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कुमार विश्वास पार्टी नहीं अपना अस्तित्व बचाने की जंग लड़ रहे हैं

एक तरफ जहां कुमार विश्वास पार्टी के मूल सिद्धांत को लेकर आवाज उठाने की बात कर रहे हैं, तो वहीं पार्टी से बाहर हुए नेताओं का कहना है कि कुमार विश्वास इसके जरिए सिर्फ अपनी राजनीति रोटियां सेंकने में लगे हैं

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Dec 04, 2017 04:58 PM IST

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कुमार विश्वास पार्टी नहीं अपना अस्तित्व बचाने की जंग लड़ रहे हैं

आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने एक बार फिर से पार्टी लाइन से हटकर एक नया शिगूफा छोड़ दिया है. रविवार को पार्टी ऑफिस में कार्यकर्ताओं से सीधे मुखातिब होते हुए कुमार विश्वास ने कहा है कि पार्टी में ऐसे सभी लोगों को वापस लाने की जरूरत है, जो किन्हीं कारणों से पार्टी से अलग हो गए हैं.

कुमार विश्वास ने पार्टी कार्यालय राउस एवेन्यू में कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा करते हुए कहा, ‘यदि कोई नेता किसी राजनीतिक पार्टी में अभी तक शामिल नहीं हुआ है या फिर किसी ने अपनी पार्टी बना ली है और उसका विलय हमारी पार्टी में करना चाहता है, तो हम वैसे विचारधारा वाले लोगों को फिर से पार्टी में लाने का विचार कर सकते हैं.’

कुमार विश्वास ने इशारों-इशारों में आम आदमी पार्टी वर्जन-2 बनाने की भी बात कह दी. कुमार विश्वास ने कहा सबसे पहले पार्टी में उन सभी को वापस लाना चाहिए जो पार्टी छोड़ कर चले गए हैं. उसके बाद पार्टी को मूल सिद्धांतों पर काम करना चाहिए.

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गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के अंदर समय-समय पर योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को वापस लाने की मांग होती रही हैं. ऐसी भी खबर समय-समय पर आती रहती है कि अरविंद केजरीवाल प्रशांत भूषण को राज्यसभा में भेजना चाह रहे हैं. लेकिन, पार्टी के अंदर ही कुछ नेताओं का खेमा इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखता है.

पार्टी के राजस्थान प्रभारी कुमार विश्वास भी इस वक्त हाशिए पर हैं और अपनी छटपटाहट को सार्वजनिक मंचों के जरिए जता भी चुके हैं. कुमार विश्वास को इस बात का भी डर है कि पार्टी का एक खेमा 26 नवंबर को रामलीला मैदान में उनके भाषण के बाद फिर से उनके खिलाफ सक्रिय हो गया है.

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कुल मिलाकर पिछले कुछ महीनों से कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के बीच शीतयुद्ध जैसे हालात बने हुए हैं. पिछले दिनों जब यह खबर आई थी कि अरविंद केजरीवाल की लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव से मुलाकात हुई है तो कुमार विश्वास ने आरजेडी के साथ किसी भी गठबंधन का विरोध किया था.

कुमार विश्वास ने तब हमारे सहयोगी चैनल न्यूज-18 के साथ बातचीत में कहा था, ‘जब तक हमारे जैसा एक भी कार्यकर्ता आम आदमी पार्टी में मौजूद रहेगा लालू प्रसाद यादव के साथ किसी भी तरह की राजनीतिक साझीदारी की इजाजत नहीं दी जाएगी.’

वहीं स्वराज इंडिया के मुख्य प्रवक्ता अनुपम फर्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए पहली बात यह है कि इस तरह की कोई बातचीत नहीं चल रही है. हमलोग उन लोगों में नहीं हैं कि जो कैमरे के पीछे कुछ कहते हैं और कैमरे के आगे कुछ और कहते हैं. कहने वाले लोग अब सिर्फ एक जगह बचे हुए हैं. दूसरी बात यह है कि वापसी की बात का अब कोई मतलब नहीं रहा. आम आदमी पार्टी के नाम से जो एक आधिकारिक पार्टी है उसका आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है. जिस आंदोलन से उसका जन्म हुआ था. उसके सारे विचार को पूरी तरह से त्याग दिया गया है.’

अनुपम आगे कहते हैं, ‘स्वराज इंडिया अभी भी उस आंदोलन और विचार को लेकर आगे बढ़ रही है. आप देख रहे हैं कि देश के कितने सीरियस मुद्दों जैसे किसानों को लेकर हो या फिर शिक्षा-बेरोजगारी को लेकर हो या फिर दिल्ली के मुद्दों को लेकर हो हम लोग इसको लगातार उठा रहे हैं. इस तरह के शिगूफे पिछले ढाई साल में कई बार छोड़े गए हैं. असल में वे लोग मैसेजिंग अपने कैडर को करते हैं. जब-जब पार्टी के अंदर क्रेडिबिलिटी लॉस होता है तब-तब उन लोगों को योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण याद आते हैं.

जब-जब आम आदमी पार्टी में नैतिक संकट होता है तब उनको हमलोग याद आते हैं. दरअसल इस तरह की बातों का कोई आधार नहीं हैं. हर मौके पर जैसे कपिल मिश्रा जब अलग होते हैं तो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण से माफी मांगते हैं. जब कुमार विश्वास की नैया डूबने लगती है तो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण से माफी मांगते हैं. देखिए साफ शब्दों में कहें तो जो भटके हुए लोग हैं उनको वापस आना होता है न कि हमारे जैसे लोगों को? हमलोग उस आंदोलन को ही आगे बढ़ा रहे हैं जिसको इन लोगों ने खत्म कर दिया था.’

गौरतलब है कि साल 2015 में आम आदमी पार्टी से निकाले जाने के बाद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने मिलकर स्वराज अभियान की शुरुआत की थी. साल 2016 में स्वराज इंडिया नाम की पार्टी बनाई. योगेंद्र यादव पार्टी के अध्यक्ष हैं तो प्रशांत भूषण संगठन के अध्यक्ष हैं.

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फर्स्टपोस्ट हिंदी ने इन सभी मुद्दों पर अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक प्रोफेसर आनंद कुमार से बात की तो उनका कहना था, ‘ देखिए आप इसको कई घटनाओं से जोड़ कर देख सकते हैं, पहली, आम आदमी पार्टी के धीरे-धीरे व्यक्तिवादी संगठन बनने में कुमार विश्वास का अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया से कम हाथ नहीं है? कुमार विश्वास की अध्यक्षता में ही पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकरिणी की बैठक में अनुचित तरीके से प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को निकाला गया था. इनकी मौजूदगी में ही राष्ट्रीय परिषद की बैठक में श्री शांति भूषण जी से लेकर चौधरी रमजान तक का अपमान हुआ था. हम सब को निकलाने का फरमान उन्होंने ही सुनाया.’

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अन्ना आंदोलन के समय की तस्वीर

प्रो. आनंद कुमार आगे कहते हैं, ‘कुमार विश्वास भी उस षड्यंत्र में शामिल थे. मुठ्ठीभर लोगों ने दिल्ली की एतिहासिक जीत को एक छोटे से गिरोह की पूंजी बना लिया. अब कुमार विश्वास सत्ता की हिस्सेदारी मांग रहे हैं. राज्यसभा की सीट जरूर एक तात्कालिक कारण है. जहां तक अन्ना हजारे और कुमार विश्वास के द्वारा भ्रष्टाचार को लेकर नए जन आंदोलन की संभावना है तो देश की राजनीतिक सुधार की जरूरत है.’

कुल मिलाकर एक तरफ जहां कुमार विश्वास पार्टी के मूल सिद्धांत को लेकर आवाज उठाने की बात कर रहे हैं, तो वहीं पार्टी से बाहर हुए नेताओं का कहना है कि कुमार विश्वास इसके जरिए सिर्फ अपनी राजनीति रोटियां सेंकने में लगे हैं.

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