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SC/ST एक्ट पर NDA से भिड़कर अपनी दलित राजनीति बचाएंगे रामविलास?

केंद्रीय मंत्री और एनडीए सरकार का दलित चेहरा रामविलास पासवान अपनी ही सरकार से नाराज हैं. अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के साथ पूरे दम से खड़े होने के दो दिन बाद ही वो दलित मुद्दे पर सरकार के रवैये के खिलाफ हो गए हैं.

Updated On: Jul 24, 2018 09:39 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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SC/ST एक्ट पर NDA से भिड़कर अपनी दलित राजनीति बचाएंगे रामविलास?

केंद्रीय मंत्री और एनडीए सरकार का दलित चेहरा रामविलास पासवान अपनी ही सरकार से नाराज हैं. अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के साथ पूरे दम से खड़े होने के दो दिन बाद ही वो दलित मुद्दे पर सरकार के रवैये के खिलाफ हो गए हैं. सोमवार को उन्होंने अपने आवास पर एनडीए के कुछ दलित सांसदों से मुलाकात की. मुलाकात के बाद मीडिया से बोले कि जस्टिस आदर्श कुमार गोयल को एनजीटी का चेयरमैन बनाए जाने से गलत संदेश गया है. इस बारे में एनडीए के कई दलित सांसदों ने चिंता जताई है. जस्टिस एके गोयल सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए वही जज हैं, जिन्होंने एससी एसटी एक्ट में ढील देने वाला फैसला सुनाया था.

रामविलास पासवान के बेटे और सांसद चिराग पासवान ने भी कहा है कि वो सरकार से मांग करेंगे कि जस्टिस गोयल को उनके पद से हटाया जाए. चिराग पासवान का कहना है कि एससी-एसटी एक्ट को लेकर कई दलित संगठन 9 अगस्त को विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं. वो कहते हैं कि सरकार को एससी एसटी एक्ट को लेकर संसद में बिल लेकर आना चाहिए. ताकि बिल को फिर से ऑरिजनल फॉर्म में लाया जा सके. चिराग कहते हैं कि 7 अगस्त से पहले ही सरकार बिल लेकर आए ताकि 8 अगस्त को ऑर्डिनेंस जारी हो सके और 9 अगस्त को होने वाले विरोध प्रदर्शन को पहले ही रोक लिया जाए.

जस्टिस एके गोयल सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के उस बेंच में शामिल थे, जिसने एससी एसटी एक्ट में बदलाव को लेकर फैसला दिया था. जस्टिस एके गोयल के साथ इस बेंच में जस्टिस यूयू ललित शामिल थे. सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने 20 मार्च के अपने फैसले में एससी एसटी के कुछ कड़े प्रावधानों में छूट दी थी. बेंच ने अपने फैसले में एक्ट में दर्ज हुए मुकदमों में अग्रिम जमानत लेने का प्रावधान कर दिया था. साथ ही इस एक्ट में मुकदमा दर्ज होने से पहले प्राथमिक जांच किए जाने का प्रावधान भी जोड़ा था.

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दो जजों की बेंच ने माना था कि सख्त प्रावधानों की वजह से एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है. लोग व्यक्तिगत और राजनीतिक दुश्मनी निकालने के लिए इस एक्ट का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. इस जजमेंट का दलित नेताओं और उनके संगठनों ने विरोध किया. कहा गया कि अग्रिम जमानत और मुकदमा दर्ज करने से पहले जांच का प्रावधान जोड़कर इस एक्ट को कमजोर कर दिया गया है. ये दलित विरोधी फैसला है. इस फैसले का देशभर में विरोध हुआ. दलित संगठन सड़कों पर उतरे. केंद्र सरकार को विरोध की आंच में झुलसना पड़ा.

एससी-एसटी एक्ट में फेरबदल का फैसला सुनाने वाले जस्टिस एके गोयल 6 जुलाई को रिटायर हो गए. ठीक रिटायरमेंट के दिन सरकार ने उन्हें एनजीटी का चेयरमैन नियुक्त कर दिया. जस्टिस एके गोयल ने अपनी फेयरवेल स्पीच में भी एक्ट पर दिए अपने फैसले को सही ठहराया था. अपने विदाई समारोह में आदर्श कुमार गोयल ने कहा था कि अगर अदालतें निर्दोषों के मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकतीं तो अदालतों को बंद हो जाना चाहिए. उन्होंने कहा था कि अगर किसी व्यक्ति पर गलत इल्जाम लगाए जाते हैं तो क्या उस निर्दोष को गिरफ्तार होने दिया जाए?

एके गोयल अब एनजीटी के चेयरमैन हैं और सरकार में सहयोगी दल की भूमिका निभा रहे रामविलास पासवान की पार्टी पूछ रही है कि एक विवादास्पद फैसला देने वाले जज पर सरकार इतनी मेहरबान क्यों है? एक्ट में बदलाव को लेकर दलित समाज सरकार से पहले ही नाराज है. 2019 का चुनाव नजदीक है. सवाल इसलिए अहम हो गया है कि दलित राजनीति करने वाले नेता सरकार के ऐसे फैसलों का बचाव कैसे करेंगे.

सोमवार को अपने आवास पर एनडीए के कुछ दलित नेताओं से मुलाकात के बाद रामविलास पासवान ने मीडिया से कहा, ‘काफी सदस्यों ने ये मामला उठाया कि जिस जज ने ये जजमेंट दिया, दलित एक्ट के संबंध में और उसके बाद यूजीसी के संबंध में. उनको ट्रीब्यूनल का चेयरमैन बना दिया गया है तो उस पर भी लोगों ने चिंता व्यक्त किया कि इस से गलत संदेश जाता है.’

दलितों विषयों पर लगातार काम करने वाले लोग भी सरकार के इस फैसले की मुखालफत करते हैं. जेएनयू के एसोशिएट प्रोफेसर और दलित मामलों के जानकार गंगा सहाय मीणा कहते हैं, ‘लोकतंत्र के हक में ये बात है कि किसी भी जज को रिटायरमेंट के बाद लाभ के पद पर नहीं नियुक्त किया जाना चाहिए. इससे सरकार के साथ उनके रिश्तों पर सवाल उठते हैं. और उसके फैसलों पर लोग अंगुली उठा सकते हैं. इसलिए इस तरह की चीजों से सरकार और न्यायाधीशों को भी बचना चाहिए. खासतौर पर जब इतने संवेदनशील मामले पर जज ने फैसला दिया है तो उनकी नियुक्ति पर संदेह पैदा होता है. रामविलास जी का सवाल जायज है.’

हालांकि इसके साथ ही वो रामविलास पासवान की मंशा को भी कटघरे में खड़ा करते हैं. वो कहते हैं कि सत्ता में भागीदार रहे रामविलास पासवान को भी अपनी समीक्षा करनी चाहिए. रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी एनडीए सरकार में शामिल रही है. सरकार के हर फैसले के प्रति उनकी भी जवाबदेही बनती है. ऐसे में अगर उनसे दलित हितों के मुद्दों पर सवाल पूछे जाएंगे तो मुश्किल होगी. एससी-एसटी एक्ट में बदलाव सुप्रीम कोर्ट ने किया है, इसमें सरकार क्या कर सकती है? इस जवाब के साथ अब तक केंद्र सरकार के साथ रामविलास पासवान जैसे सरकार में शामिल दलित नेता बचते रहे हैं. लेकिन सरकार के उस फैसले का बचाव करना मुश्किल हो जाएगा, जिसमें एके गोयल जैसे जजों को तोहफे के तौर पर एनजीटी चेयरमैन की कुर्सी दी जाती है.

REUTERS

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दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोशिएट प्रोफेसर डॉ. सुबोध कुमार इस मुद्दे को ज्यादा विस्तार नजरिए से देखते हैं. वो कहते हैं, ‘जजों की नियुक्ति का जो कॉलेजियम सिस्टम है, उसकी वजह से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की कुर्सी पर सिर्फ गिने चुने 500 घरानों के लोग ही चुने जा रहे हैं. ये विल ऑफ पीपल्स (लोगों की इच्छा) को रिप्रजेंट नहीं करता है. ये सर्कुलेशन ऑफ इलीट (कुलीन तबके का आपसी बंटवारा) है. एनजीटी का चेयरमैन भी इसी हिसाब से चुना जा रहा है. रामविलास पासवान पहले भी कहते रहे हैं कि हमारे लोग ( दलित समुदाय ) न्याय प्रणाली में नहीं हैं. इसलिए उनके समाज की अनदेखी होती है. तो एनजीटी में एके गोयल की नियुक्ति को उस आधार पर भी वो देख रहे हैं. एक तो न्यायपालिका में दलितों की हिस्सेदारी नहीं है. उस पर से एससी एसटी एक्ट को कमजोर करने वाला फैसला देने वाले जज को एनजीटी का चेयरमैन बना दिया जाता है. इस पर दलित समाज के प्रबुद्धजनों का विरोध होना लाजिमी है.’

ये बड़ी बहस का विषय है. ये कहा जा सकता है कि 2019 के चुनावी साल को देखते हुए रामविलास पासवान जैसे दलित नेता अपने समुदाय के हितों को साधने वाले मुद्दे उठाने लगे हैं. भले ही वो सरकार के सामने परेशानी खड़ी करने वाला ही क्यों न हो. लेकिन बात इससे आगे की है. सरकार में शामिल एलजेपी कह रही है कि अगर एससी एसटी एक्ट को लेकर संसद में बिल नहीं लाया जाता है तो दलित संगठन 9 अगस्त को सड़क पर उतरेंगे. पिछले साल अगस्त के महीने में ही जबरदस्त दलित आंदोलन हुआ था. एक्ट के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शऩ में कई जगहों से हिंसा की खबरें आई थीं. अगर दोबारा इसी तरह की घटनाएं हुईं तो ये दुखद होगा.

रामविलास पासवान ने कहा है कि सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री मोदी से इस संबंध में मुलाकात करेगा. चिराग पासवान ने कहा कि ‘दलित समुदाय के भीतर गुस्सा बढ़ा है. क्योंकि जिस जज ने एससी एसटी एक्ट को कमजोर करने वाला फैसला दिया उसे एनजीटी का चेयरमैन बना दिया गया. हमें इस बात पर विरोध है. उन्हें इस पद से हटाया जाना चाहिए. मैं एलजेपी का नेता होने के नाते उन्हें पद से हटाए जाने की मांग करूंगा.’

हालांकि एक जज के इर्द गिर्द बहस को समेटकर दलितों का रहनुमा बनने की जैसी कोशिश चल रही है बात उससे कहीं आगे की है. डॉ सुबोध कुमार कहते हैं कि दलितों के मसले पर साल दो हजार में करिया मुंडा की एक रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि न्यायपालिका में महिलाएं, मुस्लिम समुदाय, ओबीसी, दलित और एसटी लगभग न के बराबर हैं. सुप्रीम कोर्ट में पिछले 18 साल में बालाकृष्णन अंतिम दलित जज थे. इस तरह के मामले सामने आने पर करिया मुंडा की रिपोर्ट याद आती है.

केजी बालाकृष्णन

केजी बालाकृष्णन

वो इस सबके पीछे न्यायपालिका के कॉलेजियम सिस्टम के मकड़जाल को मानते हैं. वो कहते हैं कि जज जिस बैकग्राउंड से आते हैं उसी के आधार पर जजमेंट देते हैं. दलितों के लिए संवेदनशीलता की अपेक्षा रखना बेकार है. दरअसल जजमेंट देने की प्रक्रिया और जजेज की नियुक्ति की प्रक्रिया डिसेंट्रीलाइज नहीं है, ट्रांसपैरेंट नहीं है. ये पूरा प्रोसेस हाईजैक किया हुआ है. मोदी सरकार ने 2014 में नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन बनाया था. 2017 में इसको लेकर एक्ट भी बना. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम ने इसे नल एंड वॉयड कर दिया. कोर्ट ने इसे अपना अधिकार छीनने वाला बताया था. इसी परिस्थिति के चलते देश की न्यायव्यवस्था में वैसे लोकतंत्र का अभाव है जैसी देश के अन्य संवैधानिक संस्थाओं में देखऩे को मिलती है.

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