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अपनी शर्तों पर सरकार से बात करना चाहते हैं कश्मीरी अलगाववादी नेता

हुर्रियत ने कहा है कि अगर केंद्र सरकार 'स्पष्ट रोडमैप' पेश करती है, तो कश्मीर के अलगाववादी नेता बातचीत में शामिल होंगे

Ishfaq Naseem Updated On: May 30, 2018 09:58 AM IST

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अपनी शर्तों पर सरकार से बात करना चाहते हैं कश्मीरी अलगाववादी नेता

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल में कहा था कि अगर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस वार्ता के लिए आगे आता है, तो सरकार उसके साथ बातचीत कर सकती है. राजनाथ के इस बयान के दो दिनों के बाद यानी मंगलवार को अलगाववादियों के संगठन- संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व (जेआरएल) ने कहा कि वह केंद्र सरकार के साथ बातचीत के लिए तैयार है.

राजनाथ सिंह ने बीते शनिवार को हुर्रियत नेतृत्व के साथ बातचीत करने की मंशा जाहिर की थी. हुर्रियत (जी) के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी के हैदरपुरा स्थित आवास पर मंगलवार दोपहर को जेआरएल की बैठक हुई. इसमें जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के चेयरमैन यासीन मलिक और हुर्रियत (एम) के चेयरमैन मीरवाइज उमर फारूक भी शामिल हुए.

प्रधानमंत्री या गृह मंत्री के स्तर पर सरकार से बातचीत को तैयार हुर्रियत सूत्रों ने बताया कि जम्मू-कश्मीर अलगाववादी नेता प्रधानमंत्री या गृह मंत्री के स्तर पर भारत सरकार के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं. संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व ने वार्ता के लिए राजनाथ सिंह की पेशकश पर चर्चा की. हालांकि, इन अलगाववादी नेताओं ने प्रधाानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की तरफ से आए विरोधाभासी बयानों को लेकर खेद भी जताया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के अपने हालिया दौरे में विकास की जरूरत पर बल दिया था, वहीं स्वराज ने कहा है कि अगर सीमा-पार से 'आतंकवाद' का सिलसिला जारी रहता है, तो बातचीत संभव नहीं हो सकती है.

सूत्रों के मुताबिक, अगर केंद्र सरकार द्वारा 'स्पष्ट रोडमैप' पेश किया जाता है, तो कश्मीर के अलगाववादी नेता बातचीत में शामिल होंगे. हालांकि, संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व ने कहा कि कश्मीर समस्या के समाधान से संबंधित बातचीत में पाकिस्तान को भी शामिल किया जाना चाहिए.

पाकिस्तान को भी बातचीत में शामिल करने की मांग

संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व के बयान में कहा गया, 'विवाद के राजनीतिक निपटारे के लिए संबंधित पक्षों के बीच बातचीत सबसे बेहतर विकल्प है. चूंकि जम्मू-कश्मीर विभाजित क्षेत्र है और उसका आधा हिस्सा पाकिस्तान में है, लिहाजा इस विवाद में तीन पक्ष हैं-भारत, पाकिस्तान और इस इलाके के लोग. तीनों पक्षों के बीच गंभीर और स्पष्ट एजेंडे पर आधारित बातचीत कश्मीर विवाद को हल करने का सुनिश्चित और शांतिपूर्ण तरीका है. इस प्रक्रिया में किसी भी एक पक्ष की गैर-मौजूदगी की हालत में किसी तरह का हल नहीं निकलेगा. इस तरह की प्रक्रिया में पारदर्शिता के साथ-साथ तमाम पक्षों से इस तरह का आश्वासन बेहद जरूरी है, जिसमें तमाम वादों को पूरा करने की बात हो. संबंधित पक्षों खास तौर पर सबसे पीड़ित पक्ष की जरूरतों और चिंताओं को ध्यान में रखते हुए और सभी के लिहाज से संतोषजनक बातचीत निश्चित तौर पर सफल और परिणाम देने वाली होगी.'

'एक सुर में बात करें सरकार के तमाम प्रतिनिधि'

बयान में आगे कहा गया है, 'इस दिशा में भारत सरकार की किसी भी कोशिश को कश्मीर और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों से समर्थन मिलेगा. पहले भारत सरकार यह स्पष्ट करे कि वह क्या बात करना चाहती है. साथ ही, वह एक सुर में बात करे और हम इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए तैयार हैं. कश्मीर के लोगों का काफी कुछ दांव पर लगा है, हमने आत्मनिर्णय के अपने अधिकार के लिए काफी संघर्ष किया है. हमारे लिए वैसी कोशिशों से जुड़े अभियान में शामिल होना संभव नहीं है, जिसमें स्पष्टता और निश्चित दिशा का अभाव हो.'

इस बैठक के बाद अलगाववादी नेताओं ने खुद के हवाले से कुछ कहने से मना कर दिया. जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता यासिन मलिक ने बताया कि बैठक के बाद संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व ने संयुक्त बयान जारी करने का फैसला किया, जिसमें केंद्र सरकार के साथ बातचीत को लेकर अलगाववादियों का अपना पक्ष रखने की बात है.

संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व के मुताबिक, 'पिछले कुछ दिनों में बातचीत को लेकर नई दिल्ली में शीर्ष स्तर पर अलग-अलग लोगों के बयान अस्पष्ट और दुविधाजनक हैं. एक और जहां राजनाथ कहते हैं कि कश्मीर और पाकिस्तान दोनों से बातचीत होनी चाहिए, वहीं दूसरी तरफ स्वराज इसमें शर्त जोड़ते हुए कहती हैं कि जब तक आतंकवाद नहीं रुकता, तब तक पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं हो सकती. और अमित शाह युद्धविराम को नया मोड़ देते हुए कहते हैं कि यह आतंकवादियों के लिए नहीं बल्कि लोगों के लिए है. इसके अलावा, राज्य के डीजी ने इस सिलसिले में बयान जारी कर कहा था कि यह आतंकवादियों की घर वापसी के लिए है.'

‘सैन्य कार्रवाई नहीं, राजनीतिक समाधान से ही निकल सकता है हल’

जेआरएल ने कहा, 'मोदी ने श्रीनगर में कहा कि उनकी राय में कश्मीर की तमाम समस्याओं का निदान विकास है और इसके लिए शांति पहली शर्त है. इस तरह से उन्होंने शांति बहाल करने की जिम्मेदारी लोगों पर डाल दी और इस मामले में भारत सरकार को तमाम भूमिकाओं और जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया. प्रधानमंत्री ने जानबूझकर कश्मीर समस्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, यहां पर लाखों की संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की वजहों, रोज होने वाले हमलों और एलओसी के पास व अन्य इलाकों में खतरनाक माहौल जैसी चीजों को नजरअंदाज कर दिया. यह मोदी का लोगों के साथ क्रूर मजाक करने जैसा था.'

'इसके बाद कुछ दिन पहले राजनाथ सिंह ने कहा कि हम पाकिस्तान और हुर्रियत के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं, जिस पर सुषमा स्वराज ने अपनी तरफ से शर्तें जोड़ दीं और अमित शाह ने अपने चुनावी आकलन को दुरुस्त रखने के हिसाब से व्याख्याएं पेश कीं. अब सवाल यह है कि सिंह जिसका हवाला दे रहे हैं, वह बातचीत क्या है? बातचीत का एजेंडा क्या है? क्या यह वार्ता विकास को लेकर मोदी के सुझाव के बारे में होगी? जेआरएल उनके बयानों में अनियमितता और विरोधाभास को रेखांकित कर अपनी बढ़त नहीं बनाना चाहता है, लेकिन वह यह समझना चाहता है कि भारत सरकार अपने इन प्रतिनिधियों की तरफ से क्या संदेश भेज रही है.'

जेएलआर के बयान में आगे कहा गया है, 'चूंकि 70 साल से खिंचे चले आ रहे विवाद में जम्मू-कश्मीर के लोग सबसे ज्यादा पीड़ित हैं, लिहाजा हम लोग इसे खत्म करने के लिए सबसे ज्यादा उत्सुक हैं. लिहाजा, हमने हमेशा राजनीतिक और मानवीय मुद्दे के तौर पर इससे निपटने की वकालत की है, न कि सैन्य व्यवस्था के माध्यम से, जैसा कि भारत सरकार कोशिश करती रही है. और इस विवाद के राजनीतिक समाधान के लिए संबंधित पक्षों के बीच बातचीत सबसे बेहतर प्रक्रिया और विकल्प है.'

युद्धविराम के कारण कश्मीर में हिंसा में गिरावट

जेआरएल की बैठक कश्मीर में हिंसा में गिरावट की पृष्ठभूमि में हुई. रमजान के मौजूदा महीने में सुरक्षा बलों द्वारा आतंकवाद विरोधी अभियान को रोके जाने के बाद राज्य में हिंसा में कमी आई है. इससे पहले राजनाथ ने एकतरफा युद्धविराम का ऐलान किया था. हालांकि, आतंकवादियों ने इसे खारिज कर दिया है और उनकी तरफ से सुरक्षा बलों पर हमले जारी हैं. राज्य सरकार और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व को बैठक करने के लिए इजाजत दे दी थी. इससे पहले जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राजनाथ सिंह की बातचीत की पेशकश का स्वागत किया था.

पुलिस का कहना है कि रमजान के दौरान युद्धविराम के ऐलान के बाद कश्मीर में हालत सुधरे हैं. वैसे आम तौर पर अलगाववादी नजरबंदी की हालत में रहते हें और इससे पहले उन्हें बैठक की भी इजाजत नहीं दी गई थी. महबूबा का कहना है कि रमजान के दौरान युद्धविराम का फैसला लिए जाने के कारण जमीनी स्तर पर सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस मौके को नहीं छोड़ेगा और बहुप्रतीक्षित परिपक्वता का नमूना पेश करते हुए राज्य के लोगों के प्रति अपनी जिम्मदारी का प्रदर्शन करेगा, ताकि इस मौके को गंवाया नहीं जा सके. उनका यह भी कहना था कि 'राज्य में तमाम संबंधित पक्षों के बीच शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत के तौर-तरीके तलाशना जरूरी है' और 'बातचीत मसलों को सुलझाने का एकमात्र रास्ता है.'

कश्मीर में हालात में काफी सुधार देखने को मिला है और रविवार रात को पुलवामा में सेना के एक कैंप पर आतंकवादियों के हमले के बाद सुरक्षा बलों द्वारा एक नागरिक की 'हत्या' के मामले को छोड़ दें, तो मोटे तौर पर राज्य में हालात शांतिपूर्ण रहे हैं.

हालांकि, सुरक्षा बलों ने कश्मीर के भीतर अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा (एलओसी) के आसपास आतंकवादियों के खिलाफ अभियान नहीं छेड़ रखा है,, लेकिन सीमा-पार से गोलीबारी के मुकाबले और पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) की तरफ से आतंकवादियों की घुसपैठ को नाकाम करने के लिए अभियान जारी है. जिस जिन राजनाथ सिंह ने अलगाववादियों के साथ बातचीत के लिए सरकार के तैयार होने की बात कही, उसी दिन सुरक्षा बलों ने एलओसी के पास कुपवाड़ा में घुसपैठ की एक कोशिश को नाकाम कर दिया.

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