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भोले की भक्ति पर भारी पड़ती कांवड़ियों की गुंडागर्दी, महादेव नहीं करेंगे माफ

आक्रोषित होने पर कांवड़ियों को कानून के हाथ तोड़ने का लायसेंस किसने दिया है?

Updated On: Aug 08, 2018 03:17 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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भोले की भक्ति पर भारी पड़ती कांवड़ियों की गुंडागर्दी, महादेव नहीं करेंगे माफ

देश की राजधानी दिल्ली की एक तस्वीर देशभर के कांवड़-यात्रियों को शर्मसार कर सकती है. दिल्ली के मोतीनगर में एक कार कांवड़-यात्री को हल्का सा टच कर गई. बस इतनी सी बात पर कार की शामत ही आ गई. चलती सड़क पर भीड़-भाड़ के बीच कांवड़ियों के लाठी-डंडे कार पर टूट पड़े. किसी फिल्म के सीन की तरह कांवड़ियों के करारे वार से कार के शीशे फूट पड़े.

जब चकनाचूर कार को देखने से भी मन नहीं भरा तो कांवड़ यात्रियों ने उसे जमीन पर ठीक वैसे पलट डाला जैसे किसी नेशनल पार्क में कोई हिंसक हाथी सैर करने आए सैलानियों के वाहनों को तोड़फोड़ के बाद पलट देता है. बहरहाल, ये सारा तमाशा सरेराह सरेआम हुआ और पुलिस वाले भी इसे होता देख रहे थे लेकिन रोकने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे.

आखिर क्यों आया कांवड़ियों को इतना गुस्सा?

बताया जा रहा है कि कार को एक लड़की चला रही थी. जबकि तोड़फोड़ करने वाले कांवड़िए हरिद्वार से जल लेकर आ रहे थे. सवाल उठता है कि कंधे पर शिवलिंग के जलाभिषेके के लिए जल उठा कर ले जाने वाले कांवड़ियों में आखिर इतना उबाल क्यों आ रहा है? क्या 'भोले के प्रसाद' की तरह मिलने वाले 'विशेषाधिकार' को कांवड़ यात्री कुछ भी करने की 'आजादी' मान रहे हैं? क्या उन्हें सड़क पर कुछ भी करने का सरकारी 'अभयदान' मिल गया है?  आक्रोषित होने पर कांवड़ियों को 'कानून के हाथ' तोड़ने का लायसेंस किसने दिया है?

श्रद्धालु कोई भी हों लेकिन जब वो सड़क पर चलते हैं तो उनको लेकर श्रद्धा और सुरक्षा का भाव सभी समुदायों के लोगों के मन में होता है. कोई नहीं चाहता है कि किसी धर्म या समुदाय से जुड़े श्रद्धालुओं की भावना आहत की जाएं या फिर चलती सड़क पर उनके साथ किसी तरह की कोई दुर्घटना घटे. देश भर में धार्मिक जुलूस के वक्त सरकारें और प्रशासन एहतियातन सुरक्षा बरतते हैं.

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हर साल यूपी और बिहार में खासतौर पर कांवड़ यात्रियों की सुरक्षा, विश्राम-स्थल और यात्रा के मार्गों को लेकर बेहद सावधानियां बरती जाती हैं. यहां तक कि कांवड़ यात्रियों की सुरक्षा को लेकर खुफिया रिपोर्ट तक मंगाई जाती हैं. सुरक्षा और सावधानियों की वजह से ट्रैफिक रूट का डायवर्जन होता है.

सावन में कई रास्ते कुछ दिनों तक सिर्फ कांवड़-यात्रियों के नाम ही कर दिए जाते हैं जिन पर दूसरों के चलने की मनाही होती है. इसकी बड़ी वजह ये भी होती है कि पैदल चल रहे कांवड़ यात्रियों के साथ सड़क पर कोई दुर्घटना न घट जाए. हर साल ही कांवड़ यात्रियों को लेकर सरकार की तरफ से इंतजामों में बढ़ोतरी की जा रही है.

कांवड़ियों की सुविधाएं उनका रक्षा कवच बन गई है

लेकिन शिवभक्तों को मिलने वाली विशेष सुविधाएं मानों उनके लिए रक्षा-कवच से ज्यादा गुंडागर्दी का लायसेंस बनती जा रही हैं. वो खुद को 'विशेषाधिकार प्राप्त' और 'कुछ भी कर जाने वाले' और कर सकने वाले लड़ाका मान बैठते हैं. वो ये भूल जाते हैं कि वो भी इसी समाज का हिस्सा हैं. बस कुछ दिनों की भक्ति और भगवा रंग का फर्क है. जल चढ़ाने के बाद उन्हें भी इसी समाज में भीड़ के बीच अपने रोजमर्रा के कामों में जुटना है. इसके बावजूद कांवड़ियों का हुजूम हंगामा बरपा कर गुजरता हुआ दिखाई देता है.

कई जगहों से कांवड़ियों के उत्पात की खबरें आती हैं. डीजे की धुन पर कांवड़ियों की धौंस और धमक भी सुनाई देती है. भोले की फौज के नाम पर ये भगवा सेना की तरह आगे बढ़ते हैं. कंधे पर जल तो कुछ लोगों को हाथों में हॉकी स्टिक भी होती हैं. भक्ति में शक्ति प्रदर्शन का औचित्य क्या है? भक्ति खास आराध्य को लेकर है तो ये शक्ति प्रदर्शन हर उस आम आदमी के लिए है जो इनके सामने से और बगल से गुजरता है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

अब लोगों को भी सताने लगा है डर

कांवडियों के हुजूम के बगल से गुजरने में आम लोगों के मन में अब भय व्याप्त होने लगा है. एक डर सताता है कि कहीं किसी कांवड़ यात्री की नजर टेढ़ी न हो जाए क्योंकि उसके बाद फिर पुलिस भी कुछ मदद नहीं करेगी. दिल्ली में भी तो यही हुआ. पुलिस तमाशबीन बनी रही. पुलिस की बेबसी का आलम ये था कि उसकी मौजूदगी में कांवड़ यात्री कार को चकनाचूर करते रहे. ऐसे में जब पुलिस इन उत्पातियों के नाम पर बेबस है तो फिर आम आदमी की हैसियत ही क्या है.

इन कांवड़ यात्रियों के उत्पात की ही वजह से अगर हिंदुओं के ही भीतर गुस्सा भरने लगे तो फिर जरूरी है कि सरकारें इन पर गंभीरता से विचार करें. कांवड़ियों की गुंडागर्दी से शिवभक्ति को कभी जोड़ा नहीं जा सकता है और इसके लिए महादेव माफ भी नहीं करेंगे.

भोले की फौज को मौज करने का दैवीय वरदान जरूर मिला है लेकिन कानून को ज़मीदोज़ करने का अभयदान किसी ने नहीं दिया है. कांवड़ यात्री जल चढ़ाते वक्त ये जरूर याद करें कि पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने किसी कमजोर, निरीह, बेकसूर का मन तो आहत नहीं किया क्योंकि किसी का दिल दुखा कर खुद की आस्था को मजबूत कभी नहीं किया जा सकता है. भोले के दर पर सबके कर्म जल की तरह साफ साफ दिखाई दे जाते हैं.

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