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Kumbh 2019: 'जयति प्रयाग' उद्घोष के बीच नौ विदेशी संतों की दी गई महामंडलेश्वर की उपाधि

राम मंदिर मामले के पक्षकार निर्मोही अखाड़े की ओर से नौ विदेशी साधुओं का पट्टाभिषेक कर उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई है

Updated On: Feb 09, 2019 06:02 PM IST

Utpal Pathak

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Kumbh 2019: 'जयति प्रयाग' उद्घोष के बीच नौ विदेशी संतों की दी गई महामंडलेश्वर की उपाधि

प्रयागराज में चल रहे अर्धकुंभ मेले में हिंदुत्व के कई रंग आपस में हिले-मिले दिखाई दे रहे हैं, संतों-महंतों और सामान्य जनमानस की ओर से अपने-अपने तौर-तरीकों से हिंदुत्व के प्रति अनुराग प्रदर्शन भी अनवरत चल रहा है. ऐसे में कुछ अनूठे आयोजन भी इस अर्धकुंभ रूपी महाआयोजन का हिस्सा बनकर देश दुनिया को चकित कर देने के लिए काफी हैं.

शुक्रवार के दिन प्रयागराज के अर्धकुंभ मेले में राम मंदिर मामले के पक्षकार निर्मोही अखाड़े की ओर से किए गए 9 विदेशी साधुओं के पट्टाभिषेक को इस मेले की सर्वाधिक चर्चित गतिविधि के रूप में देखा जा रहा है.

विदेशी संतों के इस पट्टाभिषेक समारोह में सभी 13 अखाड़ों के साधु-संतों समेत अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी के अलावा बड़ी संख्या में विदेशी श्रद्धालु भी शामिल हुए. निर्मोही अखाड़े ने शुक्रवार को जिन 9 विदेशी संतों का पट्टाभिषेक किया, उनमें तीन महिलाएं भी शामिल हैं. परंपरा के अनुसार इन सभी विदेशी संतों को सबसे पहले अखाड़े के प्रमुख व दूसरे महामंडलेश्वरों ने दीक्षा दी, इसके बाद इनकी चादरपोशी की रस्म हुई. अखाड़े के वरिष्ठ पदाधिकारियों समेत सभी 13 अखाड़ों के प्रमुखों व श्रीमहंतों ने इन नए महामंडलेश्वरों को माला पहनाकर अखाड़े के फैसले पर अपनी सहमति दर्ज कराई.

6 विदेशी पुरुषों और 3 महिलाओं को दी गई महामंडलेश्वर की उपाधि

विदेशी संतों के इस समूह में 6 पुरुष हैं जिनमें फ्रांस के एंडर मॉनोसमी उर्फ जयेन्द्र दास, अमेरिका के जोनाथन मिशेल उर्फ जीवननंदा दास, इजराइल के डारन शैनॉन उर्फ ध्यानानंदा दास, अमेरिका के टेलर सैमुअल फ्रीडमैन उर्फ त्यागानंदा दास, एरिजोना के पीटर उर्फ स्वामी परमेश्वरानंद और एलेक्जेंडर जॉन उर्फ अनंतानंद दास को महामंडलेश्वर की उपाधि से विभूषित किया गया है. इनके अतिरिक्त 3 विदेशी मूल की महिलाओं में टोक्यो जापान की रेक्यों उर्फ राजेश्वरी देवी, दक्षिण अमेरिका की जैमी एलीन उर्फ श्रीदेवी दासी और अमेरिका की लीला मारिया उर्फ ललिता श्रीदासी को भी महामण्डलेश्वर की उपाधि से विभूषित किया गया है.

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विदेशियों को महामण्डलेश्वर जैसी महत्वपूर्ण उपाधि दिए जाने के बाबत अखिल भारतीय पंच निर्मोही अखाड़ा के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत राजेंद्रदास ने स्पष्ट किया कि 'हमारी संस्कृति पूरे विश्व का कल्याण चाहती है, इसी कारण से विदेशी भी हमारी सनातन परंपरा से अभिभूत होकर जुड़ रहे हैं. शुक्रवार को नौ विदेशी संन्यासियों का अखाड़े ने महामंडलेश्वर अभिषेक किया है, अब वे दुनिया भर में सनातन धर्म का प्रचार प्रसार करेंगे और ज्यादा से ज्यादा लोग आकर्षित होकर हिंदू धर्म से जुड़ेंगे.'

लक्ष्मी देवी साईं मां की शिष्य परंपरा के हैं संत

दो दशक से अधिक समय तक धर्म की ध्वजा उठाए रखने के बाद शुक्रवार को जब इन 9 विदेशी संन्यासियों को अखाड़ों की सबसे बड़ी उपाधि महामण्डलेश्वर से विभूषित किया गया तो उनमे से अधिकांश की आंखों से आंसू छलक रहे थे. लक्ष्मी देवी साईं मां की शिष्य परंपरा के ये 9 संत आज भले ही उनकी संस्था से जुड़कर हजारों विदेशियों को हिंदू धर्म से जोड़ने का काम कर रहे हैं. लेकिन इनके पिछले जीवन में इनके रोजगार और व्यवसाय का धर्म से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था.

इनमें फ़्रांस के जयेंद्र दास कभी इंजीनियर और इलेक्ट्रिकल केमेस्ट्री के विशेषज्ञ थे, अमेरिका के मूल निवासी अनंतनन्द दास स्नातक शिक्षा के दौरान ही इस समूह से कुछ वर्ष पहले जुड़ गए थे. वूमन स्टडी से स्नातक अमेरिका की निवासी श्रीदेवी दासी सात साल की आयु में ही महर्षि महेश योगी संस्थान से जुड़ गई थीं और अब वे सांई मां की सेवा में हैं. अमेरिका के ही एक अन्य संत परमेश्वर दास पहले मनोविज्ञान के विशेषज्ञ थे, इनके अलावा अमेरिका के त्रिवेणी दास मनोविज्ञान से स्नातकोत्तर हैं और इसी देश के जीवन दास चिकित्सक और पर्वतारोही रहे हैं. जापानी मूल की राजेश्वरी मां पेशे से जर्मन, जापानी और अंग्रेजी की शिक्षिका थीं, इज़राइल के दयानंद दास विज्ञान से स्नातक हैं. श्रीदेवी दासी ने हमें बताया 'मैं एक शिक्षिका के रूप में अमेरिका, भारत, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया, जापान, बालविया में हिंदू धर्म संस्कृति का प्रचार प्रसार कर चुकी हूं. मैंने अपनी मातृभूमि चिली में भी एक आश्रम की स्थापना की है और मेरा ध्येय पूरे विश्व में सनातन धर्म का प्रचार करना है.'

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लेकिन इस महाआयोजन के पीछे का असल प्रयास विदेशी मूल की महिला संत जगद्गुरु लक्ष्मी देवी सांई मां की ओर से किया गया है. अर्ध कुंभ मेले में जगद्गुरु सांई मां का कैंप न सिर्फ अपनी सुंदरता और बनावट के लिए सबके आकर्षण का केंद्र है बल्कि श्वेत परिधानों में सेवारत सैकड़ों की संख्या में विदेशी अनुयायियों की मौजूदगी भी देखने वालों के लिये कौतूहल का विषय है. पट्टाभिषेक कार्यक्रम के दो दिन पूर्व इस कैंप का अवलोकन करने के क्रम में जगद्गुरु सांई मां फ़र्स्टपोस्ट को एक सारगर्भित साक्षात्कार देते हुए जब हिंदुत्व के प्रति अपनी विचारधारा को बता रही थीं तो उनकी आँखों की चमक उनकी इस उपलब्धि का प्रमाण थी.

महिला संत होने की दुश्वारियां सहकर आज विदेशियों को सनातन धर्म से जोड़ रही हैं सांई मां

कैंप में जाने पर सूचना प्राप्त हुई कि जगद्गुरु सांई मां एक विशेष प्रयोजन के अनुसार दैनिक रूप से कुछ घंटों के लिए मौन व्रत धारण करती हैं. प्रतीक्षा करने के क्रम में अमेरिका की लीला मारिया उर्फ ललिता श्रीदासी और अमेरिका के ही एलेक्जेंडर जॉन उर्फ अनंतानंद दास से बातचीत के दौरान हिंदुत्व के प्रति झुकाव और सांई मां के प्रति आस्था पर चर्चा हुई. लीला मारिया ने दो दिन बाद होने वाले आयोजन को अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हुए कहा कि 'अब मुझे मानवता की सेवा का असली मौका मिल रहा है, मानवता को सशक्त बनाने और मानवीय पीड़ा को कम करने के लिए विश्वभर में अभियान चलाने का मौका मेरे सामने है. मुझे मेरी गुरु मां ने सिखाया है कि सेवा और दया ही लोगों को जीने का सहज मार्ग बताती है, भौतिकता और आधुनिकता के इस दौर में हमें सामंजस्य बिठाने की जरूरत है. आशा करती हूं कि मैं इस जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक से कर पाऊंगी.'

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हिंदू धर्म के प्रति जागे अनुराग के संदर्भ में पूछे गए एक सवाल पर उनके साथ ही महामण्डलेश्वर बनने वाले एलेक्जेंडर जॉन उर्फ अनंतानंद दास मुस्कुराकर कहते हैं, 'हिंदू धर्म के प्रति अनुराग होने के पीछे कोई एक कारण हो तो बताएं, लेकिन ये जान लीजिए कि अब शायद हमारा यह दूसरा जन्म हुआ है और इस नए जीवन में हम सिर्फ हिंदू धर्म और सेवा भाव का प्रचार प्रसार करना ही मेरे लिये सबसे बड़ा संकल्प है. गुरु की सेवा करके उनका विश्वास हासिल करना ही हमारा एक मात्र लक्ष्य है और हम महामंडलेश्वर की पदवी पाने के बाद इस पद का किसी भी तरह से दुरुपयोग नहीं करेंगे, बल्कि सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार का ही कार्य करेंगे.'

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इन दोनों विदेशी मूल के संतों से बातचीत के बाद हमें सूचित किया गया कि सांई मां का मौन व्रत खत्म हो चुका है और हमें उनके कक्ष की तरफ ले जाया गया. श्वेत एवं पीताम्बर परिधान में लिपटी और खड़ाऊ पहन कर धीरे धीरे बाहर आती हुई सांई मां अपने कक्ष से निकलकर एक झूले पर आकर बैठ जाती हैं और हमें अपने समीप आने का आग्रह करती हैं. बातचीत के क्रम में कई बार उनके मुंह से सेवा, हिन्दुत्व, राजनीति और प्रेम जैसे शब्द निकलते हैं लेकिन हर एक वाक्य के बाद उन्होंने जोर देकर ऊर्जा के सही इस्तेमाल करने का अपना मंतव्य स्पष्ट करने की कोशिश की.

हिंदुत्व की सेवा के लिए अपने संकल्प और अपना धार्मिक इतिहास बताने के क्रम में सांई मां कहती हैं कि 'मानवता को सशक्त बनाने, और मानवीय पीड़ा को कम करने के उद्देश्य से जब मैंने वैराग्य का रास्ता चुना तो एक महिला होने के नाते ये मेरे लिए मुश्किल और चुनौती भरा था. जब मुझे विश्व की पहली महिला महामण्डलेश्वर की उपाधि मिली तो खुश होने वाले कम और कुपित होने वाले लोग अधिक थे. लेकिन मैं डरी नहीं, और मानव शरीर को जीवन-मरण के भवचक्र से मुक्ति दिलाने की कोशिश करते हुए सामान्य जनमानस के जीवन की राह प्रशस्त करने के कार्य में लगी रही.'

विदेशी लोग आकर्षित हो रहे हैं और सनातन धर्म का प्रचार कर रहे हैं

विदेशी मूल के लोगों हिंदुत्व के प्रति आकर्षण बढ़ने के सवाल पर सांई मां कहती हैं कि 'देखिए हमारा सनातन धर्म वैश्विक एकता और करूणा का सार्वभौमिक संदेश देता है. ऐसे में हमारे विशाल और विराट हिंदू धर्म को सिर्फ एक देश मात्र या एक उपमहाद्वीप तक सीमित क्यों रहने दिया जाए? अगर विदेशी मूल के लोग हिंदुत्व और सनातन धर्म से आकर्षित होकर हमारी विचारधारा को आत्मसात करते हैं तो उन्हें आगे आने का मौका दिया जाना चाहिए.'

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'एक महिला होकर पुरुषों के बीच बैठकर हिंदू धर्म की बात करना आज से डेढ़ दशक पहले कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं, लेकिन मुझे सनातन धर्म की महत्ता का अंदाजा था और मैंने अपने साथ हुए हर दुर्व्यवहार को नज़रअंदाज़ किया और अपने मिशन में लगी रही, आज मेरे कैंप में आपको जो ये विदेशी श्रद्धालु भजन कीर्तन करते दिख रहे हैं वो मेरे प्रयास की बानगी भर हैं.'

'कुछ वर्ष पहले ऐसे ही एक आयोजन में मेरे गुरु महाराज जी ने मुझे इस उपाधि से विभूषित किया था, आज मेरे प्रयास से इस बार अर्धकुंभ में एक नया अध्याय लिखा गया है और निर्मोही अखाड़े ने मेरी शिष्य परंपरा के 9 विदेशी संतों का पट्टाभिषेक कर उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी से नवाजा है. निर्मोही अखाड़ा इन विदेशी संतों के माध्यम से पूरी दुनिया में हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार करेगा, मेरे लिये यह एक सुखद अनुभूति है.'

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गौरतलब है कि अर्धकुंभ या महाकुंभ मेले में विदेशी साधु संन्यासियों का आना कोई नई परंपरा नहीं है, पिछले दो दशकों से यूरोप और अमेरिकी महाद्वीप समेत अन्य कई पश्चिमी देशों के निवासी किसी न किसी आश्रम या मठ से जुड़कर हिंदुत्व के प्रति अपनी आस्था प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं और विदेशी मूल के हिंदू धर्मावलम्बियों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है.

एक तरफ जब देश की राजनीति कट्टर हिंदुत्व और लचीले हिंदुत्व के बीच राम मंदिर पर बहस में व्यस्त है और सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे धार्मिक चकाचौंध ने जहां भारतीय युवाओं को हिंदू धर्म के किसी अबूझ और अजीब स्वररूप से परिचित करवाने का कार्य करते हुए दिग्भ्रमित करने का काम किया है. तो दूसरी तरफ अर्धकुंभ में कल्पवास करके सनातन धर्म के कठोर नियमों का अनुपालन करने वाले ये विदेशी संन्यासी एक उम्मीद जगाने का काम कर रहे हैं. ऐसे में इनका हिंदू धर्म के प्रति अनुराग और गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति इनकी जागृत आस्था को देखकर हर देखने वाले के मुंह से सिर्फ प्रशंसा के शब्द ही निकल रहे हैं. देखना होगा कि भारतीय युवाओं के हाथ से निकलकर विदेशी युवाओं के हाथ में जाते हिंदुत्व का भविष्य कैसा होने वाला है.

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