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कठुआ केस: उजागर हुईं कश्मीर की सरकार और सामाजिक ढांचे की कमियां

जम्मू में चल रहा मौजूदा आंदोलन सांस्कृतिक तौर पर काफी हद तक अलग दो क्षेत्रों के राजनेताओं द्वारा दशकों से पैदा किए अविश्वास का नतीजा है.

Sameer Yasir Updated On: Apr 15, 2018 09:24 PM IST

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कठुआ केस: उजागर हुईं कश्मीर की सरकार और सामाजिक ढांचे की कमियां

जम्मू के वकील महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीपी) की अगुवाई वाली जम्मू-कश्मीर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं. वकीलों ने बंद का आह्वान किया था. इस सरकार में बीजेपी भी सहयोगी पार्टी है. वकीलों ने कई मागों को लेकर हड़ताल बुलाई थी. इनमें सबसे प्रमुख मांग 8 साल की लड़की के रेप और हत्या केस की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने की है. पीड़िता की मौत के कारण जम्मू-कश्मीर में पिछले महीने से माहौल काफी गर्म है. राज्य पुलिस के क्राइम ब्रांच ने इस मामले में बीते सोमवार को चार्जशीट दायर की थी.

इस बच्ची को जनवरी महीने में कठुआ जिले की हीरानगर तहसील के रसाना गांव में अगवा कर उससे रेप किया गया था और उसके बाद उसकी हत्या कर दी गई. यह लड़की घुमंतू बकरवाल समुदाय से थी और उसका शव 17 जनवरी को कठुआ के रसाना गांव से बरामद किया गया था. इससे एक हफ्ते पहले वह गायब हो गई थी. वह जंगली इलाके में घोड़ों को चराने जाया करती थी.

प्रदर्शनकारियों ने जम्मू एयरपोर्ट से लेकर गांधीनगर इलाके तक यानी शहर के मुख्य इलाके में सड़कों पर टायर जलाए और बंद को पूरी से अमल में लाने के लिए तमाम इलाकों का भी चक्कर लगाया. बीजेपी समेत कई राजनीतिक पार्टियां भी इस बंद का समर्थन कर रही थीं. जम्मू-कश्मीर की सर्दियों की राजधानी जम्मू ही है. कुछ प्रदर्शनकारियों ने हाथ में डंडा भी लिया हुआ था.

विशाल डोगरा (33 साल) नामक एक प्रदर्शनकारी ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'हम कश्मीरी की अगुवाई वाली सरकार पर कभी भरोसा नहीं करेंगे. बेशक उसकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी क्यों नहीं हो? हम चाहते हैं कि कठुआ मामले को सीबीआई को सौंपा जाए.'

इस मुद्दे पर जम्मू शहर बुधवार को तकरीबन ठहर सा गया था. जांचकर्ताओं के मुताबिक, घुमंतू समुदाय से ताल्लुक से रखने वाली इस 8 साल की लड़की को पहले बेहोशी की दवा दी गई और उसके बाद उसे कठुआ जिले के रसाना गांव के एक मंदिर के भीतर उससे बार-बार रेप किया गया. कठुआ हिंदू बहुल जिला है और यहां घुमंतू समुदाय के लोग दशकों से शांतिपूर्वक रहते आए हैं. यह घटना जम्मू-कश्मीर की बंटी हुई राजनीति की तरफ भी इशारा करती है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

इस इलाके के गुर्जर घुमंतू समुदाय के बाकी सदस्यों की तरह पीड़िता का परिवार भी गर्मी के सीजन में अपने जानवरों के साथ हिमालय की पहाड़ियों से संबंधित इलाकों में अपना वक्त गुजारता है. पीड़िता का परिवार और समुदाय के बाकी लोग हरी घास पर अपने भेड़ों को चराते हैं, पानी की धाराओं के आसपास इकट्ठा होकर रहते हैं और बकरी व भैंसों का दूध बेचते हैं. सर्दियों की शुरुआत होने के बाद वे जम्मू के मैदानी इलाके में पहुंच जाते हैं. दरअसल, भयंकर सर्दी के मौसम और पहाड़ों पर बर्फबारी के दौरान जम्मू का इलाका अपेक्षाकृत गर्म रहता है.

जम्मू में मौजूद क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'वह मंदिर के संरक्षक संजी राम की साजिश का शिकार हुई. संजी राम इस सिलसिले में कई महीनों से साजिश रच रहा था. इस दुखांत कहानी में और इस वीभत्स अपराध के लिए पूजा-अर्चना की जगह का इस्तेमाल किया गया.'

प्रदर्शनकारियों की भीड़ बढ़ने के साथ ही मांगों की संख्या में भी बढ़ोतरी हो गई है. जम्मू बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह सलूठिया की पहल पर मिली प्रतिक्रिया के बाद प्रदर्शनकारियों ने इस बाबत मांग जल्द से जल्द पूरी करने को लेकर आक्रामक रुख अख्तियार कर रखा है. भूपिंदर सिंह ने प्रदर्शनकारियों को संबोधित भी किया, जिनमें से कई भगवा साफा बांध रखा था और 'बम बम भोले' और 'भारत माता की जय' के नारे लगा रहे थे.

सलूठिया ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, 'हम वही लोग हैं, जिन्होंने महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुला को 2009 में एयरपोर्ट से आगे निकलने नहीं दिया. हमें रोहिंग्या को अपनी जमीन से खदेड़ने की जरूरत है. अगर उनमें हमें रोकने का साहस है, तो वे हमें रोकने के लिए पुलिस और सीआरपीएफ का इस्तेमाल करें.' उनके इस भाषण पर जमकर तालियां बजीं और इसके बाद उन्होंने माइक किसी और वक्ता को दे दिया.

जम्मू में चल रहा मौजूदा आंदोलन सांस्कृतिक तौर पर काफी हद तक अलग दो क्षेत्रों के राजनेताओं द्वारा दशकों से पैदा किए अविश्वास का नतीजा है. नफरत की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि इसने दोनों क्षेत्रों (जम्मू और कश्मीर) के बीच तकरीबन नहीं पाट सकने वाले खाई पैदा कर दी है. हाल के वर्षों के कई मामलों की तरह पीड़िता का केस भी इस विवादित राज्य के दो हिस्सों के बीच विभेद और खाई की तरफ इशारा करता है- एक क्षेत्र (कश्मीर) जहां मुस्लिम बहुल है और आजाद देश की मांग कर रहा है, वहीं दूसरा क्षेत्र यानी हिंदू बहुल जम्मू पूर्ण तौर पर भारत का अटूट हिस्सा होने के लिए संघर्ष कर रहा है.

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री के पिता और पीडीपी के संस्थापक व राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद ने हिंदू दक्षिणपंथी पार्टी के साथ गठबंधन कर दोनों क्षेत्रों के बीच मौजूद इसी खाई को पाटने और उन्हें भी सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त करने का सपना देखा था. आज 'उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव' (महबूबा मुफ्ती के अपने शब्दों में ही) के लोगों को एक साथ लाना मुफ्ती मोहम्मद सईद की पार्टी और उनकी बेटी के लिए ही मजाक की बात बनकर रह गई है.

राज्य में बीजेपी के प्रवक्ता अशोक कौल ने बताया, 'हम हर रोज कश्मीर और जम्मू के बीच खाई को भरने की कोशिश कर रहे हैं. सड़कों पर जो लोग विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं, वे ही राज्य की खराब स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं.' राज्य की सत्ताधारी पार्टी पीडीपी के प्रवक्ता रफी मीर ने बताया कि दोनों क्षेत्रों के बीच मौजूद खाई को हर हालत में भरना होगा. उन्होंने कहा, 'हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जम्मू के लोग केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच की मांग करने के बजाय अपने संस्थानों का सम्मान करें. जो लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, वे वाकई में घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं.'

दरअसल, यह समस्या ऐसे स्तर पर पहुंच गई है, जहां रेप और हत्या की शिकार हुई बच्ची का केस लड़ने वाली महिला वकील की सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पुलिस को निर्देश देना पड़ा. इस महिला वकील को उनके ही समुदाय के लोगों ने धमकी दी थी. महिला वकील- दीपिका सिंह राजावत ने बताया कि उन्हें पीड़िता के पक्ष में केस लड़ने पर जम्मू बार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने धमकी दी थी.

उनका यह भी कहना था कि उनके खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया और उन्हें 'गंभीर नतीजे' भुगते जाने संबंधी धमकी भी दी गई. 38 साल की राजावत ने कहा, 'दलील में कमजोर पड़ने के कारण ही इस तरह की धमकी दी जा सकती है. उन्होंने कहा कि अगर तुम नहीं रुकी, तो तुम्हें रास्ता दिखा दिया जाएगा. वे कुछ भी कर सकते हैं और मुझे अपनी जिंदगी को लेकर खतरा महसूस होता है. '

bhopal rape case

प्रतीकात्मक तस्वीर

राज्य की कांग्रेस इकाई का मानना है कि बंद के आह्वान का कोई तुक नहीं है. जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के सीनियर नेता जीएम सरूरी ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि प्रदर्शनकारियों में शांति विरोधी तत्व भी थे, जो जम्मू के शांतिप्रिय लोगों की कीमत पर बवाल खड़ा करना चाहते हैं और इसे हिंदू बनाम मुस्लिम का मुद्दा बनाना चाहते हैं. उनका कहना था, 'यह रेप मनोरोगियों द्वारा किया गया है और इसमें शामिल लोग चाहे किसी धर्म के हों, उन्हें छोड़ा नहीं जाना चाहिए.'

जम्मू के नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता देविंदर सिंह राणा ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहा, 'मैं स्तब्ध हूं, उन्हें शर्म आनी चाहिए. अगर इस बच्ची को न्याय नहीं मिलता है, तो यह मानवता पर दाग होगा. वे न सिर्फ बलात्कारियों का बचाव करने बल्कि लोगों को बांटने के लिए भी धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं '

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