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साल भर पहले आज ही के दिन हिंसा की आग में जल उठा था भीमा-कोरेगांव

पिछले साल की घटना से सबक लेते हुए भीमा कोरेगांव युद्ध की 201वीं वर्षगांठ पर पुलिस-प्रशासन अलर्ट पर हैं. कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए विजय स्तंभ और आसपास लगभग 7000 सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं

Updated On: Jan 01, 2019 04:47 PM IST

FP Staff

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साल भर पहले आज ही के दिन हिंसा की आग में जल उठा था भीमा-कोरेगांव

भीमा कोरेगांव युद्ध की आज यानी 1 जनवरी को 201वीं वर्षगांठ है. इस अवसर पर अनुसूचित जाति के लोग बड़ी संख्या में पुणे शहर से 40 किलोमीटर दूर विजय स्तंभ पर जुट रहे हैं.

पिछले वर्ष की तुलना में इस बार यहां सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए हैं. विजय स्तंभ और आस-पास बड़ी संख्या में तैनाती की गई है मगर पिछले साल इसकी 200वीं वर्षगांठ पर जमकर हिंसा और आगजनी हुई थी. दलितों और उच्च जाति (ब्राह्मण) के लोगों के बीच झड़प और मारपीट हुई थी. इस हिंसा में 30 वर्षीय राहुल फटांगले नाम के एक युवक की जान चली गई थी.

बाद में पुणे पुलिस ने घटना की जांच करते हुए इस संबंध में अहमदनगर जिले से 3 लोगों को गिरफ्तार किया था.

भीमा-कोरेगांव हिंसा की घटना के बाद पूरा महाराष्ट्र अगले 3-4 दिन तक इससे प्रभावित रहा था. इस दौरान सैकड़ों करोड़ रुपए की सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा था.

इसी साल 1 जनवरी को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में हिसा और जातीय तनाव भड़क उठा था

1 जनवरी, 2018 के दिन पुणे के पास भीमा-कोरेगांव में भड़की हिंसा और जातीय तनाव में एक युवक की मौत हो गई थी

भीमा कोरेगांव हिंसा का माओवादी कनेक्शन आया सामने

मामले की जांच कर रही पुणे पुलिस ने अगस्त 2018 में देश के अलग-अलग हिस्सों में छापेमारी कर 5 वामपंथी विचारकों पी.वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फेरेरा, गौतम नवलखा और वेरनोन गोन्जाल्विस को गिरफ्तार किया था.

पुणे पुलिस का आरोप है कि इन पांचों ने एल्गार परिषद सम्मेलन में सहायता की थी जिसके बाद हिंसा फैली. इन गिरफ्तारियों ने देश की राजनीति में उबाल ला दिया था. विपक्षी पार्टियों ने केंद्र और महाराष्ट्र सरकार पर अनुसूचित जाति को निशाना बनाने का आरोप लगाया.

पकड़े गए वामपंथी विचारकों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल सुनवाई चल रही है.

भीमा-कोरेगांव युद्ध का इतिहास

1 जनवरी, 1818 को भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों की सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हजार सैनिकों को हराया था. ब्रिटिश सेना में अधिकतर महार समुदाय के जवान थे. इतिहासकारों के मुताबिक, उनकी संख्या 500 से ज्यादा थी. इसलिए दलित समुदाय इस युद्ध को ब्रह्माणवादी सत्ता के खिलाफ जंग मानता है. तब से हर साल 1 जनवरी को दलित नेता ब्रिटिश सेना की इस जीत का जश्न मनाते हैं. इतिहासकारों के मुताबिक, 5 नवंबर, 1817 को खड़की और यरवदा की हार के बाद पेशवा बाजीराव द्वितीय ने परपे फाटा के नजदीक फुलगांव में डेरा डाला था. उनके साथ उनकी 28 हजार की सेना थी, जिसमें अरब सहित कई जातियों के लोग थे, लेकिन महार समुदाय के सैनिक नहीं थे.

दिसंबर 1817 में पेशवा को सूचना मिली कि ब्रिटिश सेना शिरुर से पुणे पर हमला करने के लिए निकल चुकी है. इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों को रोकने का फैसला किया. 800 सैनिकों की ब्रिटिश फौज भीमा नदी के किनारे कोरेगांव पहुंची. इनमें लगभग 500 महार समुदाय के सैनिक थे.

1 जनवरी, 1818 की सुबह पेशवा और ब्रिटिश सैनिकों के बीच यहां भीषण युद्ध हुआ. इसमें ब्रिटिश सेना ने पेशवाओं पर जीत हासिल की थी. इस युद्ध की याद में अंग्रेजों ने 1851 में भीमा-कोरेगांव में एक स्मारक का निर्माण कराया. हर साल 1 जनवरी को इस दिन की याद में दलित समुदाय के लोग यहां जमा होते हैं.

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