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बेमतलब है मदरसों के लिए ड्रेस कोड पर बवाल

मुसलमानों को इस मासले में अपने मजहबी रहनुमाओं के झांसे में नहीं आकर खुले दिमाग से सोचना चाहिए

Updated On: Jul 04, 2018 06:40 PM IST

Yusuf Ansari

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बेमतलब है मदरसों के लिए ड्रेस कोड पर बवाल

उत्तर प्रदेश सरकार ने मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए ड्रेस कोड लागू करने का फैसला किया है. अभी तक मदरसों में बच्चे कुर्ता पायजामा पहन कर ही जाते हैं. नया ड्रेस कोड क्या होगा यह अभी तय नहीं हैं लेकिन यह तय है कि नया ड्रेस कोड कुर्ता पायजामा नहीं होगा. योगी सरकार के इस फैसले से मुस्लिम संगठनों में खलबली मच गई है. अचानक आए इस फैसले से मुस्लिम संगठनों को समझ नहीं आ रहा कि इसका समर्थन करें या विरोध. लिहाजा कुछ संगठनों ने योगी सरकार के इस कदम का कुछ शर्तों के साथ समर्थन किया है लेकिन ज्यादातर इसके विरोध में उतर आए हैं.

योगी सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री मोहसिन रजा के मुताबिक सरकार का मकसद है कि मदरसों को भी अन्य शैक्षिक संस्थानों की ही तरह ही देखा जाए. अब तक मदरसों में छात्र कुर्ता पायजामा पहनते थे, लेकिन अब ड्रेस कोड इसे अपनी तरह का नया औपचारिक रूप देगा. उन्होंने कहा कि यह भी संभव है कि राज्य सरकार इस संबंध में कुछ प्रावधान करे. मदरसा छात्रों का नया ड्रेस कोड अब उन्हें दूसरों से अलग दिखाने की बजाय अन्य स्कूली छात्रों की ही तरह पेश करेगा. उन्होंने कहा कि हमारे इरादे स्पष्ट हैं, क्योंकि हम पारदर्शी हैं और सबका साथ सबका विकास में यकीन करते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम समाज को देश की मुख्यधारा में लाना चाहते हैं. उनका कहना है कि भारत का मुसलमान ऐसा होने चाहिए जिसके एक हाथ में कुरान हो तो दूसरे में लैपटॉप.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मदरसे चलाने वाली संस्था जमात उलेमा-ए-हिन्द के उत्तर प्रदेश प्रमुख अशद रशीदी ने कहा कि हम इस कदम का स्वागत करेंगे बतर्शे यह अच्छा हो. हम देखेंगे कि किस इरादे से ये बदलाव किए जा रहे हैं. वहीं ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता यासूब अब्बास ने इस पर सवाल खड़े किए हैं. अब्बास ने योगी सरकार से पूछा है कि मदरसों की पारंपरिक पोशाक पर किसने आपत्ति की है और आपत्ति है क्या..? शिया पर्सनल लॉ बोर्ड मदरसे के छात्रों पर नया ड्रेस कोड जबरन लागू करने के खिलाफ है.

अब्बास का कहना है कि योगी सरकार ने मदरसों के अध्यापकों का समय से वेतन देने जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ड्रेस कोड का नया शिगूफा छेड़ा है.

इन संगठनों के अलावा यूपी के कई मौलवियों ने इस पर सख्त आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि मदरसों में ड्रेस कोड तय करना मदरसा कमेटी का काम है न कि सरकार का. मौलवी सूफिया निजामी ने कहा, 'देश में चल रहे मदरसों और कॉलेज के लिए ड्रेस कोड इन्हें चलाने वाले संस्थान की कमेटी ही तय करती है न कि सरकार. तो इस तरह का भेदभाव मदरसों के साथ क्यों? वहीं मदरसा दारुल उलूम फिरंगी महल ने भी योगी सरकार के इस कदम का विरोध किया है.

मौलवी मोहम्मद हारुन ने भी कहा, 'मदरसों के लिए क्या अच्छा है क्या नहीं यह हम पर छोड़ देना चाहिए, वैसे भी बमुश्किल 1-2 फीसदी बच्चे ही यहां पढ़ने आते हैं. सरकार को इसके लिए चिंतित नहीं होना चाहिए.'

दरअसल मदरसों में ड्रेस कोड के मुद्दे को बेवजह तूल दी जा रही है. योगी सरकार ने यह मुद्दा ऐसे समय उठाया है जब उस पर काम करके दिखाने का दबाव है. उपचुनाव में बीजेपी के तीन लोकसभा और एक विधानसभा सीट हारने के बाद यह संदेश जा रहा है कि बीजेपी के परंपरागत कट्टर हिंदु वोटबैंक कमजोर हो रहा है. ऐसे में मुसलमानों से जुड़े ऐसे मुद्दे उठाना बीजेपी के अनुकूल रहते हैं जिनका मुस्लिम समुदाय से विरोध हो.

Yogi Adityanath at meeting

इससे बीजेपी का वोटबैंक खुश होकर उससे चिपका रहता है. यूपी में योगी सरकार बनने के बाद से ही मदरसों से जु़ड़े मुद्दे जब तब उठाए जाते रहे हैं. पहले मदरसों में सीसीटीवी कैमरे लगाना, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर मदरसों में तिरंगा फहराना और राष्ट्रगान गाना ज़रूरी करके विवाद खड़ा किया. अब ड्रेस कोड के बहाने नया विवाद खड़ा किया जा रहा है.

योगी सरकार अगर मदरसों में कोई ड्रेस कोड लागू करना चाहती है तो उसे मदरसा चलाने वाले संगठनों के साथ इस पर विचार विमर्श करना चाहिए था. इसे लेकर इन संगठनों के सामने अपना मकसद रखना चाहिए था. यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सरकार बनती तो बहुमत से है लेकिन चलती जनमत है.

मुस्लिम समाज से जुड़े मसलों पर बार-बार एकतरफा फैसला करके योगी ने बता दिया कि प्रधानमंत्री की कही इस बात की उनकी नजर में कोई खास अहमियत नहीं हैं. लोकतंत्र में संवाद के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए. किसी एक समुदाय को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि कोई फैसला उस पर जबरदस्ती थोपा जा रहा है. चाहे वो फैसला उसके लिए कितना ही फायदेमंद क्यों न हो. यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है. इस मामले में योगी सरकार खरी नहीं उतर रही.

बिना सोचे समझे हर मुद्दे का विरोध करना मुस्लिम संगठनों की पुरानी आदत है. ये संगठन शुरू में हर मुद्दे पर विरोध करते हैं. जब इनकी बात सुनी नहीं जाती तो थक हार बैठ जाते हैं. यूपी में मदरसे से जुड़े हर मुद्दे पर यही कहानी दोहराई गई है. अगर सरकरा ड्रेस कोड लागू करती बी है तो यह सिर्फ सरकारी मदद से चलने वाले मदरसा बोर्ड में रजिस्टर्ड मदरसों में ही लागू होगा. निजी तौर पर चलने वाले मदरसें अपना ड्रेस कोड खुद तय कर करेंगे.

अगर सरकारी मदरसों में बच्चे कुर्ता पायजामा की बजाय पैंट शर्ट पहनकर जाएंगे तो क्या मज़हबी शिक्षा उनकी समझ में नहीं आएगी. क्या कुर्ता पायजामा पहनकर ही मज़हबी शिक्षा हासिल की जा सकती है. यह बात समझ में नहीं आती आखिर मुसलमानों के मजहबी नेता मुसलमानों को कुर्ता, पायजामा, टोपी, दाढ़ी के साथ अलग पहचान के जाल में ही क्यों उलझाए रखना चाहते हैं. इन सब चीज़ों का मज़हब से कोई ताल्लुक नहीं हैं. ये सब चीज़ें व्यक्तिगत पसंद की हैं. धर्म के नाम पर इन्हें जबरदस्ती लादना कतई उचित नहीं है.

दूसरी बात यह है कि मदरसा बोर्ड के अंतर्गत चलने वाले मदरसों में सिर्फ मजहबी पढ़ाई नहीं होती बल्कि वहां स्कूलों की तरह गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे विषय भी पढ़ाए जाते हैं. कुछ महीने पहले ही यूपी सरकार ने इन मदरसों में एनसीआरटी की किताबों से पढ़ाई कराना जरूरी कर दिया था. इस पर भी मुस्लिम संगठनों ने काफी बवाल मचाया था. जरूरी नहीं है कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे आगे चल कर भी मजहबी पढ़ाई ही करें और मौलवी, मुफ्ती ही बने. वो आगे चल कर डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर भी बन सकते हैं या फिर किसी और क्षेत्र में भी जा सकते हैं. इस लिहाज से देखें तो मदरसों के छात्रों के लिए ड्रेस कोड का फैसला सही लगता है. इससे मदरसों के बच्चे भी खुद को दूसरे स्कूलों के बच्चों के बराबर समझेंगे.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

मुसलमानों के लिए यह भी गौर करने का विषय है कि आखिर मदरसों में पढ़ने बच्चों पर कुर्ता पायजामा की ड्रेस बचपन से ही लाद दी जाए और उन्हें सिर्फ मजहबी शिक्षा में ही आगे बढ़ने पर मजबूर किया जाए. सभी मदरसे मुसलमानों के चंदे से चलते हैं. यह सवाल भी अहम यह कि मदरसों को जकात और इमदाद के रूप में चंदा देने वाले मुसलमान अपने बच्चों को तो आधुनिक शिक्षा दिलाकर देश विदेश में नाम कमाने की तमन्ना रखते हैं लेकिन जिन मदरसों में वो चंदा देते हैं उनमे पढ़ने वाले बच्चों को वो सिर्फ मौलवी और मुफ्ती ही बनाना चाहते हैं. इस पर तर्क दिया जाता है कि अगर मौलवी और मुफ्ती नहीं होंगे तो उनके जैसे लोगों के बच्चों कुरान और मजहबी शिक्षा कौन देगा. यह बड़ी अजीब बात है.

मदरसों में ड्रेस कोड लागू करने के योगी सरकार के फैसले को सिर्फ मुसलमानों की अलग पहचान और उनके धार्मिक मामलों में गैर जरूरी दखलंदाजी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. अगर सरकार की वाकई यह मंशा यह है कि वो मदरसों में पढ़ने वाले गरीब मुस्लिम बच्चों को मुख्यधारा में लाना चाहती है और उनके साथ उनके पहनावे की वजह से होने वाले भेदभाव को खत्म करना चाहती है तो इस फैसले का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए.

मुसलमानों को इस मासले में अपने मजहबी रहनुमाओं के झांसे में नहीं आकर खुले दिमाग से सोचना चाहिए. जज्बाती होकर बेमतलब का विरोध का कोई फायदा नहीं हैं. सरकार के ऐसे फैसलों के कुछ जकात माफिया टाइप मौलवियों को अपनी दुकान खतरे में नजर आने लागती है तो वो मुसलमानों के बरगलाना शुरू कर देते हैं. सरकार को भी चाहिए कि वो मदरसों के गरीब बच्चों को हर साल कम से कम दो ड्रेस गर्मियों की और एक सर्दियों की मुफ्त मुहैया कराके यह सुनिश्चित करे कि वो मुसलमानों का बुरा नहीं बल्कि भला चाहती है.

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