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झारखंडः दुष्कर्म के आरोपी सीन से गायब हो गए, पत्थलगड़ी के बहाने ग्रामीणों पर पुलिसिया जुर्म

बीती 19 मई को झारखंड के खूंटी जिले के अड़की थाना क्षेत्र के कोचांग गांव में पांच महिलाओं के साथ जंगल में सामूहिक दुष्कर्म की वारदात सामने आई थी.

Anand Dutta Updated On: Jun 30, 2018 12:37 PM IST

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झारखंडः दुष्कर्म के आरोपी सीन से गायब हो गए, पत्थलगड़ी के बहाने ग्रामीणों पर पुलिसिया जुर्म

बीते 18 मई को झारखंड के खूंटी जिले के अड़की थाना क्षेत्र के कोचांग गांव में 5 महिलाओं के साथ जंगल में सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) की वारदात सामने आई थी. राजधानी रांची से 83 किमी दूर घटी इस घटना के तीसरे दिन पुलिस ने अपराधियों को खोजने का अभियान शुरू किया. दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया. उनके बयान के आधार पर पुलिस ने दावा किया कि इसमें पत्थलगड़ी आंदोलन के नेता जॉन जोनास तिड़ू (30) का हाथ है.

फिर क्या था...देखते ही देखते खूंटी में 3000 से अधिक अतिरिक्त जवान भर दिए गए. 26 जून को तय कार्यक्रम के अनुसार पत्थलगड़ी समर्थकों को घाघरा गांव में पत्थलगड़ी करना था. पुलिस ने जॉन को गिरफ्तार करने के लिए यहीं दबिश डालने की योजना बनाई. सामने लाठी, तीर-धनुष सहित अन्य पारंपरिक हथियारों के साथ लगभग 5000 से अधिक ग्रामीण, इधर एके-47, इंसॉस, आंसू गैस, रबर गोली, बख्तरबंद गाड़ियां, डीसी, एसपी, कोबरा बटालियन, रैप के जवान सहित लगभग दो हजार पुलिस.

पत्थलगड़ी समर्थकों ने तीन पुलिसकर्मियों का किया अपहरण

लाउडस्पीकर पर अनाउंस करते हुए पुलिस ने कहा कि उसे जॉन जोनास तिडू को गिरफ्तार करने दिया जाए, जो कि वहीं सभास्थल पर भाषण दे रहा है. जैसे ही सभास्थल के नजदीक पुलिस पहुंची, पत्थलगड़ी समर्थकों ने इसका विरोध किया. दोनों तरफ से संघर्ष शुरू हो चुका था. देखते ही देखते पुलिस ने लाठीचार्ज कर उन्हें खदेड़ दिया.

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गुस्साए समर्थकों ने भागने के क्रम में खूंटी के अनिगड़ा गांव स्थित सांसद करिया मुंडा के घर की सुरक्षा में तैनात झारखंड पुलिस के तीन जवानों को उनके हथियारों सहित अपने साथ लेते गए. शाम को पता चला कि अपहृत पुलिसकर्मियों को घाघरा में ही रखा गया है. पता चलते ही एक बार फिर पुलिस वहां पहुंची. रातभर वार्ता करने की कोशिश की गई, नतीजा सिफर रहा. ध्यान रखिएगा, इस बीच पीड़िताओं और गिरफ्तार आरोपियों ने अन्य आरोपियों के बारे जानकारी दी, पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने से अपना ध्यान हटा चुकी है.

30 से अधिक ग्रामीण अभी भी पुलिसिया गिरफ्त में

27 जून को पुलिस ने अपना रूप दिखाना शुरू किया. खूंटी जिला मुख्यालय से 10 किमी दूर लगभग 3000 पुलिसकर्मी घाघरा पहुंचे. उनके सामने डंडों के साथ आदिवासी महिलाएं खड़ी हो गईं. एक तीर चला और फिर पुलिस ने डंडे, आंसू गैस, रबर गोलियों का जमकर इस्तेमाल किया. जो पुलिस के सामने आए उन्हें बेरहमी के साथ पीटा गया. इस भगदड़ में चामड़ी गांव के सुखराम मुंडा की मौत हो गई. पत्थलगड़ी करने आए दूसरे इलाकों के आदिवासियों को जीप के शीशों को तोड़ा गया. देखते ही देखते सभा स्थल पर चारों तरफ गिरे हुए बाइक, लाठियों, तीर-धनुष और चप्पलों का अंबार लग गया.

इसके बाद लगभग 200 से अधिक आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया. पीछे से उनके हाथ बांध दिए गए. इसमें महिलाएं भी शामिल थीं. सभी को एक जगह रखा गया. पुलिस ने एक-एक से पूछताछ करनी शुरू कर दी. वह जानना चाह रहे थे कि अपहृत जवानों को कहां रखा गया है, जॉन तिडू कहां है, युसूफ पूर्ति (इस वक्त पत्थलगड़ी आंदोलन का अगुआ) कहां है. उन्हें कुछ भी मुकम्मल जानकारी नहीं मिली.

गांव छोड़ भाग चुके हैं आदिवासी, पालतू जानवर कर रहे इंतजार

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इस दौरान पकड़े गए एक आदिवासी के मुंह के सामने पांच से अधिक माइक लगा दिए गए और उससे पूछा गया कि वह क्यों आया है. उसने कहा कि गांव की मान्यता के मुताबिक अगर वह पत्थलगड़ी में नहीं आएगा तो उसे 500 रुपए फाइन देने पड़ेंगे. न आने पर उसका बहिष्कार भी किया जा सकता है. (देश के अधिकतर हिस्सों में गांवों में रीति-रिवाजों, मान्यताओं को न मानने पर इस तरह का नियम बनाया जाता है. आदिवासियों को रीति-रिवाजों के साथ अधिक गहरा जुड़ा माना जाता हैं). उसके ऐसा कहने के बाद उसके हाथ खोल दिए गए.

अगले दिन लगभग सभी अखबारों में हेडलाइन के साथ उसके इस कथन को प्रमुखता से छापा गया. इस घटनाक्रम में एक आदिवासी की मौत भी हो गई. पुलिसिया दबिश के भय से घाघरा, उदबुरू सहित कई गांव खाली हो चुके हैं. लोग घरों को छोड़कर निकल चुके हैं. इन घरों में गाय, बकरी, मुर्गी, सुअर जैसे जानवर जरूर अपने खिलानेवालों का इंतजार कर रहे हैं. गिरफ्तार किए गए आदिवासियों में 30 अब भी पुलिस की हिरासत में हैं.

छोड़ दिया गया है करिया मुंडा के सुरक्षाकर्मियों को

राज्य पुलिस प्रवक्ता आशीष बत्रा के मुताबिक तीन नहीं, चार पुलिसकर्मियों का अपहरण किया गया था. सभी को पुलिस ने छुड़ा लिया है. शुक्रवार 29 जून को एक बयान जारी कर उन्होंने कहा कि जवानों को खूंटी के पुटीगढ़ा गांव में ऑपरेशन चलाकर मुक्त कराया गया है. उसकी गुप्त सूचना गुरुवार देर रात मिली. जिसके बाद आईजी, डीआईजी, एसपी सहित भारी संख्या में फोर्स गांव पहुंची. पुलिस को देख पत्थलगड़ी समर्थक भाग खड़े हुए. चारों जवानों को सकुशल मुक्त करा लिया गया. एक दिन पहले ही उनकी सूचना देनेवालों को पुलिस ने पांच लाख रुपए इनाम देने की घोषणा की थी.

अशांत खूंटी को छोड़ सांसद क्यों बैठे हैं दिल्ली में

पूरे घटनाक्रम से नाराज खूंटी के बीजेपी सांसद करिया मुंडा ने इसका ठीकरा राज्य सरकार पर फोड़ा है. प्रभात खबर में छपी खबर के मुताबिक उन्होंने साफ कहा कि सरकार विरोधियों को बोलने का मौका दे रही है. सरकार को बातचीत के साथ इन इलाकों में विकास कार्यों को पहुंचाने की जरूरत है. जब जिला मुख्यालय में बिजली नहीं है तो भला गांवों में कहां से होगी! इधर सवाल ये भी है कि सांसद का क्षेत्र पूरी तरह अशांत है, उनके सुरक्षाकर्मियों का अपहरण हो जाता है, इन सब के बीच वह दिल्ली में बैठे हैं.

देशभर में पत्थलगड़ी, खूंटी ही क्यों बना मुद्दा

कई किताबें लिख चुके आदिवासी मामलों के जानकार एके पंकज कहते हैं कि लोगों का ध्यान इस तरफ क्यों नहीं जा रहा है कि देशभर के कई राज्यों में पत्थलगड़ी आंदोलन चल रहा है, लेकिन चर्चा में खूंटी ही क्यों है? इसका कारण है यहां के मुंडा आदिवासी. इतिहास खंगालेंगे तो आप देखेंगे कि इन इलाकों में अधिकतर आंदोलनों का नेतृत्व मुंडा आदिवासियों के हाथ में रहा है.

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चाहे बिरसा मुंडा हों, जयपाल सिंह मुंडा हों, भैयाराम मुंडा, पूर्व एमएलए हाथीराम मुंडा हों. इनसब के बीच जयपाल सिंह मुंडा की एक बात सबसे अधिक प्रासंगिक है जिसमें उन्होंने कहा था, ‘आदिवासी समाज चारों तरफ से घिरा हुआ है, इन सब के बीच रहते हुए हमें तय करना होगा कि कैसे जीना है.’ खूंटी भी मुंडा बहुल इलाका है.

ये साफ जाहिर हो चुका है कि गुजरात के कुंवर केसरी सिंह के बेटे राजेंद्र सिंह इसका संचालन कर रहे हैं, बावजूद वहां पुलिस दबिश के बजाए खूंटी में हजारों फोर्स तैनात कर दी गई है. इसपर मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग कहते हैं कि छत्तीसगढ़, ओडिशा, तेलंगाना में आदिवासियों ने थोड़ा सूझ-बूझ का परिचय दिया है. उन्होंने सत्ता को सीधे चुनौती देने और वोट बहिष्कार के बजाए पेसा एक्ट लागू करने की मांग की है. हाल ही में खूंटी में एक सोने के माइंस की बात सरकार ने मानी थी.

सीएम का धमकी भरा लहजा और आदिवासियों की खुन्नस

बीते साल अगस्त माह में जब एसपी-डीएसपी सहित लगभग 300 पुलिसकर्मियों को पत्थलगड़ी समर्थकों ने बंधक बना लिया था तब सीएम ने खूंटी में ही एक जनसभा में कहा था कि वह ग्रामीणों से बात करने जाएंगे. देखते हैं कौन ‘माई का लाल’ उन्हें रोकता है. अब जब पिछले दिनों घटनाक्रम तेजी से बदल रहा था तो एक बार फिर सीएम ने कहा कि पत्थलगड़ी समर्थक पुलिस को अपराधियों को पकड़ने के लिए उन इलाकों में घुसने दें, वरना पुलिस को पता है स्थिति पर कैसे नियंत्रण करना है. बजाए इसके अगर वह ग्रामीणों के साथ बैठकर बात करते तो स्थिति इस हद तक नहीं जाती.

एक सुर में ईसाई मिशनरियों पर बीजेपी नेताओं ने साधा निशाना

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन इलाकों में जब सड़क नहीं पहुंची थी, तब मिशनरी वहां पहुंच चुके थे. यही वजह है कि सरकार और जनप्रतिनिधियों से अधिक वह स्थानीय लोगों के साथ घुल मिल चुके हैं. बीते वर्षों में बड़ी संख्या में आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है.

ऐसे में खुफिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए पहले तो सरकार ने पत्थलगड़ी की घटना के पीछे चर्च का हाथ बताया. फिर रेप की घटना में कोचांग गांव के चर्च के पादरी और स्कूल के प्रिंसिपल के गिरफ्तार होते ही पूरी बीजेपी चर्च पर हमलावर हो गई. स्थानीय सांसद करिया मुंडा, केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत, राज्य बीजेपी अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ सहित राज्य बीजेपी नेताओं ने खुलकर चर्च पर आरोप लगाए.

बड़े सवाल

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• व्यवस्था से नाराज आदिवासियों से सीएम क्यों नहीं कर रहे बात?

• स्थानीय सांसद, विधायक क्यों नहीं कर रहे बात?

• रेप आरोपियों को पकड़ने की बजाए पत्थलगड़ी क्यों बना मुख्य मुद्दा?

• पेसा एक्ट अभी तक लागू क्यों नहीं किया गया?

• पत्थलगड़ी नेताओं पर खूंटी के एसपी ने अफीम की खेती पर नियंत्रण हासिल करने का आरोप लगाया, पुलिस खुद अभी तक अवैध खेती को क्यों नहीं नष्ट कर पाई?

• विचारधारा के तौर पर कमजोर दिख रहा आंदोलन आगे किस रूप में बढ़ेगा?

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं. )

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