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तीन तलाक धार्मिक मुद्दा नहीं, शरीयत में इसका कहीं जिक्र नहीं है: नायडू

यह समानता का अधिकार और अन्य महिलाओं की ही भांति मुस्लिम महिलाओं के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का मामला है

Updated On: Apr 30, 2017 06:25 PM IST

Bhasha

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तीन तलाक धार्मिक मुद्दा नहीं, शरीयत में इसका कहीं जिक्र नहीं है: नायडू

तीन तलाक के मुद्दे पर चौतरफा चल रही चर्चाओं के बीच केंद्रीय मंत्री एम वेंकैया नायडू ने जोर दे कर कहा कि तीन तलाक कोई धार्मिक मुद्दा नहीं है और शरीयत में इसका कोई प्रावधान नहीं है.

नायडू ने पिछले कई वर्षों से इस मुद्दे पर चुप्पी साधने के लिए कांग्रेस पर निशाना साधा.

उन्होंने कहा, ‘तीन तलाक कोई धर्मिक मुद्दा नहीं है क्योंकि शरीयत में इसका कोई प्रावधान ही नहीं हैं. यह समानता का अधिकार और अन्य महिलाओं की ही भांति मुस्लिम महिलाओं के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का मामला है.’

उन्होंने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘यह भेदभाव क्यों...इसका अंत किया जाना चाहिए और इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए.’

मोदी पर राजनीतिक माइलेज लेने के लिए इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने के वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और मल्लिकार्जुन खड़गे के आरोपों पर उन्होंने कहा, ‘जो प्रधानमंत्री ने शनिवार को कहा उस पर मुस्लिम समुदाय को विचार करना चाहिए.’

बीजेपी नेता ने सभी राजनीतिक पार्टियों से नकारात्मक राजनीति को समाप्त करने और सकारात्मक और रचनात्मक राजनीति में शामिल होने का संकल्प लेने की अपील की ताकि देश की उर्जाओं और लोगों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके.

तीन तलाक को लेकर पिछले कई महीनों से देशभर में बहस छिड़ी हुई है.

तीन तलाक इतना पेचीदा मसला क्यों है?

तीन तलाक

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की फेसबुक वाल से

तीन तलाक जिस तरह से आज मुस्लिम समुदाय में चलन में है इसका कोई भी जिक्र कुरान और हदीस में नहीं मिलता. फिर भी जनमानस में लंबे वक्त से चलते आने के कारण ये एक बड़ा ही पेचीदा मसला बन गया है.

सभी धर्मों के धर्म गुरुओं की तरह इस्लाम में भी काजी को कई तरह की व्याख्या की छूट धार्मिक रीति-रिवाजों के बारे में दी गई है तो ऐसे में ये मामला और भी उलझाऊ हो गया है.

हाल ही में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी यह कहा कि एक बार में तीन तलाक देना शरीयत के खिलाफ है और इस तरह तीन तलाक देने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा.

तीन तलाक के जुड़े ये शब्द भी कम उलझाने वाले नहीं हैं- हलाला, हुल्ला, तहलीली, इद्दत और खुला.

इद्दत- तलाक के बाद लड़की अपने मायके वापस आती है और तीन महीने 10 दिन बिना किसी पराए आदमी के सामने आए रहती है ताकि अगर लड़की प्रेग्नेंट हो तो यह साबित हो जाए कि उसका होने वाला बच्चा उसके पहले पति की है. तीन महीने 10 दिन की यह अवधि इद्दत कही जाती है. इस अवधि के खत्म होने के बाद ही तलाकशुदा महिला किसी और पुरुष से शादी कर सकती है.

हलाला- इसे 'निकाह हलाला' भी कहा जाता है. शरिया के मुताबिक अगर एक पुरुष ने औरत को तलाक दे दिया है तो वो उसी औरत से दोबारा तबतक शादी नहीं कर सकता जब तक औरत किसी दूसरे पुरुष से शादी कर तलाक न ले ले.

हुल्ला- यह हलाला का ही एक रूप है. इसमें तीन तलाक के बाद मौलवी द्वारा तय किए गए व्यक्ति से औरत शादी करती है. इसके बाद वह व्यक्ति औरत को तलाक देता है. इसके बाद औरत फिर से अपने पहले पति से शादी कर सकती है.

तहलीली- वो इंसान जो 'हुल्ला' यानि औरत के साथ शादी करके बिना संबंध स्थापित किए तलाक दे देने के लिए राजी होता है. उसे तहलीली कहा जाता है. ये निकाह के साथ ही औरत को तलाक दे देता है ताकि वो अपने पहले शौहर से शादी कर सके.

खुला- अगर शौहर तलाक मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी शहर काजी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे. इस्लाम ने काजी को यह हक दे रखा है कि वो उनका रिश्ता खत्म करने का ऐलान कर दे जिससे उनका तलाक हो जाएगा. इसे ही 'खुला' कहा जाता है.

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