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कुलभूषण जाधव पाकिस्तान में भारतीय 'जासूस' नहीं हो सकता

कुलभूषण के पास भारतीय पासपोर्ट था, आम तौर पर जासूसी करने वाले फर्जी पासपोर्ट रखते हैं.

Aakar Patel Updated On: Apr 11, 2017 10:27 AM IST

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कुलभूषण जाधव पाकिस्तान में भारतीय 'जासूस' नहीं हो सकता

एडिटर्स नोट:आकार पटेल भारत में एमनेस्टी इंटरनेशनल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं, उन्होंने फर्स्टपोस्ट पर अपने लेख में कहा था कि पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में बंद कुलभूषण जाधव रॉ के जासूस नहीं हो सकते. सोमवार को ही पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट ने जाधव को मौत की सजा सुनाई है. यहां हम उनका वो लेख फिर से पेश कर रहे हैं.

पाकिस्तान में बंद एक भारतीय कुलभूषण जाधव पर भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी RAW के लिए जासूसी का आरोप लगा है.

पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि कुलभूषण जाधव को उस वक्त पकड़ा गया, जब वो अपने परिवार से मराठी में बात कर रहे थे. पाकिस्तान से भारत की जाने वाली फोन कॉल्स की निगरानी होती है. इसमें कोई नई बात नहीं. इसी वजह से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां कुलभूषण जाधव तक पहुंच सकीं.

कुलभूषण के पास भारतीय पासपोर्ट था. ये फिल्मों के जासूसों से अलग किस्म का ही मामला था. आम तौर पर जासूसी करने वाले फर्जी पासपोर्ट रखते हैं. मगर यहां तो मामला ही अलग था.

मुझे बहुत हैरानी होगी अगर कुलभूषण जाधव रॉ का एजेंट निकले. ऐसा इसलिए क्योंकि सीआईए और आईएसआई के एजेंटों की तरह रॉ के एजेंट भी राजनयिक पासपोर्ट के साथ भेजे जाते हैं. वो आम तौर पर दूतावासों में नियुक्त किए जाते हैं.

मैंने कहीं पढ़ा था कि मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल भी एक बार ऐसी ही पोस्टिंग पर पाकिस्तान भेजे गए थे. लेकिन जहां तक मुझे मालूम है, डोवल खुफिया ब्यूरो में थे, न कि रॉ में.

खुफिया ब्यूरो या इंटेलिजेंस ब्यूरो या आईबी, घरेलू खुफिया एजेंसी है. जो भारतीय नागरिकों की जासूसी करती है. अब अगर अजीत डोवाल आईबी में थे, तो वो पाकिस्तान में क्या कर रहे थे? मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. क्योंकि आईबी और रॉ के बारे में जानकारियां अक्सर अफवाहों से मिलती हैं. इनमें कितना सच और कितना झूठ होता है कहा नहीं जा सकता.

कई बार तो रॉ के प्रमुख भी नहीं जानते कि उनकी एजेंसी के भीतर क्या चल रहा है. दस साल पहले 'आउटलुक' पत्रिका ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि रॉ में मुसलमानों की भर्ती नहीं होती. रॉ के लिए काम करने वाले 15 हजार लोगों में से एक भी मुसलमान नहीं था. ये खबर समाचार एजेंसी रायटर्स के हवाले से आई थी. तब रायटर्स ने रॉ के पूर्व प्रमुख ए एस दुलात से बात की थी.

दुलात ने कहा था कि, 'मुझे नहीं याद पड़ता कि मैं रॉ में किसी मुस्लिम से मिला या जानता हूं. अब अगर हमारी एजेंसी में मुसलमान नहीं तो जाहिर है कि हमें कई बार इससे दिक्कत हुई. किसी मुसलमान का एजेंसी में न होना जाहिर करता है कि उन्हें भर्ती नहीं किया जाता. उस स्तर पर उतने मुसलमानों की तलाश भी मुश्किल होती है'.

रॉ के एक और पूर्व प्रमुख गिरीश चंद्र सक्सेना ने कहा था कि, 'रॉ को मुस्लिम अफसरों की सख्त जरूरत है. बहुत कम ऐसे लोग हैं जिन्हें उर्दू या अरबी भाषा की जानकारी है. इस मसले का हल निकाला जाना चाहिए'.

अब जरूरत इतनी सख्त है. इससे मुश्किल होती है तो पता नहीं क्यों रॉ में मुसलमानों की भर्ती नहीं होती.

ट्रैक-2 डिप्लोमेसी के अभियानों के तहत मैंने कई पूर्व आईएसआई प्रमुखों से मुलाकात की है. इनमें से एक असद दुर्रानी को तो मैं कई बरसों से जानता हूं. हम दोनों एक ही अखबार के लिए लिखा करते थे.

आईएसआई के बारे में मेरा एक हालिया तजुर्बा रहा है. मैं लाहौर के पास सिंधु घाटी सभ्यता के केंद्र हड़प्पा गया था. वहां पर सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों को बहुत सहेजकर रखा गया है.

मैं कई बरस पहले वहां पहली बार गया था. मेरे टिकट खिड़की पर पहुंचने से पहले ही क्लर्क ने विदेशियों के लिए टिकट जारी कर दिए थे. जब मैंने उससे पूछा कि तुम्हें कैसे पता कि मैं विदेशी हूं, तो उसने कहा था कि, 'यहां कोई पाकिस्तानी नहीं आते'.

जब मैं इस बार हड़प्पा गया, तो मुझे स्थानीय लोगों वाला टिकट दिया गया. मैंने भी नहीं बताया कि मैं पाकिस्तानी हूं. वहां शलवार-कमीज पहने एक शख्स ने हमसे पूछा कि आप कहां से आए हैं? मैंने उसे बताया कि लाहौर से. वो चला गया. हमारे गाइड ने बताया कि आईएसआई यहां आने वाले हर विदेशी पर निगाह रखती है. वापसी के वक्त वही शख्स फिर आया और हमसे पाकिस्तान का पहचान पत्र दिखाने को कहा. हम पकड़े गए थे. वो हमें आईएसआई के स्थानीय दफ्तर ले गया. वहां हमारे पासपोर्ट नंबर दर्ज किए. तब हमें चेतावनी देकर जाने दिया गया. उसने कहा कि आपको नहीं मालूम कि विदेशियों के लिए यहां कितना खतरा है.

रॉ के बारे में मेरा तजुर्बा अफगानिस्तान का है. अक्टूबर 2001 में मैं अफगानिस्तान में युद्ध की रिपोर्टिंग के लिए गया था. अफगानिस्तान जाने के लिए हमें उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान से होकर जाना पड़ा था. दुशाम्बे पहुंचकर हमें अगले काफिले का इंतजार करना होता था. होटल में मैं अधेड़ उम्र के दो भारतीयों से मिला. जो हमेशा सूट और टाई पहने रहते थे. वो सुबह नाश्ते के वक्त मिलते थे और शाम के वक्त बार में मिलते थे. बाकी सब लोग दुनिया भर से आए पत्रकार थे. मगर ये दोनों लोग एकदम अलग थे.

जब हमारा काफिला ताजिकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा पर पहुंचा तो रूसी सैनिकों ने हमारे पासपोर्ट चेक किए. रूसी सैनिकों ने सभी पत्रकारों को तो जाने दिया. मगर इन दोनों भारतीयों को दुशाम्बे वापस भेज दिया.

मैं दो हफ्ते बात होटल वापस आया. मैं घुड़सवारी करते हुए नदी में गिर गया था. मेरे पासपोर्ट पर लगी मुहरें मिट सी गई थीं. मुझे इस बात से बड़ी फिक्र हुई. होटल में जो टैक्सी हमें उज्बेकिस्तान ले जाने वाली थी, वो खराब हो गई थी. मैं रास्ते में हैरान-परेशान खड़ा था. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. तभी उन दो भारतीयों में से एक ने मुझसे पूछा कि मैं कहां जा रहा हूं. उसने मुझे लिफ्ट भी ऑफर की. उन दोनों के पास एक मर्सिडीज थी. सीमा पर मैंने मुहर लगवाने के लिए अपना पासपोर्ट निकाला. जबकि वो दोनों आदमी गाड़ी में ही बैठे रहे. मैं पासपोर्ट अधिकारी को अपने साथ हुए हादसे के बारे में बताने लगा. लेकिन उसने गाड़ी में बैठे उन दोनों आदमियों की तरफ देखा और मुझे जाने दिया. तब मुझे अंदाजा हुआ कि वो दोनों कौन थे.

मुझे अंदाजा नहीं था. मगर रूसी सैनिकों और उज्बेक अफसरों ने ताड़ लिया था कि वो दोनों रॉ एजेंट थे.

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