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क्या हम इस बार गणतंत्र दिवस करणी सेना के विध्वंस के बीच मनाएंगे?

राजस्थान में भंसाली पर हमले से शुरू हुई विरोध की 'चिंगारी' आखिरकार आग में तब्दील हो गई और सरकारें बैठकर सिर्फ तमाशा देखती रहीं

Puneet Saini Puneet Saini Updated On: Jan 26, 2018 08:28 AM IST

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क्या हम इस बार गणतंत्र दिवस करणी सेना के विध्वंस के बीच मनाएंगे?

हम इस बार 69वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. ऐसे में एक बार फिर हमें देश के बारे में मंथन करने की जरूरत है, एक फिर देश के उस संविधान पर चर्चा करने की जरूरत है, जिसका झंडा हम देश-विदेश में लहराते हैं. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र उस मोड़ पर पहुंच चुका है, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या एक फिल्म के विरोध में स्कूल के बच्चों से भरी हुई बस पर पत्थर हमला करना ठीक था?

यह हर भारतीय के लिए गौरव की बात है कि हमारे देश को संवैधानिक युग में प्रवेश किए 69 साल पूरे हो गए हैं, लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी भी घटित हुई हैं जिसने पल-पल पर हमें शर्मिंदा किया है. इसमें सबसे ताजा घटना है- फिल्म पद्मावत का विरोध. करणी सेना के विरोध की शुरुआत डायरेक्टर संजय लीला भंसाली पर हमले से होती है. राजस्थान के जयपुर के जयगढ़ किले में चल रही संजय लीला भंसाली की पीरियड ड्रामा फिल्म 'पद्मावत' की शूटिंग के दौरान राजपूत करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने जमकर हंगामा मचाया था. हाथा-पाई के दौरान प्रदर्शनकारियों ने भंसाली को थप्पड़ भी मारा था. यह पहला मौका था जब करणी सेना की चर्चा देश में शुरू हुई.

यह विरोध उस चरम पर पहुंच गया कि फिल्म की रिलीज ही टाल दी गई. चुनावी मौसम में राजनीतिक पार्टियां इसमें कूदीं और चुनाव खत्म होते ही सभी ने इससे दूरी भी बना ली. इसके बाद फैसला हुआ कि फिल्म ‘पद्मावती’ का नाम बदलकर ‘पद्मावत’ कर दिया जाएगा और फिल्म रिलीज की जाएगी. राजपूत करणी सेना ने एक बार फिर इसका विरोध किया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आखिरकार फिल्म 25 जनवरी को रिलीज हो गई, लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था.

फिल्म पद्मावत में अभिनेता रणवीर सिंह

फिल्म पद्मावत में अभिनेता रणवीर सिंह

राजपूतों की आन-बान शान की बात करने वाली करणी सेना विरोध में इतनी अंधी हो गई कि उसने बच्चों को भी अपना निशाना बनाने से नहीं छोड़ा. देश में अलग-अलग राज्यों से तोड़फोड़ की खबरें आने लगीं. गाड़ियां जलने के विजुअल आने लगे, लेकिन इससे राज्य की सरकारों के कानों पर जूं भी नहीं रेंगी. हद तो तब हो गई जब करणी सेना चीफ लोकेंद्र सिंह कलवी ने टीवी पर आकर कह- हो तो सब गलत रहा है, लेकिन इसमें हम क्या कर सकते हैं?

अब सोचिए इस पूरे ड्रामे का अंत वहीं पर हुआ जहां इसका होना तय था. तो इस पूरे नुकसान की भरपाई कैसे होगी. जहां चारो तरफ सिर्फ नफरत नफरत ही फैली. हमारे संविधान निर्माताओं ने शायद ही ऐसे देश कल्पना की होगी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देनी पड़ी. इस पर प्रतिबंध की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना आर्टिकल 21 का उल्लंघन. बावजूद इन सबके देश के पांच राज्य इस फिल्म को रिलीज करने का हौसला नहीं जुटा पाए. चार बीजेपी-शासित राज्यों में पद्मावत को रिलीज नहीं किया गया. इससे साफ होता है उन्होंने अपने संवैधानिक और सामाजिक जिम्मेदारी का सम्मान करने के बजाए गुंडों के एक समूह के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

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