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कोसी में एड्स के चपेट में आ रही हैं नई नस्लें...अब तो जागो सरकार!

अशिक्षा की वजह से इस बीमारी को लेकर लोगों में जागरूकता की भारी कमी है

Nishant Nandan Updated On: Jun 06, 2017 01:43 PM IST

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कोसी में एड्स के चपेट में आ रही हैं नई नस्लें...अब तो जागो सरकार!

बिहार के कोसी इलाके में 200 से ज्यादा बच्चों का एड्स से पीड़ित हो जाना अपने आप में किसी त्रासदी से कम नहीं है. कोसी के छह जिलों में इस वक्त एड्स नौनिहालों को लील रहा है, लेकिन सरकार की कुंभकर्णी नींद कब टूटेगी यह कोई नहीं जानता?

इससे पहले कि हम इन जिलों में एड्स फैलने की वजह और लचर सरकारी व्यवस्था की चर्चा करें, उससे पहले आप जरा इन जिलों में HIV पीड़ित बच्चों की कुल संख्या पर नजर डालिए.

जिला बालक बालिका
कटिहार 78 45
अररिया 26 18
किशनगंज 07 06
पूर्णिया 35 34
मधेपुरा 01 01
सहरसा 00 01
 

यह आंकड़े कटिहार के एंटी वायरल थेरेपी सेंटर (ART) के हैं. इस केंद्र पर एंटी एचाईवी वायरस डोज गर्भवती माताओं को दिए जाते हैं. अभी के आंकड़े बताते हैं कि कटिहार और अररिया जिले इस मामले में सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं.

जाहिर है यह आंकड़ें आपको हैरान-परेशान करने के लिए काफी हैं और आप बखूबी समझ भी गए होंगे कि ये जिले मासूमों के लिए अभिशप्त बन गए हैं.

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जागरूकता और शिक्षा में व्यपाक कमी

अब अहम सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों इन जिलों में एड्स का कहर हमारे भविष्य को बीमार कर रहा है? दरअसल अशिक्षा इन जिलों की सबसे बड़ी समस्या है. अशिक्षा की वजह से इस बीमारी को लेकर लोगों में जागरूकता की भारी कमी है.

एचआईवी के खतरों से अंजान गर्भवती मांएं प्रसव कराने के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं आती, वो घर पर ही दाई या फिर दूसरे जगहों पर जाकर प्रसव कराती हैं. झोलाछाप डॉक्टर इस दिशा में तमाम सरकारी प्रयासों पर भारी पड़ते हैं.

कई माता-पिता डर या फिर शर्म की वजह से भी सरकारी केंद्रों पर आने से कतराते हैं. कटिहार जिले के एड्स बचाव एवं नियंत्रण इकाई के कार्यक्रम पदाधिकारी (डीपीएम, डेप्को) शौनिक प्रकाश का कहना है कि सरकार की तरफ से इन जिलों में एड्स के रोकथाम के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं. लेकिन इन प्रयासों का असर फिलहाल दिख नहीं रहा.

सच यह है कि सरकारी प्रयासों से अलग अभी भी बड़े पैमाने पर यहां लोग एचआईवी के खतरों से अंजान हैं. सरकार की तरफ से जागरूकता के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं. इन जिलों के सुदूर गांवों में ना तो सरकार का कोई नुमाइंदा पहुंच पाता है और ना ही सरकार के जागरूकता कार्यक्रम का यह लोग हिस्सा बन पाते हैं.

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समय पर मरीजों की पहचान नहीं हो पाना

सरकार की एक बड़ी मुश्किल यह भी है कि इन इलाकों में एचआइवी पीड़ितों की पहचान करना बेहद मुश्किल है. ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोग गरीबी की वजह से पैसे कमाने के लिए ज्यादातर समय परिवार से दूर या राज्य से बाहर ही गुजारते हैं. कई पुरुष राज्य के बाहर से HIV पीड़ित होकर आते हैं और यह संक्रमण माताओं और बच्चों को तोहफे में दे जाते हैं. क्षेत्र से बाहर होने की वजह से इनका पूरा आंकड़ा भी सही-सही इकट्ठा करना टेढ़ी खीर है.

जाहिर है कोसी में एड्स फैलने की वजहें गंभीर हैं और इसके रोकथाम के लिए सरकारी प्रयास नाकाफी. लेकिन इससे भी हैरानी की बात यह है कि महामारी बन कर फैल रही एड्स की बीमारी पर विभाग का रवैया लापरवाही वाला ही है.

जब हमने इस बीमारी के रोकथाम के लिए इन जिलों में विभाग के कामकाज की तहें खंगालनी शुरू की तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आने लगीं. हमारे कई सारे अहम सवालों का जवाब तक विभाग नहीं दे सका.

मसलन, पिछले तीन या पांच सालों में कोसी के सभी जिलों में HIV पॉजिटिव माता-पिता की संख्या कितनी पहुंची है? हर साल बाहर से HIV पॉजिटिव होकर आ रहे पुरुष या महिलाओं की संख्या कितनी हैं? अभी ऐसे कितने माता या पिता होंगे जिनमें HIV पॉजिटिव की पहचान नहीं हो पाई है?

ART सेंटर तक नहीं आ पाने वाले पुरुष और महिलाओं की संख्या का कोई अनुमान? क्या इन जिलों में अविवाहितों के भी HIV पॉजिटिव होने का पता चला है यदि हां तो इनकी संख्या कितनी है? क्या सरकार की तरफ से इस बात की निगरानी की जा रही है कि हर साल कितने पुरुष या महिला बाहर जा रहे हैं?

मामले की गंभीरता को समझते हुए हमने कई बार ये सवाल महकमे से पूछी, ताकि जागरूकता और सरकारी प्रयासों को आमजन तक पहुंचाया जा सके. लेकिन अफसोस कि इन अहम सवालों पर सरकारी रवैया टाल-मटौल का ही रहा है.

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 सुरक्षित प्रसव और गर्भवती महिलाओं को सलाह

बहरहाल सरकारी अमले को यह समझना होगा कि दरअसल इन्हीं सवालों के जवाब में छिपा है एड्स के रोकथाम का एक बड़ा उपाय. यदि विभाग ऐसे जिलों में HIV पीड़ितों का पूरा ब्यौरा रखने लगे और उनके राज्य से बाहर आने-जाने की समय दर समय मॉनिटरिंग कर उनकी जांच कराने लगे तो कम-से-कम इस रोग को अभी से भी फैलने से तो कुछ हद तक जरूर रोका जा सकता है.

यकीनन सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था और गर्भवती माताओं को जरूरी सलाह और उपचार के जरिए नई नस्लों को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है.

कोसी में नौनिहालों में बढ़ता एड्स खतरे का अलार्म है. जरूरत इन इलाकों में लोगों को शिक्षित करने और जागरूकता फैलाने की है ताकि हम नई नस्लों को तोहफे में एड्स न दें.

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