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क्या दूसरों को तकलीफ देकर भोले बाबा को खुश कर पाते हैं कांवड़िए

हिंदू धर्म में बेहद श्रद्धा से देखी जाने वाली इस यात्रा में कई विसंगतियां शामिल हो गई हैं

Updated On: Jul 21, 2017 08:17 AM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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क्या दूसरों को तकलीफ देकर भोले बाबा को खुश कर पाते हैं कांवड़िए

बात पिछले साल की है. यूपी के बरेली जिले में कांवड़ यात्रा को पुलिस ने एहतियातन रोक दिया था. फिर क्या था? भोले बाबा के भक्तों ने जमकर तांडव किया. लाठियां चलीं. गोलियां चलीं. कई वाहन फूंके गए. पूरा इलाका अस्त-व्यस्त हो गया. मतलब फुलऑन उत्पात हुआ.

अब दूसरी घटना सुनिए. ये भी पिछले साल की ही है. राज्य भी यूपी ही था बस जिला अलग था. जिला था मुरादाबाद. राज्य सरकार ने यात्रा में डीजे पर प्रतिबंध की बात उठाई ही थी कि कांवड़िए बिल्कुल भड़क उठे. धरना-प्रदर्शन हुए. जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा. ये भी धमकी दी गई कि अगर सरकार ने डीजे रोकने की कोशिश की तो वो धर्म परिवर्तन कर लेंगे.

बाकायदा कांवड़ियों ने तब यूपी के कद्दावर मंत्री आजम खान को धर्म परिवर्तित कराने के लिए आमंत्रित भी किया था. अब कांवड़ियों की ये हरकत देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि उनकी सच्ची श्रद्धा भगवान शिव के जलाभिषेक में है या फिर कान फोड़ू डीजे बजाकर उस पर डांस करने में.

ये दो घटनाएं सिर्फ बानगी भर हैं बाकी गूगल पर कांवड़ यात्रा लिखकर एंटर मारिए तो घटनाओं का ढेर है. जिस कांवड़ यात्रा को हिंदू धर्म में बेहद श्रद्धा की निगाह से देखा जाता है उसमें अब उत्पात, गुंडागर्दी, नशाखोरी जैसे तत्व बिल्कुल घुल-मिल गए हैं. सबसे दुखद पहलू ये भी है कि कांवड़ यात्रा का यही पक्ष इस समय सबसे ज्यादा प्रभावी है.

कांवड़ यात्रियों को लेकर लोगों के बीच श्रद्धा का भाव कम और गुस्सा ज्यादा होता है. दिल्ली में स्थिति और भी ज्यादा भयावह है. दिल्ली-एनसीआर के इलाकों में न जाने कितने ऐसे रास्ते हैं जिन्हें रोक दिया गया है. सड़कों पर घंटों जाम की स्थिति बनी रहती है.

अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में दफ्तरों से थक-हार कर लौटते लोग न चाहते हुए सड़क पर बज रहे फुल वॉल्यूम भक्ति गाने सुनने के लिए मजबूर हैं. मतलब घंटों जाम में फंसे रहिए और बगल में कांवड़ियों के लिए बनाए गए रास्तों पर ट्रिपलिंग करते हुए बिना हेलमेट 80-90 की रफ्तार पर फर्राटा भरते कांवड़ यात्रियों को देखिए.

बात सिर्फ आम लोगों तक सीमित नहीं है. इन्हीं जाम वाली सड़कों पर मरणासन्न न जाने कितने बीमार लोग एंबुलेंस में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे होते हैं. लेकिन एंबुलेंस के ड्राइवर के पास भी असहाय खड़े रहने के सिवा और कोई रास्ता नहीं होता.

हालांकि आज तक ऐसा कोई आंकड़ा नहीं निकाला गया कि इन परिस्थितियों में फंसकर कितने लोग दम तोड़ देते हैं. लेकिन अगर आंकड़ा निकाला गया तो स्थिति बेहद गंभीर होगी.

कांवड़ियों में इस साल एक और नया चलन सामने आया है. इस बार कांवड़ यात्राओं में बड़े-बड़े तिरंगे झंडे भी दिखाई दे रहे हैं. ये प्रतीकात्मक तौर पर कांवड़ यात्राओं को राष्ट्रवाद से भी जोड़ने की कवायद है. ट्रकों में सामान भरे कांवड़िए आम लोगों के लिए जो परेशानी पहले से खड़ी कर रहे थे उसमें उन्होंने राष्ट्रध्वज भी जोड़ दिया है. कांवड़ियों में इस नए चलन पर पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी की ये पोस्ट पढ़िए...

इस साल की कांवड़ यात्रा के पहले यूपी में कई जगहों से ये भी खबर आई कि कांवड़ियों के रुकने की जगहों पर अबाध बिजली व्यवस्था की जाएगी. इसके लिए शहर में बाकी जगहों पर पॉवर कट होगा. अब जो लोग कांवड़ यात्रा पर नहीं थे उनके लिए तो ये परेशानी का सबब ही था.

हर बार कांवड़ यात्रा लोगों के लिए तमाम तरह की मुश्किलें लाती है. हर बार लोग इसे लेकर गुस्से में चर्चाएं करते हैं लेकिन साल भर में कुछ दिनों की परेशानी होने की वजह से बातें आई-गई हो जाती हैं. अब फिर कांवड़ यात्रा चल रही है. लोग परेशान हैं. इसकी कम उम्मीद है कि कांवड़िए इसके बारे में कभी सोचते भी होंगे लेकिन कम से कम सरकारों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यात्रा के तले कोई गंभीर रूप से बीमार आदमी अपना जीवन न खो दे. या फिर आम ऑफिस गोइंग लोगों के मिनटों का सफर घंटों में तब्दील न हो. कांवड़ यात्रा के धार्मिक महत्व को समझते हुए लोगों की तकलीफों को बारे में भी सोचना चाहिए.

नि:संदेह कांवड़ यात्रा में सच्चे श्रद्धालुओं को बहुत तकलीफों का सामना करना पड़ता है लेकिन उन्हें ये भी ध्यान रखना चाहिए कि उतनी तकलीफ वो उन्हें न पहुंचाएं जो इस यात्रा का हिस्सा नहीं हैं.

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