां फार्म में मांगी गई हैं वो अहमियत के लिहाज से बैंकों के पास होनी चाहिए. हां, इन्नोवेव यह जरुर मानकर चल रहा था कि कुछ मामले ऐसे भी हो सकते हैं जहां किसी किसान के पास आधार-नंबर ना हो.

किसानों और बैंकों से आंकड़े एकत्र कर लेने के बाद सिस्टम इंटीग्रेटर के रुप में इन्नोवेव को दोनों सिरों से मिले आंकड़ों के मिलान के लिए एक सॉफ्टवेयर तैयार करना था ताकि लाभार्थियों की एक मास्टरलिस्ट तैयार की जा सके. सूचना प्रौद्योगिकी की भाषा में साफ्टवेयर को कुछ तयशुदा नियमों का इंजीन कहा जाता है. यह इंजीन इन्नोवेव ने सहकारिता विभाग की आबंटन-नीति के आधार पर तैयार किया. इस रीति से तैयार किया गया मास्टरलिस्ट बहुत भरोसेमंद होता और इसको नजीर मानकर देश के बाकी राज्यों में भी सरकारें किसानों की कर्जमाफी की योजना के आबंटित राशि के लिए एक ऐसा तरीका अख्तियार कर सकती थीं जिसमें चोरबाजारी की गुंजाइश ना हो.

लेकिन भला हो बैंकों का कि जो सोचा गया था वैसा हो ही ना सका. किसानों को अपने आधार-नंबर के सहारे रजिस्ट्रेशन करवाना था और इस रिजिस्ट्रेशन का सत्यापन फौरी तौर पर आधार के केंद्रीय डेटाबेस से होना था. इसके बाद ही किसानों फार्म हासिल कर सकते थे. जाहिर है, किसानों ने जो आधार-नंबर दिए उनमें कोई फर्जीवाड़ा नहीं था, सभी वैध आधार नंबर थे. लेकिन बैंकों ने जो आधार-नंबर दिए उनकी कहानी एकदम ही अलग है और वह दुखद कहानी 24 अक्तूबर के दिन फर्स्टपोस्ट पर छप चुकी है.

फर्स्टपोस्ट ने उस वक्त अपनी कहानी में बैंकों के बारे में खुलासा किया था और उस खुलासे जितना ही महत्वपूर्ण है यह जानना कि पूरी प्रक्रिया किस तरह खटाई में पड़ गई.

बैंकों के सौंपे आधार-कार्ड का फर्जीवाड़ा तो समस्या का बस छोटा सा हिस्सा भर था. मिसाल के लिए 77.29 किसानों की एक बड़ी सी सूची में से 273 किसानों की एक निहायत छोटी सी लिस्ट निकालकर देखने पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आंकड़ों में किस हद तक गड़बड़ी हुई है. यह बताना भी मुश्किल है कि गलत आंकड़ों को दर्ज करने का दोषी कौन है, यह दोष सिस्टम इंटीग्रेटर का है या फिर कुछ बैंकों का या सभी बैंकों का.

सरकार ने पहले सोचा कि बहुत संभव है गड़बड़ी छोटे बैंकों से हुई हो क्योंकि सहज तौर पर यह सोचना मुश्किल है कि अपनी कोर बैकिंग प्रणाली पर गर्व करने वाले राष्ट्रीय बैंक भी आंकड़ों को दर्ज करने में गड़बड़ी करेंगे. लेकिन हैरत का मोर्चा यही साबित हुआ. अपने पहले खुलासे के बाद सूचना प्रौद्योगिकी और सहकारिता विभाग के लगातार एक महीने तक चक्कर लगाने पर अब फर्स्टपोस्ट पूरे यकीन के साथ कह सकता है कि सरकारी खजाने से मिलने वाली राशि में गड़बड़झाला करने का मामला हो तो छोटे और बड़े बैंकों में फर्क करना मुश्किल है.

मिसाल के लिए यहां लिखी बातों पर गौर करें

देश के सबसे बड़े व्यावसायिक बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने 11 लाख किसानों के कर्ज के ब्यौरे पेश किए. इनमें 3 लाख किसानों के ब्यौरे में गड़बड़ी है. मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक स्टेट बैंक ने 3000 से ज्यादा फार्म सौंपे हैं लेकिन अगर इतनी बड़ी तादाद में से सिर्फ एक ही फार्म पर नजर डाले तो दिखता है कि 11000 किसानों को एक ही आधार-नंबर से दर्ज कर लिया गया है. इससे भी ज्यादा हैरत की बात है कि आधार-नंबर 12 अंकों का होता है लेकिन स्टेट बैंक के फार्म में वह एक अंक(0) का है.

अन्य बड़े बैंक जैसे कि एचडीएफसी, आईसीआईसीआई, केनरा बैंक, सेंट्रल बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ बड़ौदा ने जो आंकड़े सौंपे हैं उनमें भी भारी गड़बड़ी है. आंकड़ों की गड़बड़ी सबके सामने उजागर होने के एक हफ्ते बाद यानी 25 अक्तूबर को फड़नवीस ने बैंकों के प्रतिनिधियों के साथ आपात्कालीन बैठक की अध्यक्षता की और उनसे कैफियत तलब की गई.

काम की देखरेख कर रहे शीर्ष के अधिकारी एसएस संधू (एडीशनल चीफ सेक्रेटरी, सहकारिता), वी के गौतम (प्रिन्सिपल सेक्रेटरी, सूचना प्रौद्योगिकी, अब छुट्टी पर), डी के जैन (एडिशनल सेक्रेटरी,वित्त) और परवीन परदेसी (मुख्यमंत्री के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी ) ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के जरिए बताया कि बैंकों ने जो आंकड़े दिए हैं उनमें भारी विसंगति है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

इन अधिकारियों ने कुल 11 तरह की बड़ी गलतियों का जिक्र किया. कंप्यूटर के जो चिह्न सूची में मान्य नहीं हैं (जैसे कि हायफन, डैश, बैक स्लैश आदि) उन्हें गलती से दर्ज करने के अनगिनत उदाहरणों की बात तो खैर छोड़ ही दें. सूचियों में दर्ज गलत ब्यौरे की एक मिसाल यहां पेश है:

  1. एक ही बचत खाता संख्या दो जन जैसे पति और पत्नी के नाम पर दिखाना
सुधाकर जी अवतिक बचत खाता संख्या 60xxxxxxxxxxx90; लोन अकाउंट संख्या 60xxxxxxxxxxx68 और पत्नी गीताबाई सुधाकर अवतिक बचत खाता संख्या 60xxxxxxxxxxx90 और लोन अकाउंट संख्या 60xxxxxxxxxxx23.
  1. दो परस्पर अनजान लोगों के लिए एक ही आधार नंबर का इस्तेमाल
आस्तिक शिवाले शेजोले, आधार नंबर : xxxx7852xxxx, लोन अकाउंट नंबर 60xxxxxxxxxxx16, बचत खाता संख्या 60xxxxxxxxxxx26

उषाबाई भीमराव काले, आधार नंबर : xxxx7852xxxx, लोन अकाउंट नंबर 60xxxxxxxxxxx20, बचत खाता संख्या  60xxxxxxxxxxx77

  1. अनेक प्रविष्टियों के लिए गलत आधार-संख्या का इस्तेमाल
आधार संख्या 123123123123
  1. दो परस्पर अनजान व्यक्तियों के लिए एक ही आधार नंबर किन्तु गलत बचत संख्या का इस्तेमाल( हर नाम एक ही लकीर में लिख देना)
दिलीपरामचंद्रकाचले, आधार : xxxx111110157, लोन अकाउंट 20xxxxxxx70, बचत खाता संख्या 111111111111;

बालकृष्णसेवकरामघागले, आधार : xxxx11110157, लोन अकाउंट 60xxxxxxx38, बचत खाता संख्या 111111111111;

  1. एक नाम, एक आधार नंबर, बचत खाता संख्या और लोन अकाउंट नंबर का एक से ज्यादा दफे उल्लेख
संगीता हेमंत चवाण का नाम एक ही आधार नंबर 100000000000 तथा एक ही बचत खाता संख्या 14905100005045 के साथ दो अलग-अलग लोन अकाउंट नंबर 480 और 481 से दर्ज है.
  1. कर्ज की स्थिति के बारे में बैंक के ब्यौरे में विसंगति
अहमदनगर डीसीसी, अकोला डीसीसी, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, केनरा बैंक, गोंडिया डीसीसी, महाराष्ट्र ग्रामीण बैंक समेत अनेक बैंकों ने लिखा है कि कर्ज की राशि अदा हो चुकी है तो भी ऐसे बैंकों ने कर्ज की बकाया राशि का उल्लेख किया है. इसका एक उदाहरण नीचे की तालिका में देखें:

बैंक का नाम   किसान का नाम    क्या पूरी राशि चुकता है   बकाया राशि

केनरा बैंक         अदमाने एस राव          हां                1,05,113.17 रु.

बैंक ऑफ बड़ौदा     आबासाहेब भुखले        हां                  49,924 रु,

बैंक ऑफ इंडिया     अवंत चापले           हां                  7,49,000 रु.

बैंक ऑफ महाराष्ट्र   आबूबाई बोरकर        हां                  3,00,009 रु.

शरद पवार गलत कह रहे हैं

फर्स्टपोस्ट ने 24 अक्तूबर के दिन जब बैंकों के गड़बड़झाले के बारे में खुलासा किया. इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार ने फड़नवीस को निशाने पर लेते हुए कहा कि मॉनसून बाद की खेती का समय हाथ से निकलता जा रहा है लेकिन किसानों को कर्ज की राशि देने में बहुत ज्यादा देरी की जा रही है. शरद पवार की आलोचना का मुख्य स्वर ये था कि फड़नवीस बैंकिंग प्रणाली पर विश्वास नहीं कर पा रहे.

शरद पवार ने फर्स्टपोस्ट से अपने खास इंटरव्यू में 27 अक्तूबर के दिन कहा : "मुख्यमंत्री को लगता है कि कर्जमाफी से सिर्फ बैंकों को फायदा होगा..बैंकिंग प्रणाली एक व्यवस्था का नाम है और हमारी अर्थव्यवस्था उस पर निर्भर है. हम ये नहीं कह सकते कि सारे बैंक डिफाल्टर(बाकीदार) या कि चोर हैं. बड़े अफसोस की बात है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री को बैकिंग प्रणाली पर विश्वास नहीं है. "

बैंक कर्जमाफी की देश की सबसे बड़ी योजना(34022 करोड़ रुपये) में भाग ले रहे थे. उन्होंने अपने ब्यौरे में ढेर सारी गलती की है और अपेक्षित सतर्कता दिखाने में उनसे पूरी तरह से चूक हुई है. बैंकों की चूक को देखते हुए कह सकते हैं कि बैंकों पर शरद पवार का आंख मूंदकर विश्वास करना गलत है और फड़नवीस ने बैंकों के कान उमेठने की कोशिश की है तो ऐसा करना ठीक है.

दरअसल शरद पवार ठीक कह रहे हैं

यूपीए ने 2008-09 में 71 हजार करोड़ रुपये की राशि कर्जमाफी योजना के तहत बांटी थी. शरद पवार इस सरकार में भागीदार थे. यूपीए की कर्जमाफी की योजना का हवाला देते हुए उन्होंने कहा :

"हमने बड़ा सीधा-सरल तरीका अपनाया. हमने एक समिति बनायी. समिति ने रिपोर्ट सौंपी तो हमने बैंकों से बात की. हमने राशि सीधे बैंक में जमा कर दी. हमने बैंकों से कहा कि आप अपनी हर शाखा को ध्यान में रखते हुए कर्ज अदा ना कर पाए किसानों की सूची दीजिए. कर्ज की रकम इस सूची के आधार पर माफ की गई. तो तरीका एकदम सीधा-सादा था लेकिन बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार और खासकर मुख्यमंत्री (देवेन्द्र फड़नवीस) का बैंकों पर भरोसा नहीं है.

मेरे लिए यह बड़े हैरत की बात है. "हमने कर्जमाफी की राशि सीधे बैंकों में जमा की थी और इस बार भी कर्जमाफी की तथाकथित राशि बैंकों में ही जमा की जा रही है. तो फिर अन्तर क्या है? यह तो सिर्फ बीजेपी के तरीके और प्रचार भर का मामला है. वे झूठे वादे करते हैं और जोर-शोर से झूठ बोलते हैं.."

पवार ठीक कह रहे हैं. विधानसभा के शीतकालीन सत्र की शुरुआत में बस दो हफ्ते बाकी हैं. फड़नवीस एक ऐसे टाइम बम पर बैठे हैं जिसके फटने का समय एकदम नजदीक आता जा रहा है. अगर विधानसभा के सत्र की शुरुआत से पहले कर्जमाफी की राशि का बंटना शुरु नहीं होता तो फड़नवीस सरकार के प्रशासन पर भारी दबाव पड़ेगा. आंकड़ों की गड़बड़ी दूर करने में फड़नवीस सरकार को कम से कम छह महीने लग जायेंगे. लेकिन फड़नवीस के पास समय तो एक हफ्ते का भी नहीं है.

Sharad Pawar

बैंकों की काहिली और कामचोरी से परेशान होकर फड़नवीस ने शरद पवार वाला ही रास्ता उपाय के तौर पर चुना है. समाधान निकालने के गरज से हाल में एक उच्चस्तरीय समिति बनी. सुनने में आ रहा है कि समिति फड़नवीस की योजना को सिरे से बदलने की सोच रही है. उच्च पदस्थ सूत्रों ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि हाई पावर कमिटी( इसमें मुख्य सचिव सुमित मलिक और अतिरिक्त मुख्य सचिव डीके जैन, एसएस संधू और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के मुख्य सचिव एसवीआर श्रीनिवास शामिल हैं) ने योजना को आधार-नंबर से जोड़ने (इसके साथ ही मूल योजना में शामिल कुछ और नियम) का विचार छोड़ दिया है.

सोचा जा रहा है कि क्यों ना बैंक ही अपने रिकार्ड के मुताबिक कर्जमाफी की राशि बांटे. इसमें कर्जमाफी की राशि के आबंटन पर बैंकों का पूरा नियंत्रण होगा. और, यह समझते हुए कि बैंकों ने मनगढ़न्त लिस्ट तैयार की है, फड़नवीस की सरकार और महाराष्ट्र के किसान बस यह दुआ करें कि रकम सही खातों में पहुंचे.

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