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हर हाल में समयसीमा के भीतर लोकपाल की नियुक्ति चाहती है सरकार

सरकार ने प्रस्तावित भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकार- लोकपाल के कामकाज के लिए नियमों का मसौदा तैयार करने की खातिर 15 जून की समयसीमा तय की है.

Updated On: Feb 28, 2018 08:20 PM IST

Yatish Yadav

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हर हाल में समयसीमा के भीतर लोकपाल की नियुक्ति चाहती है सरकार

लोकपाल को लागू करने में सरकार को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है. दरअसल, सरकार ने प्रस्तावित भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकार- लोकपाल के कामकाज के लिए नियमों का मसौदा तैयार करने की खातिर 15 जून की समयसीमा तय की है. लोकपाल को आला सरकारी अधिकारियों के अलावा प्रधानमंत्री और बाकी केंद्रीय मंत्रिमंडल के खिलाफ भ्रष्टचार के आरोपों की जांच करने का अधिकार होगा.

फ़र्स्टपोस्ट को मिले सरकारी दस्तावेज की प्रतियों के मुताबिक, कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन मंत्रालय बाकी संबंधित पक्षों के साथ मिलकर 'लोकपाल कानून की धारा 59 के तहत 11 नियम बनाने की तैयारी में है, जो शिकायतों से जुड़े चार्टर, अफसरों की नियुक्ति और लोकपाल के अधिकारों से जुड़े अन्य मामलों को पारिभाषित करेगा.'

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि 15 जून तक नियमों को अंतिम रूप देने के बाद मंत्रालय को गजट (सार्वजनिक पत्र और सरकार का अधिकृत कानूनी दस्तावेज) के जरिए नियमों के लिए अधिसूचना जारी करनी होगी, ताकि यह प्रभावी हो सके.

लोकपाल और लोकायुक्त कानून, 2013 संसद में चार साल पहले पास हुआ था. इसके बाद से यह बाबुओं की फाइलों में अटका पड़ा है. इसमें साफ तौर पर कहा गया था कि 'लोकपाल भ्रष्टाचार से जुड़ी किसी भी शिकायत या आरोप की जांच करेंगे या करवाएंगे, चाहे वह प्रधानमंत्री से जुड़ा हुआ मामला क्यों न हो.'

माना जा रहा है कि मंत्रालय सावधानीपूर्वक उन 'शिकायतों' की प्रकृति को पारिभाषित कर रहा है, जिन पर लोकपाल को कार्रवाई का अधिकार होगा. दरअसल, इससे सरकारों के आला अफसरों और अन्य के खिलाफ जांच का आधार बनेगा. संसद की तरफ से पास कानून के तहत लोकपाल को कुछ मामलों में सिविल कोर्ट का अधिकार होगा. मसलन, उसके पास किसी शख्स को समन जारी करने, बयान/शपथ की जांच और अपराध की प्रक्रिया के मामले में फैसले लेने का अधिकार होगा.

केंद्र सरकार इसकी धारा 27 की उपधारा (1) के क्लॉज (vi) के तहत नियम बनाने पर विचार कर रही है, जिसमें कहा गया है कि यह 'संबंधित सुझावों और निर्देशों के मुताबिक अन्य मामलों' को भी ले सकता है. दस्तावेज में सुझाव दिया गया है कि सरकार ने 'अन्य मामलों' के लिए अब तक नियम नहीं बनाया है. इन मामलों के लिए लोकपाल के पास सिविल कोर्ट का अधिकार होगा.

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चूंकि लोकपाल या इसके द्वारा अधिकृत किसी भी अधिकारी के पास तात्कालिक तौर पर भ्रष्टाचार से जुड़ी संपत्तियों को कुर्क करने का अधिकार होगा, लिहाजा मंत्रालय उन तौर-तरीकों के लिए नियम बना रहा है, जिसके जरिये सीलबंद लिफाफे में इस मामले को स्पेशल कोर्ट भेजा जाएगा. कानून की धारा 59(2)(ई) के मुताबिक, केंद्र सरकार को नियम बनाने का अधिकार है और अदालत कुर्की के आदेश की अवधि को आगे बढ़ा सकती है और जरूरत के हिसाब से इस तरह की सामग्री को ज्यादा अवधि के लिए रख सकती है.

सरकार बजट से संबंधित नियमों पर भी काम कर रही है. मसलन, लोकपाल की अनुमानित प्राप्तियां और खर्च और बही-खाते और अन्य संबंधित रिकॉर्ड रखने के लिए प्रस्तावित खाका से संबंधित नियम और बही खातों के सालाना स्टेटमेंट का खाका. कुछ अन्य दिशा-निर्देशों को लोकपाल संस्था के चालू होने के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा, क्योंकि इसके लिए चेयरपर्सन की मंजूरी की जरूरत होगी.

कार्मिक मंत्रालय ने लोकपाल कानून की धारा 60(2)(बी) को लेकर चिंता जताई है, जिसमें संस्थान की पीठ के बैठने की जगह के बारे में बताया गया है. कानून के मुताबिक, लोकपाल की पीठ सामान्य तौर पर नई दिल्ली और कुछ अन्य जगहों में बैठेगी, जैसा कि लोकपाल नियमों के जरिये बताया जाएगा. और चेयरपर्सन अपनी जरूरत के हिसाब से दो या इससे ज्यादा सदस्यों के साथ पीठ तैयार कर सकते/ सकती हैं. हालांकि, हर बेंच में कम से कम एक न्यायिक सदस्य रह सकता है.

लोकपाल का ऑफिस चालू हो जाने के बाद उसे लोकपाल से जुड़े सचिव, अन्य अधिकारी और बाकी स्टाफ की सेवा शर्तों और वेतन, भत्ते, छुट्टियां या पेंशन से जुड़े नियमों का जायजा लेने की जरूरत पड़ सकती है. लोकपाल को शुरुआती जांच से जुड़ी प्रक्रिया के लिए भी नियम बनाने होंगे.

इस कानून की धारा 20 की उपधारा 11 में कहा गया हैः 'मुमकिन है कि लोकपाल मूल रिकॉर्ड और सबूत को सुरक्षित रखे, जो शुरुआती जांच-पड़ताल या केस से निपटने या स्पेशल कोर्ट द्वारा जरूरी हो सकते हैं.'

कार्मिक मंत्रालय लोकपाल के अफसरों और अन्य स्टाफ की नियुक्ति से जुड़े नियमों का भी जायजा ले रहा है. कानून की धारा 10 के मुताबिक, लोकपाल में भारत सरकार के सचिव रैंक का एक सचिव होगा. सचिव की नियुक्ति केंद्र सरकार की तरफ से भेजी गई कमेटी के नामों के आधार पर चेयरपर्सन करेंगे/करेंगी.

कानून की धारा 59(2) (सी) में कहा गया है कि इस तरह की नियुक्तियां संघ लोक सेवा आयोग (यूपीसीएस) से सलाह के बाद ही की जाएंगी. लोकपाल बिल को 2013 में संसद में पास किया गया था. इस बिल के पास होने के दौरान इस बात को लेकर गरमागरम बहस हुई कि प्रधानमंत्री को नए कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए या नहीं. बिल की जांच के लिए इसे संसद की स्थाई समिति और सेलेक्शन कमेटी को भी सौंपा गया था. आखिरकार नए बिल में प्रधानमंत्री को शामिल किया गया, जो अंतरराष्ट्रीय मामलों, बाहरी और आंतरिक सुरक्षा, सार्वजनिक ऑर्डर, परमाणु ऊर्जा, स्पेस आदि मामलों को छोड़कर लोकपाल के दायरे में होंगे.

देरी को लेकर मंत्रालय की दलील

एक सरकारी नोट में भ्रष्टाचार से निपटने से जुड़ी सर्वोच्च संस्था का ऑफिस तैयार होने में देरी के लिए मौजूदा लोकसभा में विपक्ष के नेता की गैर-मौजूदगी को मुख्य वजह बताया गया है. मंत्रालय ने बताया, 'यह बताया जाता है कि लोकपाल और लोकायुक्त कानून 2013 के संशोधन के लिए लोकपाल और लोकायुक्त और अन्य संबंधित (संशोधन) बिल को अब तक लोकसभा द्वारा पास नहीं किया गया है. इस संशोधन बिल में अन्य चीजों के अलावा सेलेक्शन कमेटी में विपक्ष के नेता के लिए विकल्प मुहैया कराने का प्रस्ताव है. इस बिल की पड़ताल और रिपोर्ट के लिए इसे कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति के हवाले किया गया था. कमेटी ने 7 दिसंबर 2015 को अपनी रिपोर्ट दी है. संबंधित अवधि में दी गई सिफारिशों पर सरकार फिलहाल सक्रियता से विचार कर रही है और अंतर-मंत्रालय समिति को ही इस मामले को दुरुस्त करने का अधिकार दिया गया है.'

इसके बाद सरकारी मुलाजिमों द्वारा संपत्तियों और दायित्वों की घोषणा करने का मुद्दा भी है. लोकपाल और लोकायुक्त (संशोधन) कानून, 2016 के जरिए इस प्रावधान से जुड़ी धारा 44 में पिछली तारीख से संशोधन किया गया है. इससे मूल धारा 44 के तहत बने नियम अप्रासंगिक हो गए हैं.

सूत्रों के मुताबिक, धारा 44 के संशोधित प्रावधानों के तहत संपत्तियों और दायित्वों के ऐलान के तौर-तरीकों के लिए नियमों के मसौदे पर संसद की स्थाई समिति विचार कर रही है. सूत्रों ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'मई 2007 में संसदीय कार्य मंत्रालय के जरिये संसदीय समिति को नियमों का मसौदा भेजा गया था.'

Shakeel Ahmad

शकील अहमद

लोकपाल की नियुक्ति में देरी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद सरकार को किनारे करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने चौतरफा हमला किया. कांग्रेस नेता शकील अहमद ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि वह इस देरी से तनिक भी हैरान नहीं हैं, क्योंकि यह सरकार भ्रष्टाचार से निपटने को लेकर गंभीर नहीं है.

अहमद ने कहा, 'यह गुजरात से लेकर नीरव मोदी तक भ्रष्टाचार के सभी मामलों पर पर्दा डालने की सरकार की सोची-समझी कोशिश है. जब वे विपक्ष में थे, तो लोकपाल पर तत्काल अमल चाहते थे और यहां तक कि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का भी हिस्सा थे. अब वे फाइलों पर बैठे हैं.'

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