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S N शुक्ला: वो शख्स जिसने यूपी के पूर्व मुख्यमंत्रियो के बंगले खाली करवाए

ये कोई पहला मौका नहीं था, जब एसएन शुक्ला या लोक प्रहरी एनजीओ ने अपनी याचिकाओं से बड़ा बदलाव किया हो. 2013 में लोक प्रहरी एनजीओ ने अदालत में दोषी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोला था

Updated On: Jun 05, 2018 12:51 PM IST

FP Staff

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S N शुक्ला: वो शख्स जिसने यूपी के पूर्व मुख्यमंत्रियो के बंगले खाली करवाए

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बड़ी मुश्किल और विवाद के बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मायावती ने अपने सरकारी बंगलों को खाली किया. सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला न सिर्फ जनहित में था बल्कि वीआईपी कल्चर के खिलाफ भी था.

जानिए उस शख्स के बारे में जिसने देश-प्रदेश की इन ताकतवर शख्सियतों को उनके बंगलों से बेदखल करवाया. वो इंसान जो रिटायरमेंट के 15 सालों बाद भी लोकतंत्र को मजबूत करने की लड़ाई लड़ रहा है.

शुक्ला जी की लड़ाई जारी

कहानी को आगे बढ़ाने से पहले हम एसएन शुक्ला के बारे में भी जान लेते हैं. वो समाजसेवी के अलावा वकील और पूर्व आईएएस अधिकारी रहे हैं. वैसे तो रिटायरमेंट हुए 15 साल बीत गए लेकिन उनकी जंग जारी है. 75 साल के शुक्ला जी की याचिका का नतीजा था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को अपने-अपने घर खोजने पड़े.

सरकारी बंगलों पर कब्जा कर बैठने वाले इन मुख्यमंत्रियों की सूची में अखिलेश यादव, मायावती, एनडी तिवारी, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह और मुलायम सिंह जैसे कद्दावर नाम शुमार थे. जो सालों से अपने सरकारी आवासों पर काबिज थे.

ये पहला मौका नहीं था, जब शुक्ला जी ने अपनी याचिकाओं के बूते ताकतवर सत्ता को हिलाया हो. इससे पहले भी उन्होंने कई बड़े फैसलों को पलटा था. अपने आईएएस करियर के दौरान उन्होंने कई बड़े पीडब्लूडी, एक्साइज, राजस्व, सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले.

इसके अलावा वीपी सिंह, श्रीपति मिश्रा, एनडी तिवारी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और मायावती के अधीनस्थ काम किया है. वहीं से उन्होंने कानून की ताकत समझी.

लोक प्रहरी एनजीओ ने बदली तस्वीर

2003 में हुए रिटायरमेंट के बाद से ही वो एक एनजीओ के साथ जुड़े. जो कुछ पूर्व आईएएस अधिकारियों, जज और दूसरे सरकारी अधिकारियों ने मिलकर स्थापित किया था.

ऐसे अधिकारियों की संख्या 20 थी. इनमें कुछ प्रमुख नाम पूर्व इलेक्शन कमिश्नर और गुजरात के गर्वनर आर के त्रिवेदी, पू्र्व डीजीपी और यूपीएससी के चेयरमैन रहे जेएन चतुर्वेदी और इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज एसएन सहाय शामिल थे.

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कई बार सत्ता को झुकाया

ये कोई पहला मौका नहीं था, जब एसएन शुक्ला या लोक प्रहरी एनजीओ ने अपनी याचिकाओं से बड़ा बदलाव किया हो. 2013 में लोक प्रहरी एनजीओ ने अदालत में दोषी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोला. उन्हीं की मुहिम का असर था कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि सज़ायाफ्ता सांसद या विधायक सजा की तारीख से पद पर रहने के अयोग्य होंगे.

इसके बाद NGO ने रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट 1951 को अदालत में चुनौती दी. इसका असर हुआ कि कोर्ट ने दोषी व्यक्ति के वोट देने पर प्रतिबंध और ऑफिस जाने पर रोक लगा दी.

साल 2015 में एनजीओ ने अदालत में चुनावों के दौरान नेताओं की पत्नियों और संबंधियों की संपत्ति के स्त्रोतों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की थी.

  (साभार न्यूज 18)

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