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सेक्युलर और लिबरल लोगों को एक होना होगा: प्रकाश झा

सेंसर बोर्ड, पॉलिटिकल ड्रामा और असहिष्णुता पर प्रकाश झा से बातचीत

Runa Ashish Updated On: Mar 24, 2017 12:23 PM IST

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सेक्युलर और लिबरल लोगों को एक होना होगा: प्रकाश झा

राजनीति, अपहरण और सत्याग्रह जैसी फिल्में बनाने वाले प्रकाश झा इन दिनों 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' के निर्माता के तौर पर परेशान हैं. सेंसर बोर्ड ने फिल्म को रिलीज करने से मना कर दिया है. देश और विदेशों में लगभग एक दर्जन अवार्ड जीतने वाली फिल्म का भविष्य अभी भी अपने देश में धुंधला दिखता है. इसी बारे में प्रकाश झा से बात की फर्स्टपोस्ट की संवाददाता रूना आशीष ने:

आगे अब फिल्म लिप्स्टिक अंडर माय बुर्का का आगे भविष्य क्या होगा?

सेंसर बोर्ड को ये कह सकता हूं कि अब आप रोक नहीं सकते किसी भी चीज को. फिल्म ट्रिब्यूनल में गई है वहां से क्लियर हो जाएगी.

ये विवाद शुरु कहां से हुआ था?

मैं तो पुराना भुक्तभोगी हूं. इस फिल्म को लेकर मुझे आश्चर्य तब हुआ था जब रिवाइजिंग कमेटी ने पूरी तरह से फिल्म को नकार दिया और बोला कि पूरी फिल्म ही हम पास नहीं करेंगे. ये हमारे समाज के मापदंड पर खरी नहीं उतरती है या हमारी मानसिकता इसे पास करने को परमिट नहीं करती है. ये भी तब हुआ जब इसे एक या दो पुरस्कर भी मिल गए थे. जब फिल्म बनाई जा रही थी मैंने तभी अलंकृति को कह दिया था कि फिल्म बड़ा नाम करेगी क्योंकि तुमने फिल्म में वो कहा है जो आज तक किसी ने कहा नहीं और वो भी इस नजरिए से तो नहीं.

Lipstick under my burqa burkha

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हाल ही में देश में बहुत बड़ी राजनैतिक हलचल हुई है उत्तर प्रदेश में चुनाव और योगी आदित्यनाथ का सीएम पद पर शपथग्रहण. उसके बारे में आपका क्या नजरिया है?

इतना बड़ा ड्रामा मैंने नहीं देखा. मैं तो देख-देखकर हंसता रहा. क्या कमाल का सजा सजाया नाटक था. जिसका अंत ये था कि मुख्यमंत्री के शपथग्रहण समारोह में मुलायम भी आते हैं और अखिलेश भी आते हैं. इसका अंतिम पटाक्षेप ये होता है कि मुलायम सिंह प्रधानमंत्री के कान में कुछ कहते हैं और प्रधानमंत्री अखिलेश की पीठ ठोकते हैं. मतलब सेटिंग यहां तक हुई थी.

जिस तरह पूरी दुनिया का माहौल है. उदार और धर्मनिरपेक्ष मान्यताओं को बहुत गहरी मार लग रही है. लोगों का विश्वास इनपर से उठता जा रहा है. लोग आज मजबूत और कंजर्वेटिव लीडर पसंद आने लगे हैं. सिर्फ पसंद ही नहीं आ रहे बल्कि लोग उन्हें चुन भी रहे हैं.

वर्ना लोग अमेरिका में ट्रंप को नहीं चुनते या इंग्लैंड में ब्रेक्जिट नहीं होता. टर्की में अर्दोवान नहीं आ सकता था. फिलिपींस में दुतेर्ते की सरकार नहीं बन सकती थी. फ्रांस में आज मेरी पेंस इस तरह से बात नहीं कर सकती थीं. रूस में इतने सालों से पुतिन राज नहीं कर रहा होता.

सेक्युलर और लिबरल साइकोलॉजी फेल कर चुकी है. अब इस सच को वापस लाना होगा. उस तरह की सोच वालों को लिए ये वेकअप काल है. लेकिन इस सोच को नए तरीके से वापस लाना होगा. हो सकता है कि चुने गए लोग कुछ नया करें.

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लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने तो अभी हाल ही में कहा है कि सरकार बनती बहुमत से हैं लेकिन चलती सर्वमत से हैं.

सौ प्रतिशत. लेकिन मत जो है वो मेजॉरिटी की चलेगी.जब एक गांव में सात शेर हों और एक बकरी हो तो सात शेरों का बहुमत सही तो नहीं हो सकता है. उनकी मेजॉरिटी जरूर है. ये मैं नहीं कहता हूं ये तो इन दिनों सामाजिक उद्वेलन चल रहा है. ये किसी एक जगह की बात नहीं है . दुतेर्ते जो एक राष्ट्रपति है वो मोटर साइकिल पर बैठकर जाता है और ड्रग वालों को गोली मार देता है उस आदमी को लोगों ने मिलकर राष्ट्रपति बना दिया.

Indian Prime Minister Narendra Modi and US President Donald Trump

तो क्या हीरोज की कमी हो गई है?

ये ही तो नए हीरो हैं. ट्रंप ही तो नया हीरो है. देखिए दो तरह के एलीट होते हैं दुनिया में एक तो राजनैतिक अभिजात वर्ग और दूसरा सांस्कृतिक अभिजात वर्ग. दुनिया के 80% आम लोग जानते हैं कि दौलत तो 1% धनाढ्य लोगों के पास हैं बावजूद उसके कभी इन धनाढ्य लोगों के खिलाफ आवाज नहीं उठती है.

लेकिन एक लेखक जो कुछ लिख दे, या एक फिल्मकार कोई फिल्म बना दे या एक पत्रकार कुछ विवादास्पद लिख दे तो देखो उसे कैसी गालियां पड़ती हैं और कैसे लोग उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं. आज के समय में सांस्कृतिक अभिजात्य वर्ग खतरे में है. बड़े-बड़े लोग कई हजार करोड़ रुपए किसी एक फोन को लॉन्च करने में लगा देते हैं कोई आवाज नहीं उठती है. या कभी कोई अपनी पत्नी को एक एरोप्लेन गिफ्ट कर देता है कोई आवाज नहीं उठती है. लेकिन मेरी बच्ची एक फिल्म तो बना दे. भोपाल में लोग फतवा जारी कर देते हैं. इसलिए कहता हुं कि सांस्कृतिक अभिजात्यवाद बर्दाश्त नहीं होता है.

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प्रकाश झा अब खुद किस विषय पर अपना नजरिया दिखाने वाले हैं?

मैं अब एक नई फिल्म कर रहा हूं. अभी तो लिखना पूरा नहीं हुआ लेकिन ये देश के आध्यात्म पर केंद्रित फिल्म होगी, जो देश और विदेश में भारतीय आध्यात्म के बारे में बात करेगी और इसके प्रभाव के बारे में बात करेगी. इसके अलावा मैं नर्मदा नदी पर भी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बना रहा हूं. इस समय मेरी एक यूनिट मानेसर में शूट कर रही है जो मध्यप्रदेश में बसी नर्मदा की कहानी बताएगी.

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