live
S M L

नोटबंदी: घबराहट और संदेह में फंसा कश्मीर का जंस्कार गांव

नोटबंदी की खबर पर जम्मू कश्मीर के जंस्कार घाटी के लोगों को भरोसा नहीं हुआ

Updated On: Dec 08, 2016 08:35 AM IST

Sameer Yasir

0
नोटबंदी: घबराहट और संदेह में फंसा कश्मीर का जंस्कार गांव

पीएम मोदी ने 8 नवंबर को नोटबंदी का ऐलान किया था लेकिन जम्मू कश्मीर के पी. नामग्याल को इसकी जानकारी एक दिन बाद तब मिली जब वो लद्दाख के जंस्कार इलाके में पहुंचे.

पी. नामग्याल शदाय गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने इस खबर के मिलते ही करगिल में ही काम कर रहे गांव के एक स्थानीय लड़के को इस खबर के साथ गांव भेजा.

“एक दिन के सफर के बाद उस लड़के ने गांव पहुंचकर गांववालों को बताया कि सरकार ने 500 और 1000 के नोट पर रोक लगा दी है और अब ये नोट कानूनी तौर पर चलन में नहीं है, इसलिए इन्हें जल्द से जल्द बैंक में जमा कर देना चाहिए. लेकिन उसकी इन बातों को सुनकर न सिर्फ गांव के लोग उस पर हंसे बल्कि वहां के सरपंच ने भी उसकी बातों का भरोसा नहीं किया.”

24 साल के नामग्याल ने ये जानकारी हमें रविवार को फोन पर दी.

छोटी-छोटी बस्तियों का बसेरा  

जंस्कार घाटी में शुन, शदाय और रालाकुंग नाम के तीन छोटे-छोटे गांवों का समूह बसा हुआ है. स्थानीय बोलचाल की भाषा में इन छोटे-छोटे बसावट को ‘दुनिया की छत पर बसी अटारी’ भी कही जा सकती है.

और अगर कभी किसी युवा गांववाले को जंस्कार जाने की ज़रुरत पड़ती तो, उन्हें कम से कम 12-14 घंटे तक पैदल चलना पड़ता, क्योंकि वहां कोई पक्की सड़क नहीं है.

ऐसा कहा जाता है कि भारत गांवों में बसता है. लेकिन लद्दाख की इस बंजर धरती पर बसी ये छोटी-छोटी बस्तियां, ज्यादातर समय सभ्यता से कटे रहते हैं. नामग्याल कहते हैं, “21वीं सदी के इस दौर में भी हमारे पास बिजली की सुविधा नहीं है. टेलीविजन तो भूल ही जाइए. मेरे जैसे किसी युवा व्यक्ति को भी जंस्कार पहुंचने में 12 से 14 घंटे लग जाते हैं. जबकि किसी बूढ़े व्यक्ति को तो तीन दिन भी लग जाते हैं.”

जंस्कार एक तहसील है और वहां बैंक का सिर्फ एक ब्रांच है, जिसे जम्मू-कश्मीर बैंक इलाके की लगभग 20 हजार आबादी के लिए चलाता है.

लेकिन यहां के ज्यादातर लोगों के मन में बैंक अपनी कामकाज की क्षमता के कारण विश्वास पैदा करने में नाकाम रहा है, जिस कारण अधिकांश लोग अपने जमा पैसे घर पर ही रखना पसंद करते हैं.

“हम जहां रहते हैं वहां के लोगों को न तो बैंक पर भरोसा है न ही दूसरे किसी वित्तीय संस्थानों पर. ऐसे में भला कोई उन्हें कैसे समझा सकता है कि उनके घरों पर जो पैसे जमा हैं, वो नोटबंदी के कारण कागज के टुकड़े भर रह जाएंगे और उन्हें बैंकों में वापिस जमा करना होगा.” नामग्याल ने कहा.

The village of Padum from Khangok

पीएम की योजना का पता नहीं

शाबिर अहमद, पेशे से एक शिक्षक और जंस्कार के जोनल एजुकेशन ऑफिस में जोनल रिसोर्स पर्सन हैं. उनके मुताबिक जो लोग दूर-दराज के इलाके में रहते हैं, उन्हें पीएम मोदी की इस नई योजना के बारे में कुछ भी पता नहीं है.

शाबिर कहते हैं, “इन गांवों में बिजली होना भी एक सपने जैसा है. यहां पक्की सड़क भी नहीं है. यहां पहुंचने के लिए इकलौता जरिया हेलिकॉप्टर है. चुनाव के दौरान चुनाव आयोग यहां मतदाताओं के लिए पोलिंग बूथ बनाता है, लेकिन कभी कोई नेता हमसे वोट मांगने नहीं आता. वे हमसे बहुत दूर जो रहते हैं.”

इन गांवों में रहने वाले लोगों से संपर्क करना बहुत ही मुश्किल काम है. इस बंजर और सूखे इलाके में रहने वाले लोगों से बात करने के लिए फ़र्स्टपोस्ट को कम से कम 37 फोनकॉल्स करने पड़े, तब जाकर हमें एक व्यक्ति से बात करने में सफलता मिली. उन्होंने बताया कि जंस्कार से कुछ ही लोग नोट बदलने आए थे, जबकि ज्यादातर लोगों ने अपने पैसे अपने पास रखना ही सही समझा. उन्हें लगता है कि किसी ने उनके साथ मजाक किया है.

इन बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर युवा लेह-हिमाचल की सीमा पर बसे गांव सरफो चले गए हैं, जहां वे दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करते हैं. यहां रहने वाले ज्यादातर लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं जबकि कुछेक लोग मुसलमान भी हैं, जो जंस्कार की कुल 20 हजार की आबादी का एक छोटा हिस्सा है.

kashmir village 2

लोगों में घबराहट  

पेशे से लेक्चरर डॉ सोनम जोल्डन के मुताबिक लेह और करगिल के इलाके में रहने वाले लोग नोटबंदी की खबर सुनकर घबरा गए, क्योंकि उनमें से अधिकतर के पास न तो टीवी है न ही मोबाइल फोन. वे कहती हैं, “सूचना का प्रसार एक अत्यंत ही जटिल काम है. अगर आप उन्हें कोई खबर देना चाहते हैं तो आपको उनके पास किसी को पैदल भेजकर ये जानकारी देनी होगी.”

डॉ जोल्डन के अनुसार, ‘जंस्कार के इन दूर-दराज में रहने वाले लोगों के पास बैंक अकाउंट नहीं है क्योंकि उनके पास बैंक की सुविधा नहीं है और ज्यादातर लोग अपने जमा पैसे घर पर ही रखना पसंद करते हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘जब लोगों तक सूचना आने-जाने की सुविधा सीमित है, तब भी लद्दाख के  हजारों लोगों पर सरकार के इस फैसले का असर पड़ा है.’

“इनकी जिंदगी पूरी तरह से बिखर जाएगी. इनमें से ज्यादातर लोगों ने शायद सरकार के फैसले के बारे में सुना भी न हो. एक समूह ऐसा है जिनपर इस फैसले का सबसे ज़्यादा असर हुआ है और वो है महिलाएं. वे अपना जमा किए गए पैसे नकद में ही घर पर रखना पसंद करती हैं. जो लोग टूर गाइड के तौर पर काम करते हैं वे भी अपना पैसा बैंक के बजाय घर पर ही रखना पसंद करते हैं. और इस फैसले का सबसे ज्यादा असर उन पर ही होगा.” जोल्डन ने कहा.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi