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प्रेस फ्रीडम डे: पुरुष सहयोगियों के नाम खबर लहरिया का खुला खत

‘अरे, आप पत्रकारिता और घर-परिवार, दोनों कैसे मैनेज कर लेती हैं?’ सवाल के जवाब में सवाल ‘पुरुष सहकर्मी जी, क्या आपसे यह सवाल कभी पूछा जाता है?’

Khabar Lahariya Updated On: May 03, 2018 01:45 PM IST

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प्रेस फ्रीडम डे: पुरुष सहयोगियों के नाम खबर लहरिया का खुला खत

(संपादक की ओर से: वर्ल्ड फ्रीडम डे के मौके पर खबर लहरिया की पत्रकारों ने मीडिया इंडस्ट्री में काम करने वाले अपने पुरुष सहयोगी के नाम ये खुला खत लिखा है. हम इसे इसके मूल रूप में प्रकाशित कर रहे हैं.)

‘अरे, आप पत्रकारिता और घर-परिवार, दोनों कैसे मैनेज कर लेती हैं?’

सवाल के जवाब में सवाल ‘पुरुष सहकर्मी जी, क्या आपसे यह सवाल कभी पूछा जाता है?’

आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है, यानी मीडिया के सभी मंचों पर आज़ादी से अपने विचार रख पाने के लिए इस दिन को स्थापित किया गया है.

खबर लहरिया में हम पिछले सोलह सालों से प्रिंट और डिजिटल माध्यम से अपने विचार स्वतंत्र तरीके से रखते आये हैं. इतने सालों में जहां बहुत कुछ बदला, वहां कुछ चीज़ें बिल्कुल भी नहीं बदली, जैसे हमारे पुरुष सहकर्मी, और उनका विशाल ज्ञान! दरअसल उनके सलाह मशविरे सुन-सुनकर हमारे कान पक चुके हैं, इसलिए हमने सोचा क्यों ना आज के दिन हम कुछ सलाह उन्हें दे?

तो ये है हमारा खुला ख़त, हमारे पुरुष सहकर्मियों के नाम, जो हमारे ज़िले में है, और बाहर भी.

तो सबसे पहले तो आप हमें यह बताना छोड़ दें कि महिला मुद्दों पर खबर करना हमारी ज़िम्मेदारी है.

‘बलात्कार का एक केस आया है जिसे आप ज़रूर कवर करें‘ या ‘एक महिला ने अपने बॉयफ्रेंड को शादी के मंडप से उठा लिया और आप दिन भर न जाने कहां थीं.‘ जनाब, ऐसे मामले आप सिर्फ हमारे हवाले क्यों कर देना चाहते हैं? क्या यह आपके लिए खबर नहीं? और हां, जब आप इन मामलों पर रिपोर्टिंग करें, तो ठोस और स्वतंत्र मीडिया के सम्पादकीय नियमों के अनुसार करने का कष्ट करें, ना की सनसनीखेज ख़बरों की तरह. आपके ‘प्रेम प्रसंगों‘ और ‘तीन बच्चों की मां प्रेमी के संग फरार‘ वाली ख़बरों की अब हद हो चुकी है.

हम जानते हैं कि आपकी पहुंच कई नेताओं और मंत्रियों तक है. ख़बरों के सन्दर्भ में यह ज़रूरी भी है. लेकिन यहां पर निजी रिश्ते और पेशेवर तरीकों के बीच कोई लकीर खींचनी ज़रूरी है.

हमें अफ़सोस होता है आपको ऐसी जगहों में ठहाके लगाकर हंसते हुए देखना जहां हम इंटरव्यू में मंत्री जी से उनकी पत्नी का नाम पूछते हैं और वो चुटकी लेते हुए कहते हैं, ‘घरवाली का नाम बताएं या बाहरवाली का‘. यह आपत्तिजनक बयान है और इसमें मीडिया के पुरुष सहकर्मी का शामिल होना मीडिया के पेशे और आपकी भूमिका पर सवाल उठाता है.

हमारी निजी ज़िन्दगी में दखल देना आपका काम नहीं है. इसलिए ऐसे सवाल पूछना छोड़ दें, ‘आप शादी-शुदा हैं?’, ‘आप सिंदूर, बिछिया और मंगलसूत्र क्यों नहीं पहनतीं’, ‘आप सूट क्यों पहनती हैं?’, इत्यादि.

हमारी सुरक्षा को लेकर अपनी झूठी चिंता कृपया अपने पास ही रखें. सिस्टर, रात के बारह बज रहे हैं और आप सड़क पर हैं! सब कुछ ठीक तो है न?’ जैसे सवाल हमसे ना पूछे. अपनी सुरक्षा के लिए हम अपने आप को खुद ही ज़िम्मेदार मानते हैं, और वैसे भी जब हमें सपोर्ट की ज़रूरत महसूस हुई है, तब हम महिला पत्रकारों ने एक-दूसरे का साथ दिया है और साथ ही हौसला भी. जब कभी आपको पता चला है कि हमें कोई परेशान कर रहा है, तो आपकी बढ़िया सलाह, ‘मैडम, अपना नंबर बदल लीजिए’, पर हमें बहुत गुस्सा आया है.  क्या आप भी ऐसा होने पर अपना नंबर बदल लेते? हमसे क्यों ये उम्मीदें?

आपमें से कई बड़े मीडिया संगठनों के सम्पादक हैं. स्थानीय और ग्रामीण मीडिया में महिला पत्रकारों की भूमिका पर एक रिसर्च के दौरान जब हमने आपसे सवाल किए तो आपने यही कहा कि महिलाओं को सिक्योरिटी की ज़रूरत होती है, वो अकेली फील्ड में नहीं जा सकती हैं, उन्हें मातृत्व अवकाश की ज़रूरत पड़ती है और कुछ रिपोर्टिंग तो उनसे हो ही नहीं सकती है.  इसी रिसर्च के दौरान स्वतंत्र महिला पत्रकारों ने हमें बताया कि वे मीडिया के दफ्तरों से ज़्यादा खुद को फील्ड में सुरक्षित महसूस करती हैं. उनके अपने पुरुष सहकर्मी जहां छेड़खानी करते हैं वहां उन्हें इस बात को नज़रअंदाज़ करना पड़ता है या फिर काम छोड़ना पड़ता है. सम्पादक जी, क्या दिक़्क़त महिला पत्रकारों में है या मीडिया संगठनों के माहौल में?

डिजिटल की दुनिया में टेक्नोलॉजी का हम भरपूर इस्तेमाल करती हैं, लेकिन यहां भी आप आ पहुंचे अपना वही घटिया रवैया साथ लिए. वॉट्सऐप पर अगर रात में हम ऑनलाइन नज़र आएं तो आप हमें मैसेज भेजना अपना अधिकार समझते हैं- ‘नाइस पिक‘, ‘इतनी रात आप ऑनलाइन कैसे‘, ‘अभी तुम्हारे साथ और कौन है’ या ‘किससे इतनी रात चैट कर रही हो‘. और तो और तड़ाक से हमें वीडियो कॉल करना. आपकी वजह से न जाने कितने नंबर हम ब्लॉक करते हैं या अपना फ़ोन बंद कर देते हैं, लेकिन सोचने वाली बात ये है कि हम क्यों ऐसा करें? क्यों हम उन व्हाट्सऐप ग्रुप्स से लेफ्ट हो जाए, क्योंकि आप लोग अपने बेहूदे मज़ाक, महिला विरोधी बातें, आपत्तिजनक भाषा, शब्द, गालियां और अश्लील तसवीरें और वीडियो पोस्ट करने से बाज़ नहीं आ सकते?

दुनिया भर में महिलाओं ने अपने साथ हो रही हिंसा और अन्याय के खिलाफ सार्वजनिक आंदोलन शुरू किए हैं. #मीटू से लेकर कई लिस्ट तैयार की हैं जहां उत्पीड़न करने वाले पुरषों के नाम सार्वजनिक मंच पर पेश किए हैं।  हम इस खत को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर रही हैं. उम्मीद है आप इसपर गौर करेंगे. और हां, एक बार फिर ध्यान से पढ़ लीजिएगा, क्योंकि हो सकता है आप भी हो वो ज्ञानी महापुरुष जिसके नाम है ये खुला ख़त!

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