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पाकिस्तानी सीज़फायर उल्लंघन ने बर्बाद कर दी है बॉर्डर पर रहने वाले परिवारों की जिंदगी

बॉर्डर पर रहने वाले न तो अपने जीवन यापन के लिए आज़ादी से खेती-बाड़ी कर सकते हैं न ही उनके बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल जा सकते हैं

Updated On: May 29, 2018 01:44 PM IST

Arjun Sharma

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पाकिस्तानी सीज़फायर उल्लंघन ने बर्बाद कर दी है बॉर्डर पर रहने वाले परिवारों की जिंदगी

जम्मू में पिछले चार-पांच सालों में पाक सीमा पर सटे अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर और एलओसी यानी लाइन ऑफ कंट्रोल पर होने वाले सीज़फायर उल्लंघन की घटनाओं में काफी बढ़त हुई है. ये पहले से ज्यादा हो गईं हैं. भारत अभी भी इतना आत्मनिर्भर नहीं हुआ है कि वो इन इलाकों में रह रहे अपने उन नागरिकों की रक्षा कर सके, जो गोलीबारी के दौरान अपनी जान बचाने के लिए इधर से उधर भागते रहते हैं, क्योंकि उन्हें एंबुलेंस की सुविधा भी नसीब नहीं है.

यहां के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले गांववालों का कहना है कि उनकी ज़िंदगी इस कदर तकलीफ़देह हो गई है वे न तो अपने जीवन यापन के लिए आज़ादी से खेती-बाड़ी कर सकते हैं न ही उनके बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल जा सकते हैं, क्योंकि इस तरह की घटनाओं के कारण स्कूल भी बंद हो गए हैं. ये सब कुछ तब हो रहा है जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच साल 2003 में सीज़फायर समझौता हो गया था.

इलाके के मंदिर, स्कूल और कॉलेजों को अस्थायी कैंपों में तब्दील कर दिया गया है जहां पर सीमा पर रहने वाले गांव वालों को पाकिस्तान की तरफ से होने वाली फायरिंग के दौरान, गोलियों और मॉर्टार के हमलों से बचाए रखने के लिए पिछले दो हफ्ते से रखा गया है.

सांबा जिले की चिची माता मंदिर में बने ऐसे ही एक कैंप का दौरा इस संवाददाता ने किया. इस मंदिर में बने अस्थायी कैंप में तकरीबन 20 परिवारों को शरण दिया गया है. ये सभी परिवार सीमावर्ती क्षेत्र के निवासी हैं. इनसे हुई मुलाकात के बाद इस संवाददाता को सीमावर्ती इलाकों के इन शरणार्थियों के जीवन के असल हालात की जानकारी हुई.

47 साल के सुरिंदर कुमार सांबा के रामगढ़ के निवासी हैं. वे बताते हैं कि कैसे इन कैंपों में रहने वाले अबोध और छोटे बच्चों को दूध तक नहीं दिया जा रहा है. उनके मुताबिक, ‘अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन ने हमें हमारे गांव से तो निकाल लिया जहां पाकिस्तान की तरफ से लगातार गोलीबारी की जा रही थी, लेकिन यहां हमारे बच्चों के लिए दूध तक का इंतजाम नहीं किया गया है. यहां जितने भी लोग रहने के लिए आए हैं वे सब दिहाड़ी मजदूर हैं और उनके पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे अपने बच्चों के लिए, बिना काम किए दूध खरीद सकें.’

अपने परिवार के साथ सुरिंदर कुमार.

अपने परिवार के साथ सुरिंदर कुमार.

3 सालों में 4 बार गांव छोड़ना पड़ा

शांति देवी, 78 साल की हैं, उन्होंने भी सीमा के इस मंदिर में बने कैंप में शरण ली है. वो कहती हैं कि सीमा पर बसे इन इलाकों से पलायन इतनी सामान्य घटना हो गई है कि सांबा के छपरी गांव के लोगों को पिछले तीन साल में चार बार अपना घर-बार छोड़ना पड़ा है.

जम्मू से सटे अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर के कम से कम 102 गांवों को पिछले दिनों खाली कराया गया है, लेकिन इनमें से ज्य़ादातर लोगों ने अपने रिश्तेदारों के घरों में शरण ली है. जम्मू क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सीमा कम से कम 185 किमी लंबी है, जबकि एलओसी 734 किमी लंबी है. एलओसी की सीमा राज्य के जम्मू, कश्मीर और लद्दाख़ के इलाकों से होकर गुज़रती है.

जम्मू के अतिरिक्त जिला मैजिस्ट्रेट अरूण मनहास कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर से सटे अलग-अलग गांवों के कम से 80 हज़ार से ज़्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर रखा गया है. इंटरनेशनल बॉर्डर के आसपास के पांच किमी के रेंज में आने वाले 150 से भी ज़्यादा स्कूलों को लगातार हो रही गोलीबारी के कारण बंद कर दिया गया है. इनमें से जो इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं उनमें अरनिया, आरएसपुरा, सांबा, कठुआ और अखनूर सेक्टर शामिल हैं. ये सभी इलाके इंटरनेशनल बॉर्डर से लगे हुए हैं. इन इलाकों के घरों की दीवारें गोलियों के कारण छलनी हो चुकी हैं और ये सब न सिर्फ इन गांवों की त्रासदी को बयां करता है बल्कि ये भी कैसे ये रिहायशी इलाके भूतों का बसेरा बनकर रह गए हैं. इन गांवों में रहने वाले इंसान ही नहीं बल्कि मवेशी भी खत्म हो गए हैं.

आरएसपुरा सेक्टर में अपने घरों को छोड़कर जाते लोग.

आरएसपुरा सेक्टर में अपने घरों को छोड़कर जाते लोग.

गोलियां धर्म नहीं जानती

एलओसी के नौशेरा, सुंदरबानी, रजौरी जिले के मांजाकोट और कृष्णा घाटी के इलाकों, पूंछ के मेंढर और बालाकोट सेक्टर वो इलाके हैं, जो हमेशा से पाकिस्तानी गोलीबारी के शिकार रहे हैं या यूं कहें कि हमेशा से पाकिस्तानी राइफलों के निशाने पर रहे हैं.

मई 2017 में पाकिस्तान की तरफ से हो रही लगातार गोलाबारी से परेशान रजौरी जिले के कई गांवों से साढ़े चार हज़ार ज्यादा लोगों ने पलायन कर लिया था. इन सभी लोगों ने राहत शिविरों में शरण ली थी. उस समय पाकिस्तान की तरफ से हो गोलाबारी में 170 घर बुरी तरह से नष्ट हो गए थे और 8 नागिरकों की मौत हो गई थी.

पीड़ितों को एंबुलेंस भी नहीं मिलती

हाल के दिनों में जो लगातार फायरिंग हुई है उसमें एक आठ महीने के बच्चे की मौत पाकिस्तानियों की गोली से हो गई थी, उस वक्त़ अगर वहां एक एंबुलेंस की सुविधा होती तो कई लोगों की जानें बचाई जा सकती थीं.

अरनिया के निवासी और समाजसेवी रोहित चौधरी याद करते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान की तरफ से की जाने वाली फायरिंग के पहले दिन घायलों को ट्रैक्टर पर लादकर अस्पताल ले जाया गया था. वे कहते हैं, ‘हमें इस समय सबसे ज्यादा जिस चीज़ की ज़रूरत है वो बुलेटप्रूफ एंबुलेंस है, ताकि लोगों को ऐसी आपात स्थिति में यहां से सुरक्षित निकाला जा सके. हमें एक ट्रॉमा सेंटर की भी ज़रूरत है, जहां कुछ स्पेशलिस्ट डॉक्टर मौजूद हों ताकि लोगों की जान बचाई जा सके.’

पाकिस्तानी गोलीबारी में घायल लोगों को तुरंत एंबुलेंस की सुविधा भी नहीं मिल पाती.

पाकिस्तानी गोलीबारी में घायल लोगों को तुरंत एंबुलेंस की सुविधा भी नहीं मिल पाती.

कई शिकायतों के बाद जम्मू कश्मीर के हेल्थ और मेडिकल एजुकेशन मिनिस्टर देवेंदर कुमार मनियार ने 25 मई को प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और स्थानीय प्रशासन को दिशा निर्देश जारी किए. उन्होंने प्रशासन से गांव खाली कराने के दौरान एसओपी यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग की प्रक्रिया का पालन करने का आदेश भी दिया जिसके तहत लोगों को गांव से हटाए जाने के दौरान बुलेट प्रूफ गाड़ियों में ही एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जाना चाहिए.

सीज़फायर उल्लंघन में बढ़त

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 2015 में एलओसी के नजदीक सीज़फायर उल्लंघन के 152 मामले सामने आए थे, जो साल 2016 में बढ़कर 228 हो गया और साल 2017 में इसकी संख्या 860 पहुंच गई थी. इसी साल फरवरी महीने तक सीज़फायर उल्लंघन के 432 मामले सामने आ चुके हैं. आईबी यानी अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर के नजदीक साल 2015 में सीज़फायर उल्लंघन के कुल 253 मामले हुए थे, जो साल 2016 में घटकर 221 और 2017 में 111 पर आ गए थे. लेकिन इस साल के फरवरी महीने तक आधिकारिक तौर पर 201 मामले दर्ज किए गए हैं.

साल 2015 से हो रही पाकिस्तान गोलाबारी में एलओसी के आसपास रहने वाले कम से कम 300 भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है.

राज्य सरकार क्या कर रही है?

जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती, जिन्होंने हाल ही में हालात का जायज़ा लेने के लिए इन शरणार्थी शिविरों का दौरा किया था, उन्होंने पाकिस्तान से अपील की है रमज़ान के पाक़ महीने के दौरान वो लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करें. उन्होंने पाकिस्तान को याद दिलाया कि कैसे भारत ने रमज़ान के महीने के दौरान एकतरफ़ा सीज़फायर की घोषणा की है. ऐसा रमज़ान को ध्यान में रखकर जवाबी कार्यवाही के संदर्भ में किया गया है. महबूबा मुफ़्ती ने ये भी कहा कि आरएसपुरा के लोकल अस्पताल को जल्द ही और सुविधा संपन्न किया जाएगा. जिसमें और औज़ार और कर्मचारी शामिल होंगे. इसके अलावा जानवरों के इलाज के लिए बने स्थानीय विभाग में भी और सुविधा दी जाएगी.

राज्य सरकार रजौरी और पूंछ जिले में एलओसी के नज़दीक बंकर भी बनाने में लगी है जहां सीज़फायर उल्लंघन के दौरान होनेवाली गोलाबारी से बचने के लिए स्थानीय लोग शरण ले सकें. रजौरी के डिप्टी कमिश्नर शाहिद इक़बार चौधरी के बताते हैं कि अब तक कुल 102 ऐसे बंकरों का निर्माण कर लिया गया है जिसमें पूरा परिवार छुप सकता है, ये बंकर कई गांवों में बनाए गए हैं. हरेक बंकर की क्षमता सीमापार से होनेवाली गोलाबारी के दौरान एक बार में लंबी अवधि के लिए 10 लोगों और छोटी अवधि के लिए 12-16 लोगों को सुरक्षा देने की है.

लंदन में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मनु खजुरिया, जो जम्मू से हैं, कहते हैं कि इस समय सबसे ज़रूरी ये है कि यहां सीज़फायर उल्लंघन के पीड़ितों को दी जाने वाली क्रिटिकल केयर की सुविधा का निरीक्षण कर उसे ठीक किया जाए. सिंह ने लंदन स्थित पाकिस्तानी एंबैसी के सामने भारतीयों के एक समूह की ओर से आयोजित विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया था. वे मांग करते हैं कि अधिकारियों को उन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की भी ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए जिनके स्कूल पाकिस्तान की तरफ होने वाली गोला और बमबारी के दौरान बंद कर दिए गए हैं.

सारी तस्वीरें: जमशेद मलिक

(लेखक लुधियाना बेस्ड फ्रीलांस जर्नलिस्ट और भारत भर में फैले ग्रासरूट रिपोर्टरों के नेटवर्क 101Reporters.com के सदस्य हैं)

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