S M L

सुप्रीम कोर्ट में कौन सा जज सीनियर होगा, कैसे होता है तय?

केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट के जजों में वरीयता क्रम में तीसरे नंबर पर रखने पर विवाद खड़ा हो गया है

FP Staff Updated On: Aug 08, 2018 05:01 PM IST

0
सुप्रीम कोर्ट में कौन सा जज सीनियर होगा, कैसे होता है तय?

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के जज चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मिले. ये जज अपना विरोध दर्ज कराने पहुंचे थे. वे सरकार के सीनियर जज तय करने के फैसले से दुखी थे. दरअसल सरकार ने जस्टिस केएम जोसेफ के सीनियॉरिटी में उन्ही के साथ नियुक्त किए गए जजों जस्टिस इंदिरा बैनर्जी और जस्टिस विनीत सरन से नीचे कर दिया है. जबकि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनका नाम इन दोनों से जजों से पहले भेजा था.

इसे सुप्रीम कोर्ट के जज कॉलेजियम की अनदेखी के रूप में देख रहे हैं. साथ ही उनका कहना यह भी है कि इससे आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की संरचना पर भी प्रभाव पड़ेगा. जिसका निर्माण सुप्रीम कोर्ट के पांच सबसे सीनियर जज मिलकर करते हैं.

कैसे तय होता है कि सुप्रीम कोर्ट में सीनियर जज कौन होगा?

यह सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के साथ ही तय हो जाता है. जो जज पहले सुप्रीम कोर्ट का जज बनने की शपथ ले लेता है, वह अपने बाद शपथ लेने वाले जज से सीनियर हो जाता है. किसी जज की अप्वाइंटमेंट का वारंट सरकार की ओर से जारी होता है. ऐसे में जिसका अप्वाइंटमेंट का वारंट पहले जारी होता है, उसे पहले शपथ लेनी होती है यानि वह सीनियर हो जाता है.

पूछा जा सकता है कि उनका क्या जिन जजों की अप्वाइंटमेंट वारंट एक ही दिन जारी होता है? बता दें कि अभी जो मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर लागू है या जिस नए मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर का ड्राफ्ट फाइनल होने वाला है दोनों में ही सीनियॉरिटी का फैसला करने के लिए कोई लिखित व्यवस्था नहीं की गई है.

ऐसे में जिस क्रम में सरकार की ओर से जजों के नाम अप्वाइंटमेंट वारंट जारी होता है, उसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जजों को शपथ भी दिलाते हैं. उदाहरण के तौर पर वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और रिटायर हो चुके जस्टिस जे चेलमेश्वर का अप्वाइंटमेंट वारंट एक ही दिन जारी किया गया था. लेकिन जस्टिस मिश्रा के वारंट का नंबर जस्टिस चेलमेश्वर से पहले था तो उन्होंने पहले शपथ ग्रहण की. जिससे वे जस्टिस चेलमेश्वर से सीनियर हो गए. सरकार कैसे तय करती है कि किसे पहले वारंट जारी करेगी?

सरकार देखती है कि कॉलेजियम ने पहले किसका नाम जज बनाने को भेजा है. सरकार ऐसा भी कर सकती है कि कॉलेजियम ने कोई नाम भेजा हो और सरकार उसे वापस लौटा दे. लेकिन अगर कॉलेजियम फिर से वही नाम वापस भेज दे तो सरकार को उस जस्टिस के नाम अप्वाइंटमेंट वारंट जारी करना ही पड़ता है. इस नियम का जिक्र मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर में भी है.

भारतीय संविधान के आर्टिकल 124(2) के अनुसार, 'सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने पूर्ण अधिकारों के अंतर्गत करता है और इसके लिए वह आवश्यकतानुसार सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों से भी बातचीत कर सकता है. भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में भी वह सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के चाहे जितने न्यायाधीशों की सलाह ले सकता है.'

इसी आर्टिकल के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं. उनकी नियुक्ति के लिए कोई निश्चित उम्र या एक्सपीरियंस जरूरी नहीं है. हां अगर चीफ जस्टिस के अलावा दूसरे किसी जज की नियुक्त सुप्रीम कोर्ट में होनी हो तो राष्ट्रपति चीफ जस्टिस से इम मामले में बात जरूर करता है.

कॉलेजियम कैसे तय करता है कि किस जज की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट में होनी चाहिए

आज जिस तरह से कॉलेजियम जजों की नियुक्ति के लिए नामों का फैसला करता है, वह सारा प्रॉसेस पूरी तरह से सब्जेक्टिव है यानि की कॉलेजियम के सदस्यों के विवेक पर निर्भर करता है. कॉलेजियम इस फैसले को लेते हुए केवल यह नहीं देखता कि कौन या जज कितना सीनियर है बल्कि वह यह भी देखता है कि मेरिट के मामले में किस जज को वरीयता दी जा सकती है?

हालांकि वह ऑल इंजिया हाई कोर्ट जजेस की लिस्ट में कौन जज कितना सीनियर है इसपर भी जरूर विचार करता है. इसके अलावा कॉलेजियम यह भी देखता है कि क्या सभी राज्यों के हाईकोर्ट से जजों को सुप्रीम कोर्ट में सही प्रतिनिधत्व मिल रहा है या नहीं? एक उदाहरण के तौर पर, जस्टिस जेएस खेहर जो हाईकोर्ट में जस्टिस मिश्रा और जस्टिस जे चेलमेश्वर दोनों के बाद आए थे

यानि दोनों से जूनियर थे. जबकि उन्हें दोनों से महीनों पहले सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित कर दिया गया था. इसके चलते वे पहले ही चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बन गए थे. अगर उन्हें भी इन दोनों के साथ ही सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया जाता तो वे कभी भी CJI नहीं बन पाते.

हाल में चल रहा जस्टिस जोसेफ के सीनियर न बन पाने से जुड़ा मसला क्या है?

कॉलेजियम ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे जस्टिस जोसेफ का नाम सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए इस साल की 10 जनवरी को ही भेजा था. उन्हीं के साथ सीनियर एडवोकेट इंदू मल्होत्रा का नाम भी सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए भेजा था. अप्रैल में, सरकार ने (अब जस्टिस हो चुकीं) इंदू मल्होत्रा के नाम का अप्वाइंटमेंट वारंट तो जारी कर दिया पर जस्टिस जोसेफ का नाम पुनर्विचार के लिए कॉलेजियम को लौटा दिया था. इसके बाद 16 जुलाई को कॉलेजियम ने फिर से जस्टिस जोसेफ का नाम भेजा.

उसी दिन, कॉलेजियम ने जस्टिस बनर्जी और जस्टिस सरना का नाम भी सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए भेजा था. लेकिन जस्टिस जोसेफ की फाइल से इन दोनों नए जजों की नियुक्ति को अलग रखा था. कॉलेजियम का कहना है कि उसने जस्टिस जोसेफ की फाइल को पहली फाइल मानते हुए दोनों नामों से अलग और पहले भेजा था.

लेकिन जब शुक्रवार को सरकार ने तीन वारंट जारी किए, उसमें जस्टिस जोसेफ को सीनियॉरिटी के मामले में जस्टिस बनर्जी और जस्टिस सरन के नीचे रखा था. इसका यह मतलब हुआ कि वे इन दोनों जजों से जूनियर हो गए. जबकि इन दोनों जजों का नाम जुलाई में सजेस्ट किया गया था और जस्टिस जोसेफ का जनवरी में ही.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश लोग इस बात से खफा क्यों हैं?

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एकमत से 10 जनवरी को जस्टिस जोसेफ के लिए रिकमेंडेशन में लिखा था, "सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किए जाने के लिए किसी भी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और वरिष्ठ जजों से ज्यादा योग्य." ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों का अब मानना है कि जस्टिस जोसेफ को जूनियर बनाकर सरकार ने वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए पहले से बनी हुई प्रक्रिया का उल्लंघन किया है. जिससे सुप्रीम कोर्ट की स्वायत्तता धूमिल हुई है. और इस फैसले को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को नहीं स्वीकार करना चाहिए.

हालांकि अगर सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बनने के लिए वर्तमान में लागू वरिष्ठता का ही फॉर्मूला लागू रहा तो इन नए नियुक्त तीनों जजों में से कोई भी सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस नहीं बनेगा. और यह बाद में कॉलेजियम की मेंबरशिपर पर भी असर डालेगा. साथ ही अगर जस्टिस जोसेफ की नियुक्ति इन दोनों जस्टिस के सीनियर के तौर पर होती तो वे पहले ही सुप्रीम कोर्ट की बेंच को हेड करने लगते.

सरकार का जस्टिस जोसेफ को वरीयता में तीसरा रखने के पीछे क्या तर्क है?

सरकार का कहना है कि उसे एक नाम पुनर्विचार के लिए और दो नए नामों का सजेशन एक साथ, एक ही दिन मिले. जिसके चलते उन्होंने सारे ही सजेशन को एक जैसा माना. और इसके बाद उन्होंने सारे देश के हाईकोर्ट के जजों की वरिष्ठता को देखते हुए अप्वाइंटमेंट वारंट जारी किया. उन्होंने कहा कि नियमों के हिसाब से वे रिकमेंडेशन की असली तारीख को वारंट की रिलीज के लिए नहीं मानते.

(न्यूज 18 से साभार)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
सदियों में एक बार ही होता है कोई ‘अटल’ सा...

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi