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कुशीनगर एक्सीडेंट: एक चूक ने छीन ली 13 मासूम जिंदगियां, इस हादसे का गुनहगार कौन

कुशीनगर में गुरुवार सुबह बड़ा हादसा हुआ, यहां एक स्कूल वैन मानव रहित क्रॉसिंग पर पैसेंजर ट्रेन से टकरा गई, जिस कारण 13 बच्चों की मौत हो गई

Subhesh Sharma Updated On: Apr 26, 2018 11:25 AM IST

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कुशीनगर एक्सीडेंट: एक चूक ने छीन ली 13 मासूम जिंदगियां, इस हादसे का गुनहगार कौन

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में गुरुवार की सुबह कई परिवारों से उनके जीने की वजह छीन ले गईं. यहां विशुनपुरा के दुदही में मानव रहित क्रॉसिंग पर एक स्कूल वैन पैसेंजर ट्रेन से टकरा गई और इस हादसे में स्कूल जा रहे 13 मासूमों की मौत हो गई. माता-पिता सदमे में हैं कि आज उनकी आंखों का तारा उन्हें छोड़कर चला गया. ये हादसा दिल दुखाने वाला है. सरकार की ओर से मुआवजे का ऐलान तो कर दिया गया है. लेकिन गलतियां सुधारने की दिशा में अभी तक कोई काम नहीं हो रहा है. सरकार और रेलवे के खिलाफ ये सवाल उठना लाजमी है कि आखिर कब तक इन हादसों में जाती रहेंगी लोगों की जान...

कोई सीख नहीं ली

दो साल पहले ऐसा ही हादसा भदोही जिले में भी हुआ था. यहां भी एक मानव रहित क्रॉसिंग पर स्कूल वैन की ट्रेन से टक्कर हो गई थी. इस दर्दनाक हादसे में भी 13 बच्चों की मौत हो गई थी. हादसा भदोही में मडुआडीह-इलाहाबाद पैसेंजर ट्रेन और एक निजी स्कूल की मिनी वैन से टक्कर के बाद हुआ था. जिसके बाद गुस्साई भीड़ ने वैन में आग लगा दी थी.

गेट मित्र भी फेल

देश भर में यूपी में पिछले कुछ सालों में सबसे ज्यादा ट्रेन हादसे हुए हैं. 2016-17 रेल हादसों का साल रहा. सैंकड़ों लोगों की जान गई. ज्यादातर हादसे ट्रेन के पटरी से उतरने और मानव रहित क्रॉसिंगों के कारण हुए. मानव रहित क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने 79 मानव रहित क्रॉसिंग पर 189 गेट मित्र भी तैनात किए हैं. लेकिन हादसों में कमी अभी भी देखने को नहीं मिल रही है. जीआरपी आगरा डिविजन में 2016 से 2017 नवंबर तक 282 लोगों की मौत ट्रेन की चपेट में आने से हुई है. हालांकि इसमें सभी मौतें क्रॉसिंग पर नहीं हुई हैं, कुछ रेलवे ट्रैक पर हुईं, तो कुछ मामले खुदकुशी के भी हैं.

केरल से लेनी होगी सीख

मानव रहित क्रॉसिंग को पूरी तरह से खत्म करने के लिए उत्तर प्रदेश को केरल से सीख लेनी चाहिए. केरल में एक भी जगह मानव रहित क्रॉसिंग नहीं है. भारतीय रेलवे द्वारा जारी आंकड़ों की माने तो 40 फीसदी मौतें मानव राहित क्रॉसिंग्स पर होती हैं. केरल सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए राज्य के आखिरी बचे मानव रहित क्रॉसिंग को भी अप्रैल में खत्म कर दिया. इसके अलावा ओडिशा में भी खुरदा रोड डिविजन को भी मानव रहित क्रॉसिंग से मुक्ति दिलाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं.

इंफ्रास्टक्चर नहीं, बढ़ाई जाती है केवल गाड़ियों की संख्या

पिछले 30-40 सालों से ट्रेनों के नंबर लगातार बढ़ते जा रहे है. हर नई सरकार आने पर नया मंत्री और सांसद अपने इलाके में नई गाड़ियां चाहता है. सरकार को मजबूरी में नई गाड़ियां चलानी पड़ती हैं. एक तरफ इंफ्रास्टक्चर नहीं बढ़ाया जाता और गाड़ियों की संख्या बढ़ाई जाती है. स्टाफ को मेंटिनेंस का टाइम नहीं मिलता है. साथ ही सब गाड़ियों को टाइम पर चलाने के लिए उन पर बहुत प्रेशर रहता है. अगर वो गाड़ियां देरी से चलाते हैं तो उनको चार्जशीट मिलती है. जिससे स्टाफ के दिमाग पर प्रेशर पड़ता है और गलती करने से दुर्घटना हो जाती है. कई बार वे लोग शार्ट-कट करते हैं. ज्यादातर शार्ट-कट सफल हो जाते हैं पर कुछ शार्ट-कट में असफल हो जाते हैं. उस समय एक्सीडेंट हो जाते हैं.

तीन सख्त कदम उठाने की है जरूरत

पहला: गाड़ियों को तब तक उस रेलवे लाइन पर नहीं बढ़ाया जाना चाहिए जब तक उस लाइन की कैपेसिटी नहीं बढ़ा दी जाती. भारतीय रेल के कई सेक्शन ऐसे हैं जहां नियम के तहत 100 गाड़ियां चलनी चाहिए वहां 150 गाड़ियां चलाई जा रही हैं. मंत्री और सांसदों के ऐसे डिमांड पर लगाम लगाया जाना चाहिए.

दूसरा: इंफ्रास्ट्रक्चर पर और खर्चा करना चाहिए. कुछ कदम तो सरकार ने सही उठाए हैं. एलआईसी से जो एक लाख करोड़ रुपए का लोन लिया है. उसको डबलिंग के कामों और सिग्नलिंग सिस्टम पर किए जा रहे हैं. लेकिन, अभी भी रेलवे को ठीक करने के लिए जितने पैसे की जरूरत है, वह अभी भी अपर्याप्त हैं. रेलवे को दुरुस्त करने के लिए और पैसे चाहिए.

तीसरा: भारत के लोगों को कायदे और कानून माननी आनी चाहिए. शहर के ट्रैफिक से लेकर रेलवे के नियम कायदों को भी लोग नहीं मानते हैं. ट्रेन के साथ-साथ गाड़ियां चलाना, रेलवे फाटक को पार करना. जब तक इनडिसिप्लिन को ठीक नहीं किया जाएगा, इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी. भारत के लोगों को डिसिप्लिन में रहना पड़ेगा.

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