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मीसाबंदी पेंशन पर सियासी खींचतान, जानिए आखिर क्या है ये योजना

मध्य प्रदेश में 15 सालों बाद कांग्रेस ने कमान संभाली है. एमपी सरकार ने मीसाबंदी पेंशन को बंद करने का ऐलान किया है.

Updated On: Jan 03, 2019 04:29 PM IST

FP Staff

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मीसाबंदी पेंशन पर सियासी खींचतान, जानिए आखिर क्या है ये योजना

मध्य प्रदेश में नई सरकार को बने हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ है कि सरकार ने धड़ाधड़ फैसले लेने शुरू कर दिया हैं. इन्हीं फैसलों में से एक एमपी सरकार ने मीसाबंदी पेंशन को बंद करने का ऐलान किया है. जिसके बाद इस पर विवाद भी छिड़ गया है.

मध्य प्रदेश सरकार ने एक सर्कुलर जारी कर मीसाबंदियो को दी जाने वाली पेंशन इस महीने से अस्थाई तौर पर बंद कर दी है और बैंकों को भी इस संबंध में निर्देश जारी कर दिए गए हैं. मीसाबंदी पेंशन को लोकतंत्र सेनानी सम्मान निधि के नाम से भी जाना जाता है. इस मामले में मध्य प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 29 दिसंबर 2018 को सर्कुलर जारी कर मीसाबंदी पेंशन योजना की जांच के आदेश दिए हैं.

सरकार ने बैंकों को भी मीसाबंदी के तहत दी जाने वाली पेंशन जनवरी 2019 से रोकने के निर्देश जारी किए हैं. वहीं बीजेपी के जरिए मीसाबंदियों की पेंशन बंद करने के कदम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया गया है साथ ही कहा गया है कि पार्टी इसका पुरजोर विरोध करेगी.

क्या है मीसाबंदी पेंशन योजना

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान साल 1975 से 1977 के बीच आपातकाल लगा था. इस दौरान कई लोगों को जेल में डाला गया था. जेल में डाले गए लोगों को मीसाबंदी पेंशन योजना के तहत मध्य प्रदेश में करीब 4000 लोगों को 25000 रुपए मासिक पेंशन दी जाती है. साल 2008 में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी.

इंदिरा गांधी के शासनकाल में आपातकाल के दौरान जेल में डाले गए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी और स्वयंसेवकों के लिए बीजेपी सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी. 2008 में 3000 रुपए से शुरू हुई इस योजना के तहत साल 2017 में राशि बढ़ाकर 25000 रुपए हो गई. इमरजेंसी के दौरान कई लोग भूमिगत रहे थे. इसके बाद उन्हें विधानसभा के दरवाजे पर गिरफ्तार किया गया था. वहीं वे 19 महीने तक नजरबंद भी रहे और इंदिरा गांधी की सरकार के कारण उन्हें बिना कारण जेल में भी रहना पड़ा था.

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