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बरेली के डीएम ने फेसबुक पर जो लिखा वो करोड़ों लोगों के सवाल हो सकते हैं

डीएम साहब ने फिलहाल इस पोस्ट के साथ इस विवाद को यहीं खत्म कर देने का फैसला किया है. लेकिन उनके उठाए सवाल खत्म नहीं होने वाले हैं

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jan 30, 2018 09:04 PM IST

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बरेली के डीएम ने फेसबुक पर जो लिखा वो करोड़ों लोगों के सवाल हो सकते हैं

22 जनवरी 2018 को बरेली के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने फेसबुक पर पोस्ट डाली. लिखा- ‘हमारे गांव के पंधारीलाल पूछते थे- अगर आदमी बंदर से बना है तो ये बंदरवे आदमी क्यों नहीं हो जाते? आज वे खुश होंगे उन्हें एक कैबिनेट मंत्री का समर्थन जो मिल गया है. और पंधारीलाल भी तो कैबिनेट मंत्री हो सकते थे.’

उनके इस पोस्ट से साफ है कि वो केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह के डार्विन वाले बयान पर तंज कस रहे थे. सत्यपाल सिंह ने डार्विन के विकासवादी सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप से गलत बताते हुए इसे स्कूल और कॉलेजों के पाठ्यक्रम से निकाले जाने की वकालत की थी. इस पर उनकी भरपूर खिल्ली भी उड़ी थी. सो डीएम साहब ने भी अपनी ओर से थोड़ी कसर निकाल ली.

इसके पहले 17 जनवरी को डीएम साहब ने पोस्ट डाली थी. लिखा था- ‘ VHP की राम मंदिर आंदोलन के साथ ही समाज के लिए एक रचनात्मक भूमिका भी हो सकती थी. सामाजिक एकीकरण के अभियान के अभाव में VHP का विस्तार नहीं हो सका. Hope.. now they have a socially oriented pragmatic leadership.’

इसी तरह 13 जनवरी को डीएम साहब ने फेसबुक पर लिखा था- ‘जब कोई 'चायवाला' कोई 'नीच ' राष्ट्र नियंता बनेगा तो भयभीत हो रहे स्थापित स्वार्थी प्रभुत्व वर्गों में हादसे तो होंगे ही! (यह पोस्ट PM के विरोधियों को उनकी औकात बताने के लिए है न कि PM के असम्मान के लिए. यह मैं स्पष्ट करना चाहता हूं.)’

25 दिसंबर 2017 को डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने देश की जातिवादी राजनीति पर तंज कसते हुए लिखा था- ‘जाति का उपयोग दामाद खोजने में ही किया जाए, राजनीतिक विकल्प के लिए नहीं.’

बरेली के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह की फेसबुक पोस्ट का इतना पोस्टमॉर्टम इसलिए क्योंकि उनके एक ऐसे ही पोस्ट ने हलचल मचा रखी है. उनके पुराने पोस्ट को पढ़कर लगता है कि डीएम साहब रोजमर्रा के राजनीतिक मसलों पर कभी तंज भरा तो कभी चुभने वाला तीखा और मारक पोस्ट लिखते रहे हैं. कासगंज हिंसा पर लिखा उनका पोस्ट ऐसे ही फेसबुक पोस्ट की कड़ी थी. लेकिन हिंदू-मुस्लिम का मसला आते ही कासंगज पर लिखा उनका पोस्ट विवादित हो गया.

सवाल है कि विवादित क्यों? अगर डीएम साहब ने सांप्रदायिक हिंसा पर अपने प्रशासनिक अनुभव के मद्देनजर कुछ सच्ची बातें कह दीं तो ये विवादित पोस्ट कैसे हो गया. यहां तक कि कुछ लोग इसे डीएम साहब का भड़काऊ पोस्ट बता रहे हैं. क्या आए दिन हो रहे दंगों के पीछे की कुछ वाजिब वजहों को सामने ला देना भड़काने वाला बयान माना जाएगा? डीएम साहब ने बाकायदा उदाहरण तक दिया था कि वो ऐसा क्यों लिख रहे हैं और कैसे उन्हें खुद ऐसे हालात से रूबरू होना पड़ा है.

कासगंज की घटना से आहत बरेली के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने कुछ वाजिब सवाल उठाए थे. उन्होंने फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि आखिर मुस्लिम मोहल्लों में जबरदस्ती जुलूस ले जाने और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने की जरूरत ही क्या है.

राघवेंद्र विक्रम सिंह ने अपने पोस्ट में लिखा, 'अजीब रिवाज बन गया है. मुस्लिम मोहल्लों में जबरदस्ती जुलूस ले जाओ और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाओ. क्यों भाई, वो पाकिस्तानी हैं क्या? बरेली के खैलम में यही हुआ था. फिर पथराव हुआ, मुकदमे लिखे गए.'

कोई बताएगा कि इस पोस्ट में विवादित क्या है. ऐसे पोस्ट को भड़काऊ कैसे बताया जा सकता है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में घटना के चश्मदीदों ने खुद बताया था कि कैसे मामले ने सांप्रदायिक हिंसा का रंग लिया था. गणतंत्र दिवस के दिन कुछ मोटरसाइकिल पर सवार कुछ युवा बिना किसी परमिशन के तिरंगा यात्रा निकाल रहे थे.

कासगंज के मुस्लिम बहुल बद्दूनगर में मुसलमानों ने खुद तिरंगा फहराने का आयोजन कर रखा था. सड़क के बीचों-बीच कुर्सियां लगाकर तिरंगा फहराने का जुगाड़ किया गया था. स्थानीय लोगों ने मोटरबाइक पर सवार लोगों से ध्वजारोहण का कार्यक्रम खत्म हो जाने के बाद उनकी तिरंगा यात्रा को आगे बढ़ाने की गुजारिश की थी. उन्होंने यात्रा में शामिल युवकों से भी उनके आयोजन में शामिल होने को कहा था. लेकिन तिरंगा यात्रा में शामिल युवा कुर्सियां हटाकर यात्रा को आगे बढ़ाने पर अड़े रहे.

इस बीच नारेबाजी होने लगी. वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे तो लगे ही. किसी ने नारा लगाया- हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान, .... जाओ पाकिस्तान. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी कहा गया है कि उसके बाद पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगे. और इसी के बाद मामला बिगड़ गया. पहले पत्थर चले फिर गोली चली.

इस पूरी घटना पर बरेली के डीएम का पोस्ट कहां से विवादित है. क्या राष्ट्रवादिता तभी साबित होती है जब तिरंगा यात्रा जैसे जुलूस किसी मुस्लिम बहुल इलाके से ही गुजरें? क्या अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान और .... जाओ पाकिस्तान जैसे नारे लगाना जरूरी है? क्या हिंदुस्तान को जिंदाबाद रखने के लिए पाकिस्तान का मुर्दाबाद करना जरूरी है? क्या हमारे मुल्क के मुसलमानों को हर ऐसे वाकये पर भेजो पाकिस्तान कहकर जलील करना वाजिब है? यही सवाल बरेली के डीएम ने भी उठाए थे. तो इस पर इतनी आपत्ति क्यों?

डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने इसके बाद के पोस्ट में ये भी कहा था कि दुश्मन देश का मुर्दाबाद ही करना है तो पाकिस्तान क्यों. चीन क्यों नहीं? उन्होंने अपने एक और फेसबुक पोस्ट में पूछा कि चीन के खिलाफ नारेबाजी क्यों नहीं की जाती है, जो हमारा पाकिस्तान से भी बड़ा दुश्मन है. उन्होंने लिखा, 'चीन तो बड़ा दुश्मन है, तिरंगा लेकर चीन मुर्दाबाद क्यों नहीं?'

राघवेंद्र विक्रम सिंह ने कहा कि कासगंज में राष्ट्रभक्ति के नाम पर हुई इस घटना से आहत और गुस्सा हैं. उनके पोस्ट से भी इसी की झलक दिखती है. लेकिन डीएम साहब की पोस्ट जब सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी तो सवाल उन्हीं से पूछे जाने लगे. किसी ने कहा कि डीएम साहब अपने प्रशासनिक अधिकारों के दायरे से बाहर जा रहे हैं. किसी ने आरोप लगाया की डीएम साहब एक खास विचारधारा से प्रेरित हैं इसलिए ऐसी बातें बोल रहे हैं. बरेली के बिथरी चैनपुर से विधायक राजेश मिश्रा ने कहा कि डीएम विक्रम सिंह की शिकायत वो सीएम योगी और पीएम मोदी से करेंगे.

इतना बवाल मचा कि डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह को अपनी सभी पोस्ट डिलीट करनी पड़ी. उन्होंने पुराने पोस्ट डिलीट कर लिखा कि ‘मेरा आशय किसी मजहब या भावनाओं को आहत करना नहीं था. ऐसी घटनाओं से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है. प्रशासन और पुलिस के साथ ही स्थानीय लोगों के लिए भी दिक्कतें खड़ी होती हैं. ऐसी घटनाओं से अनावश्यक अवरोध होते हैं. आपसी सौहार्द से ही शांति और तरक्की हासिल होती है.’

कट्टर हिंदूवादी राजनीतिक ताकतों के आगे सांप्रदायिक हिंसा पर डीएम साहब को अपनी संवेदनशील सोच से भी पीछे हटना पड़ा. इसके बाद भी विवाद को खत्म न होता देखकर डीएम साहब को फिर से सफाई के साथ सामने आना पड़ा. उन्होंने फेसबुक पर फिर एक पोस्ट लिखी.

इसमें उन्होंने लिखा, ‘हमारी पोस्ट बरेली में कांवर यात्रा के दौरान आई कानून-व्यवस्था की समस्या से संबंधित थी. मैं चाहता था कि इस पर सार्थक बहस हो लेकिन इसने गलत दिशा ले ली. ये बहुत दुखद है. हम आपस में चर्चा इसलिए करते हैं कि हम बेहतर हो सकें. ऐसा लगता है कि इससे बहुत से लोगों को आपत्ति भी है और तकलीफ भी. हमारी मंशा किसी को कष्ट देने की नहीं थी. सांप्रदायिक माहौल सुधारना हमलोगों की प्रशासनिक एवं नैतिक ज़िम्मेदारी है. मुस्लिम हमारे भाई हैं. हमारे ही रक्त. DNA एक ही है हमारा. हमें उन्हें वापस लाना नहीं आया. इस पर फिर कभी... एकीकरण व समरसता के भाव को ज़ितनी जल्दी हम समझें उतना बेहतर है. देश के लिए, हमारे प्रदेश, हमारे जनपद के लिए. पाकिस्तान शत्रु है. इसमें कोई संदेह नहीं. मुस्लिम हमारे हैं. इसमें भी कोई संदेह नही. मैं चाहता हूं कि यह विवाद खत्म हो. अगर किसी को मेरी वजह से दुख पहुंचा हो तो मैं माफी मांगता हूं.”

डीएम साहब ने फिलहाल इस पोस्ट के साथ इस विवाद को यहीं खत्म कर देने का फैसला किया है. लेकिन उनके उठाए सवाल खत्म नहीं होने वाले हैं. इन सवालों की संवेदनशीलता हम सब समझते हैं. बस इस दौर ने कुछ लोगों की आंखों पर पट्टी बांध रखी है. लेकिन ये सवाल तो उठेंगे ही इस जहरीले और नकली राष्ट्रवादिता से आजिज आकर कल फिर कोई सवाल उठाएगा.

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