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चुनावी साल में शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा कुंभ मेले पर योगी सरकार का ध्यान

कुंभ की प्रकृति जितनी धार्मिक है, इसके आयोजन से जुड़ा पूरा मामला कहीं न कहीं उसी अंदाज में राजनीतिक भी है. दरअसल, बीजेपी का हिंदुत्व एजेंडा हमेशा सतह के करीब रहने के कारण साफ तौर पर यह बात कही जा सकती है.

Updated On: Jan 17, 2019 09:12 AM IST

Saurabh Sharma

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चुनावी साल में शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा कुंभ मेले पर योगी सरकार का ध्यान

रोमन कवि जुवेनल ने पहली शताब्दी के दौर में लिखा था, 'आप उन्हें रोटी और सर्कस दीजिए और वे कभी भी बगावत नहीं करेंगे'. उन्होंने ऐसे वक्त में यह कहा था, जब रोम में सर्कस और मैक्सिमस, रथों की रेस और ग्लैडिएटर संबंधी लड़ाइयों की गूंज सुना रहे थे. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जाहिर तौर पर इसी मॉडल में विश्वास करते हैं. ऐसा लगता है कि वह लोगों को सिर्फ भव्य मेला- अर्द्ध कुंभ की सौगात देने में सक्रियता से जुटे हैं, जिसकी शुरुआत प्रयागराज (वैसे लोगों के लिए इलाहाबाद जो अब तक इस शहर के नए नाम के आदी नहीं हुए हैं) में हो गई है. जनवरी में शुरू यह मेला 4 मार्च तक चलेगा.

धर्म के साथ-साथ राजनीति का भी मामला

देश में जल्द ही लोकसभा चुनाव होने हैं और इस तरह से यह चुनावी साल है. हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और नरेंद्र मोदी का राजनीतिक परिदृश्य में अब उस किस्म का दबदबा और प्रभाव नहीं नजर आ रहा है, जैसा कि 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान देखने को मिला था. कुंभ की प्रकृति जितनी धार्मिक है, इसके आयोजन से जुड़ा पूरा मामला कहीं न कहीं उसी अंदाज में राजनीतिक भी है. दरअसल, बीजेपी का हिंदुत्व एजेंडा हमेशा सतह के करीब रहने के कारण साफ तौर पर यह बात कही जा सकती है.

उत्तर प्रदेश बीजेपी के नेता और पार्टी की प्रदेश इकाई के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं, 'कुंभ किसी भी धार्मिक कार्यक्रम के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा संगठित जमावड़ा है और यहां तक कि यूनेस्को भी इस बात को स्वीकार करता है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग कुंभ मेले में शामिल होने के लिए आते हैं और यही वजह है कि राज्य सरकार इससे संबंधित तैयारियों में किसी तरह का कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती है.' उनके मुताबिक, इसी वजह से सरकार कुंभ जैसे आयोजन के लिए इस स्तर पर जाकर खर्च कर रही है.

दरअसल, त्रिपाठी कुंभ मेले के आयोजन के लिए विशाल रकम यानी 4,236 करोड़ रुपए के बजट आवंटन के पक्ष में इस तरह की दलील पेश कर रहे थे. उनका कहना था, 'अगर आप इस बजट की फीफा और दुनियाभर के अन्य वैश्विक आयोजनों के मुकाबले तुलना करेंगे तो आप पाएंगे कि यह (कुंभ मेले के लिए आवंटित) रकम काफी छोटी है.'

(पीटीआई फोटो)

(पीटीआई फोटो)

कुंभ के लिए इस बार जितनी रकम सरकार की तरफ से आवंटित की गई है, फीफा जैसे आयोजनों पर इसके मुकाबले काफी बड़ी रकम खर्च की जाती है. अर्द्ध कुंभ मेले के बजट के लिए आवंटित कुल 4,236 करोड़ रुपए में राज्य सरकार 2,000 करोड़ रुपए खर्च कर रही है, जबकि 2,200 करोड़ रुपए केंद्र सरकार की तरफ से मुहैया कराए जा रहे हैं. इसमें से सरकार की तरफ से 1,200 करोड़ रुपए पहले ही जारी किए जा चुके हैं. राज्य सचिवालय के उच्चस्तरीय सूत्रों के मुताबिक, मेले के आयोजन के लिए आवंटित बाकी रकम भी सरकार की तरफ से जल्द ही जारी कर दिए जाने की संभावना है.

अब तक का सबसे महंगा कुंभ मेला 

साल 2019 का कुंभ मेला अब तक का इस तरह का सबसे महंगा मेला भी होगा. साल 2013 में महाकुंभ का आयोजन अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी के शासनकाल में हुआ था और इस मेले के आयोजन में समाजवादी पार्टी की अगुवाई वाली तत्कालीन राज्य सरकार ने 1,300 करोड़ रुपए खर्च किए थे. दिलचस्प बात यह है कि साल 2001 में आयोजित पूर्ण कुंभ मेले में उस वक्त की मौजूदा सरकार की तरफ से महज 165 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे.

बहरहाल, इस बार गंगा के तट पर आयोजित इस कुंभ मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए हेलिपैड समेत अस्थायी शहर बसाया गया है. त्रिपाठी ने बताया, 'सरकार इस महा-उत्सव में भाग लेने की खातिर लोगों को आमंत्रण भेजने के लिए अपने कैबिनेट मंत्रियों को अन्य राज्यों में भेज रही है.'

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उन्होंने कहा, 'यह दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा आयोजन है और हमारे मुख्यमंत्री ने इस सिलसिले में निजी रूप से 192 से भी ज्यादा देशों को निमंत्रण भेजा है. अगर आप इसके बजट को देख रहे हैं तो जाहिर तौर पर आपको इस आयोजन की अहमियत और इसकी व्यापकता पर भी गौर करना चाहिए.'

मेला पर खर्च के मामले में सरकार की प्राथमिकता पर उठ रहे सवाल कुंभ के लिए सरकार की तरफ से आवंटित बड़ी रकम को लेकर सरकार और सत्ताधारी पार्टी के प्रतिनिधि जो भी दलील पेश करें, लेकिन सरकार के बजट, खर्च और आवंटन को लेकर विपक्षी पार्टियों समेत कई हलकों की तरफ से सवाल उठाए जा रहे हैं.

समीना बानो जैसी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता मौजूदा कुंभ मेले के बजट को लेकर सवाल उठा रही हैं. समीना बानो का कहना था, 'कुंभ मेले के लिए बजट का यह आंकड़ा स्वास्थ्य क्षेत्र के मद में उत्तर प्रदेश के कुल बजट का करीब 80 फीसदी है. इसके अलावा, यह प्राथमिक शिक्षा के कुल बजट का तकरीबन 25 फीसदी है.'

Naga Sadhus, or Hindu holy men take a dip in a holy pond during the second "Shahi Snan" (grand bath) at "Kumbh Mela", or Pitcher Festival, in Trimbakeshwar

उन्होंने यह भी बताया कि भारत जहां हालिया आंकड़ों के मुताबिक मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के 189 देशों की सूची में एक पायदान ऊपर चढ़ते हुए 130वें स्थान पर पहुंच गया है, वहीं उत्तर प्रदेश मानव विकास सूचकांक से संबंधित इसी रैंकिंग में नीचे खिसकते हुए देश के भीतर नीचे से दूसरी पायदान पर पहुंच गया है. गौरतलब है कि ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के तहत जारी किए गए हैं.

उन्होंने कहा, 'कुंभ मेले के पीछे मकसद और धार्मिक भावनाओं का बाकायदा सम्मान करते हुए मैं यह भी सोचती हूं कि राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बदतर स्थिति को सुधारने के लिए खर्च को सरकार की प्राथमिकता की सूची कैसे लाया जाएगा, जिन पर तत्काल ध्यान देने और हस्तक्षेप करने की जरूरत है.'

हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी इस तर्क के जवाब में अपनी बात रखने से नहीं चूके. त्रिपाठी ने सरकार के इस फैसले के समर्थन में कई तरह की बातें कहीं. उन्होंने कहा, 'कुंभ एक सालाना कार्यक्रम नहीं है. यह छह साल में एक बार आता है और किसी भी सेक्टर के लिए बजट सालाना आधार पर जारी किया जाता है. मैं अच्छी तरह से इस बात को समझता हूं कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार की सख्त जरूरत है. हालांकि, हम किस तरह से इसकी तुलना वैसे किसी धार्मिक उत्सव के साथ कर सकते हैं, जो भारत और विदेश के अरबों लोगों के लिए आस्था का विषय है. बाकी क्षेत्रों में सुधार धीरे-धीरे होगा. भारतीय जनता पार्टी ने अभी राज्य में सरकार का अपना दो साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं किया हैं.'

मेला की तैयारियों से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि कुंभ के लिए आवंटित बजट का बड़ा हिस्सा नदी के अगले हिस्से और शहर के विभिन्न हिस्सों के सौदर्यीकरण और स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर के मद में खर्च किया जाएगा. इसके अलावा, मेले के आयोजन के दौरान सुरक्षा आदि इंतजामों पर भी बड़ी रकम खर्च करने की बात है.

55 दिनों की लंबी अवधि वाले इस मेले के दौरान मेला प्रशासन इस अस्थायी जिले के प्रशासन और अन्य चीजों का प्रबंधन करता है. इसमें संबंधित जगह पर हजारों टेंट और अन्य ढांचा तैयार करने के लिए प्लाईवुड, बांस और तिरपाल जैसी ज्वलनशील सामग्री का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल भी शामिल है. इस बार मेले में प्रशासन के पास 55 मोटरसाइकिलों का विशेष तरह का बेड़ा भी मौजूद है, जो अग्निशामक उपकरण (एमबीएफएफएस) से लैस है और इस तरह से ये मोटरसाइकिल अग्निशामक की भूमिका में होंगे. मेला प्रशासन में चीफ फायर ऑफिसर (सीएफओ) प्रमोद कुमार शर्मा ने बताया कि ये मोटरसाइकिल फायर टेंडिंग गाड़ियों के मुकाबले ज्यादा तेजी से टेंट शहर में पहुंच सकते हैं.

मेले के पहले दिन सोमवार को अज्ञात कारणों से मेला परिसर में आग लग गई. हालांकि, मेला प्रशासन की संबंधित इकाइयों और कर्मियों द्वारा तुरंत इस आग पर काबू पा लिया गया. शर्मा ने यह भी बताया कि टेंट सिटी को 9 जोन और 20 सेक्टर (क्षेत्रों ) में बांटा गया है और ऐसे हर सेक्टर में फायर अधिकारी की तैनाती की गई है.

मेला परिसर में आईसीयू के साथ उच्च तकनीक वाला एक अस्थायी अस्पताल भी स्थापित किया गया है, जिसकी क्षमता 100 बेड की है. ओपीडी की क्षमता रोजाना 10,000 मरीजों की होगी और श्रद्धालुओं की आपातकालीन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए मेले में लाइफ सपोर्ट सिस्टम के साथ एंबुलेंस भी तैनात किए गए हैं.

स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए कहां है फंड?

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हाफिज गांधी ने भी मेला और सामाजिक विकास से संबंधित बजट आवंटन में संतुलन की जरूरत पर जोर दिया. जाहिर तौर पर उनका इशारा कुंभ मेले के लिए आवंटित भारी-भरकम बजट की तरफ था और उन्होंने इस बारे में अपनी राय रखी. उन्होंने कहा, 'कुंभ की जड़ें भारत की संस्कृति और सभ्यता में समाई हुई हैं. यह विशेष मौका है, जहां करोड़ों लोग धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन के लिए इकट्ठा होते हैं.' उनका कहना था कि जाहिर तौर पर ऐसे में बजट के आवंटन और खर्च को लेकर थोड़ा सा संतुलन साधने की जरूरत है। उन्होंने आगे कहा, 'संसाधनों के खर्च में बारीकी से संतुलन स्थापित करना होगा. जब इस दिशा में सरकार की तरफ से इतना सारा खर्च किया जा रहा है तो प्रयागराज में इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित कुछ ठोस विकास की शक्ल में इसके नतीजे नजर आने चाहिए.'

दरअसल रेलवे का मकसद कुंभ के दौरान होने वाली भीड़ को कम करना है. यह सुविधा अलाहाबाद के 12 स्टेशनों पर यात्रा करने के लिए उपलब्ध है

बहरहाल, लखनऊ यूनिवर्सिटी में अप्लायड इकनॉमिक्स विभाग के प्रमुख राजीव कुमार माहेश्वरी बड़े पैमाने पर होने वाले इस खर्च के बारे में एक और दिलचस्प पहलू पेश करते हैं. उन्होंने कहा, 'हालांकि, कुंभ मेले में होने वाले इस विशाल खर्च से राजस्व और रोजगार सृजन के रूप में कुछ फायदे भी देखने को मिल सकते हैं.' राजीव कुमार ने इस मेले के पर्यटन संबंधी पहलू पर भी प्रकाश डाला. उनका कहना था, 'पर्यटन बड़ा उद्योग है और यह राज्य को बड़े पैमाने पर आमदनी मुहैया कराता है. सरकार पर्यटन के ठिकाने के तौर पर इस धार्मिक आयोजन को बढ़ावा दे रही है और यहां बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की उम्मीद है. इस बात में कोई शक नहीं है कि कुंभ मेले का बजट काफी बड़ा है, लेकिन अगर इससे आमदनी और रोजगार को बढ़ावा मिलता है तो जाहिर तौर पर यह खर्च बेकार नहीं जाएगा. भारत में काफी पुराने समय से कुंभ मनाने की परंपरा का पालन किया जा रहा है और इन परंपराओं को तोड़ना बिल्कुल भी संभव नहीं है.'

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कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई से जुड़े नेता और राज्य मीडिया सेल के प्रभारी वीरेंद्र मदान का कहना है कि धार्मिक आयोजन पर पैसे खर्च करना अच्छी बात है, लेकिन उनकी आपत्ति कुछ और बातों को लेकर है. उनके मुताबिक, दरअसल उत्तर प्रदेश की मौजूदा राज्य सरकार कहीं न कहीं इस तरह की गतिविधियों के जरिये अपना हिंदुत्व का एजेंडा भी आगे बढ़ा रही है. मदान की राय में धार्मिक आयोजनों को राजनीति की परिधि से बाहर रखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, 'धार्मिक कार्यक्रमों को राजनीतिक कार्यक्रम से बाहर रखा जाना चाहिए और राजनीतिक पार्टियों को भी ऐसा करने से परहेज करना चाहिए.' कांग्रेस नेता मदान का यह भी कहना था कि दरअसल इस आयोजन की सफलता के आधार पर उत्तर प्रदेश की सरकार आगामी चुनावों में भी बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश करेगी.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के इस नेता ने इस पूरे वाकये पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा, 'इस भारी भरकम बजट के बारे में फैसला करने से पहले सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए कि किस तरह से ऑक्सीजन की कमी के कारण बच्चों की मौत हो गई और किस तरह से पिछले कुछ साल में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बेहद अहम क्षेत्र बुरी तरह से गिरावट का शिकार हुए हैं. हम और हमारी पार्टी कुंभ मेले के आयोजन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसके साथ-साथ सरकार को बाकी चीजों पर भी प्राथमिकता के हिसाब से खर्च करना चाहिए.'इस कांग्रेस नेता का यह भी कहना था कि सरकार ने लोकतंत्र का पूरी तरह से मजाक बना दिया है.

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इस तरह का अनुमान लगाया जा रहा है कि यह अर्द्ध कुंभ मेला इस आयोजन के तहत नदी के तट पर इकट्ठा होने वाले लोगों की संख्या के लिहाज से किसी तरह का रिकॉर्ड बनाएगा. हालांकि, जहां तक इस अवसर पर यहां पहुंचने वाले लोगों की संख्या के बारे में अनुमान लगाने की बात है, तो यह पूरी तरह से एक मोटा-मोटा आकलन ही होता है और अंदाजा लगाकर इसे 20 लाख से लेकर इस संख्या के दोगुना-तीन गुना या कुछ अन्य संख्या तक बताया जा सकता है. साल 2013 में हुए महाकुंभ मेले में पहुंचने वाले कुल लोगों की संख्या 12 से 15 करोड़ के बीच बताई गई थी.

कुंभ मेले के मौजूदा स्वरूप का आयोजन हर 6 साल के बाद किया जाता है, जबकि पूर्ण कुंभ 12 साल में एक बार आयोजित किया जाता है. इसके अलावा, महाकुंभ मेले का आयोजन 144 साल में एक बार होता है. बहरहाल, कई लोगों को आपत्ति मेला पर टैक्सपेयर्स के पैसे खर्च करने को लेकर नहीं हैं. दरअसल, उनका यह कहना है कि क्या इस तरह के आयोजन के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च करना क्या वाकई में जरूरी था. गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शरद पटेल ने कहा, 'इस धार्मिक आयोजन पर खर्च की जाने वाली रकम काफी ज्यादा है. मुझे निजी तौर पर इस बात की जानकारी है कि उत्तर प्रदेश की 40 फीसदी से भी ज्यादा जनता को दो वक्त की रोटी, बेहतर स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सुविधाओं के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है.' सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की 32.8 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करती है.

(सौरभ शर्मा लखनऊ के स्वतंत्र पत्रकार और 101Reporters.com के सदस्य हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का देशव्यापी नेटर्वक है.)

कुंभ पर हमारी स्पेशल वीडियो सीरीज देखने के लिए यहां क्लिक करें. इस सीरीज के पहले पार्ट में जानें कि कैसे कुंभ के लिए प्रयागराज में एक पूरा शहर बसाया गया है और प्रशासन ने कैसी हाईटेक व्यवस्था की है, देखिए- KUMBH 2019: It's More Than a Mela

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