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'जम्मू से बाहर हो कठुआ केस की सुनवाई, तभी आरोपियों को मिलेगी सजा'

दीपिका सिंह राजावत, उस साहसी वकील का नाम है जो जम्मू-कश्मीर के हाईकोर्ट में कठुआ केस की पीड़िता की तरफ से केस लड़ रही हैं.

Rashme Sehgal Updated On: Apr 15, 2018 09:32 PM IST

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'जम्मू से बाहर हो कठुआ केस की सुनवाई, तभी आरोपियों को मिलेगी सजा'

दीपिका सिंह राजावत, उस साहसी वकील का नाम है जो जम्मू-कश्मीर के हाईकोर्ट में कठुआ केस की पीड़िता की तरफ से केस लड़ रही हैं. दीपिका ने ठान लिया है कि वो आरोपियों को हर हाल में सजा दिलवा कर रहेंगी. पीड़िता की इसी साल की शुरुआत में जम्मू के कठुआ में बड़ी ही बेदर्दी से गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई थी.

राजावत घाटी में मानवाधिकार के लिए काम करने वाले एनजीओ वॉयस फॉर राइट्स की अध्यक्ष भी हैं. राजावत कहती हैं कि इससे पहले भी कई बार उन्हें अपने काम के लिए लोगों का गुस्सा और गालियां सहनी पड़ी हैं लेकिन इस बार जब से उन्होंने कठुआ केस अपने हाथ में लिया है तब से ये सब कुछ काफी बढ़ गया है. इतना कि उन्हें हैरानी हो रही है कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या गलत कर दिया है या कर रही हैं. इन्हीं वजहों से उन्होंने जम्मू हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को चिट्टी लिखकर अपने लिए सुरक्षा की मांग की है. उनसे बातचीत की है है फ़र्स्टपोस्ट की रश्मि सहगल ने.

सवाल. आपने कठुआ केस की पीड़िता का केस लड़ने का फैसला क्यों किया?

जवाब. मैं पहले भी मानवाधिकार से जुड़े कई केस लड़ती रही हूं. पीड़िता गरड़ियों के एक गरीब परिवार से आती है. वे लोग आज यहां रहते हैं तो कल कहीं और....बेहद गरीब हैं. उन्हें एक धमकी भी दे दो तो वे चुप हो जाएंगे. मैंने ही आगे बढ़कर फरवरी महीने में उनसे बातचीत की थी. पीड़िता 10 जनवरी वाले दिन गायब हुई थी लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की. मुझे लगा कि मुझे उनकी तरफ से ये लड़ाई लड़नी चाहिए.

सवाल. आपको क्या लगता है, जम्मू बार एसोसिएशन के वकील आपके इस केस को लेने के फैसले से इतने नाराज क्यों थे?

जवाब. मैंने पीड़िता के पिता की तरफ से रिट पिटीशन दाखिल की थी. उन्होंने कोर्ट की निगरानी में अपनी बेटी की मौत की जांच के लिए आवेदन किया था. वकीलों का दावा था कि जांच सही तरीके से नहीं की गई थी. मैं कोर्ट में ही थी जब जम्मू बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट बीएस सलाथिया वहां से गुजर रहे थे और कहा था कि मुझे इस केस के सिलसिले में वहां मौजूद नहीं होना चाहिए.

मैंने तब उनसे कहा था कि मैं बार की सदस्य नहीं हूं, जिसपर उन्होंने मुझे कहा कि, ‘अगर आप केस का हिस्सा बनती हैं तो हमें पता है कि हमें आपको किस तरह से रोकना है.’ इसके बाद मैं तुरंत भागकर मुख्य न्यायाधीश के पास गई और उनके पास एक शिकायत करवाई. उस शिकायत में मैंने लिखा कि मैं यहां सुरक्षित महसूस नहीं करती हूं इसलिए आप मुझे सुरक्षा प्रदान कराएं.

मैंने उनसे कहा कि आप सुनिश्चित करें कि जब मैं अदालत में इस केस की सुनवाई के लिए आऊं तो मैं सही-सलामत रहूं. मैं शुक्रगुजार हूं कि चीफ जस्टिस ने मेरी बात सुनी और तुरंत पुलिस की सुरक्षा विंग को निर्देश दिया कि वे मेरी रक्षा करें जिससे हाईकोर्ट परिसर में मैं सुरक्षित रहूं.

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि वकीलों को तभी अपना काम रोकना चाहिए जब उनके सामने कोई अभूतपूर्व समस्या आ खड़ी हो, वरना उन्हें समस्याओं का निपटारा करते हुए अपना काम करते रहना चाहिए. लेकिन यहां के वकील सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश की पूरी तरह से न सिर्फ अवहेलना कर रहे हैं बल्कि उन्हें इसके लिए कोई चेतावनी भी नहीं दी जा रही है.

bhopal rape case

प्रतीकात्मक तस्वीर

सवाल. क्या आपने चार्जशीट देखी है,क्या आपको वो सही लग रहा है?

जवाब. हां मैंने चार्जशीट देखी है और मैं उससे पूरी तरह से संतुष्ट हूं. मैं सीबीआई जांच की मांग क्यों करूं? मेरा सवाल ये है कि जब एफआईआर की जा रही थी तब ये वकील कहां थे?

सवाल. पर मेरा ख़्याल है कि एक अतिरिक्त चार्जशीट भी जल्द ही दर्ज किया जाएगा?

जवाब. हां, मेरे ख्याल से एक अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि इस जांच पर हाईकोर्ट की निगरानी है, क्योंकि आरोपियों में पुलिस के लोग भी शामिल हैं. केस के सिलसिले में पहले तीन एसआईटी का गठन किया गया, फिर विचार-विमर्श के बाद ही इसे क्राइम ब्रांच को दिया गया. मैं यहां ये कहना चाहूंगी कि - जब कोर्ट ने इस मामले की जांच पर नजर रखनी शुरू की तभी जांच के नतीजे एक के बाद एक धीरे-धीरे सामने आने शुरू हुए. कोर्ट ने केस से जुड़ी जांच रिपोर्ट के एक-एक पहलू और क्राइम ब्रांच की रिपोर्ट का बहुत बारिकी से अध्ययन किया.

सवाल. आपको पहले भी जान से मारने की धमकी मिल चुकी है?

जवाब. ऐसा कई बार पहले भी हो चुका है. इसी साल की शुरुआत में मैंने एक केस लिया था जिसमें एक जज पर अपनी नौकरानी का रेप करने का आरोप लगा था. उस जज को गिरफ्तार कर लिया गया था और इस समय वो जेल में कैद है. मैंने कुछ साल पहले एक और केस हाथ में लिया था, जिसमें एक 12 साल की बच्ची की संदिग्ध परिस्थितियों में एक वकील के घर में मौत हो गई थी. उस वकील का कहना था कि लड़की ने आत्महत्या कर ली है लेकिन लड़की के माता-पिता मेरे पास मदद के लिए आए तो मैंने वो केस भी लड़ने का फैसला किया. तब भी यहां के वकीलों ने मेरा विरोध किया और बार एसोसिएशन की मेरी सदस्यता रद्द कर दी.

सवाल. आपके बारे में कहा जाता है कि आप हमेशा औरतों और बच्चों से जुड़े केस ही लड़ती हैं?

जवाब. मैं ये जरूर कहना चाहूंगी कि मैं वॉयस ऑफ इंडिया के नाम से एक एनजीओ चलाती हूं और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे या केस हाथ में लेती हूं. इनमें से ज्यादातर मामले औरतों के साथ बुरे व्यवहार, बच्चों की खरीद फरोख्त और बच्चों के साथ होने वाले अन्य तरह के दुर्व्यवहार से जुड़े होते हैं, जिनमें माइंस में होने वाले मामले भी होते हैं. एक बार आप नजर दौड़ा कर देखें कि हमारे आसपास ऐसे कितने बच्चे हैं जो एलओसी के नजदीक रहते हैं और किसी बारूदी सुरंग में गलती से चले जाने के बाद घायल हो जाते हैं.

मैंने साल 2012 में एक जनहित याचिका दायर कर कोर्ट से ये मांग की थी कि वे ऐसे बारूदी सुरंग के हमलों में घायल बच्चों की गिनती करवाए और उन्हें पर्याप्त मुआवजा दे. मुझे इस बात की खुशी है कि मेरी पीआईएल की वजह से इन बारूदी सुरंग से घायल होने वाले बच्चों को दो-दो लाख रुपए की सहायता मिल रही है.

लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें बेहतर और सुरक्षित जगह में शिफ्ट कर दिया जाना चाहिए. सरकार को भी उनके पुनर्वास के लिए एक योजना लेकर आने की जरूरत है. ये एक ऐसा मुद्दा है जिसे जम्मू बार एसोसिएशन के अन्य वकीलों को भी आगे लेकर आना चाहिए.

मैं जुवेनाइल जस्टिस के क्षेत्र में भी काम करती हूं. अपने इन्हीं कामों की वजह से मुझे चरखा फेलोशिप और लाडली अवॉर्ड दिया गया था. एक और महत्वपूर्ण मुद्दा जो मैंने हाथ में लिया है वो ये है कि कैसे यहां के फल माफिया कृत्रिम केमिकल्स का इस्तेमाल कर फलों को पकाते हैं, इसमें कैल्शियम कार्बाइड जैसा केमिकल भी शामिल है.

मैं चाहती हूं कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो काफी कुछ बोलते रहते हैं, वो इस मसले पर गौर करेंगे क्योंकि फल एक ऐसी चीज है जो हम सभी खाते हैं. मैंने इस संबंध में भी एक जनहित याचिका दाखिल की है, ताकि सरकार इस तरह के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक ठीक-ठाक मॉनिटरिंग संस्था का गठन करे जो इस तरह के गोरखधंधे पर रोक लगा सके.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

सवाल. आपको क्या लगता है कि कठुआ जैसे मामले में जो काफी हद तक सांप्रदायिक रंग लेता दिख रहा है, उसको लेकर यहां के वकीलों में इतना गुस्सा क्यों है?

जवाब. हां, मेरे ख्याल ये उनकी रणनीति खुद को लाइमलाइट में लाने की. ये वकील इस समय कई अन्य खानाबदोश या कबिलियाई समूह को बाहर करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं. इसमें रोहिंग्या भी शामिल हैं. ये विरोध मुख्य रूप से ये वकील कर रहे हैं क्योंकि उन्हें कानून के सभी दांव-पेंच मालूम है, उन्हें पता है कि वे इससे किस तरह से निपट सकते हैं.

सवाल. क्या आपको लगता है कि इस केस को जम्मू से बाहर ले जाना चाहिए?

जवाब. बिल्कुल. मुझे नहीं लगता है कि इस केस की सुनवाई जम्मू में होनी चाहिए. मैं इस मसले पर पीड़िता के पिता से बात करूंगी कि हमें इस केस की कार्रवाई किसी अन्य कोर्ट में ट्रांसफर करवा लेना चाहिए.

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