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कनीज़ा की मौत: कोई नहीं सुनता कश्मीर के मासूमों का दर्द

कश्मीर घाटी में ‘आवारा’ गोलियां एक के बाद एक जानें ले रही हैं और यह दौर जारी है

Sameer Yasir Updated On: Mar 20, 2017 08:52 AM IST

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कनीज़ा की मौत: कोई नहीं सुनता कश्मीर के मासूमों का दर्द

बुधवार की शाम जैसे ही छह साल की बच्ची की ‘आवारा’ गोली लगने से मौत की खबर फैली, मैंने डर के साथ अपने कंप्यूटर पर सेव की गई उसकी तस्वीर पर क्लिक किया. बेचैनी की हालत में मैं कनीजा की आधी खुली आंखों को देखते हुए अपने कमरे की खिड़की को बार-बार खोल और बंद कर रहा था. मैं अपनी पांच साल की भतीजी के बारे में सोच रहा था. कनीज़ा की तरह उसे भी खिड़की के पास सोना पसंद है. कनीज़ा अपने भाइयों-बहनों के साथ खिड़की के पास सो रही थी, तभी उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा इलाके में लाइन ऑफ कंट्रोल के पास मौजूद गांव में फायरिंग शुरू हो गई.

‘आवारा’ गोलियों से आजकल कश्मीर में मरने वाले बच्चों की संख्या अचानक बढ़ गई है. ये बुलेट्स खलनायक बन रही हैं, ये लोगों को मार रही हैं, इसके बावजूद इनकी कोई पहचान नहीं है. हम कश्मीरी- पूरी दुनिया के बाकी लोगों की तरह से जिनके बच्चे विवादग्रस्त इलाकों में जब-तब मार दिए जाते हैं. यह नहीं जानते हैं कि इसे कैसे रोका जा सकता है और हमें क्या करना चाहिए कि हम इसे रोक सकें.

Photo. wikicommons

भारत का जम्मू-कश्मीर राज्य पिछले लगभग तीन दशक से आतंकवाद की आग में झुलस रहा है

मरते देखना असहनीय है

हम इसमें पूरी तरह से असहाय हैं. इस अंतहीन सुरंग में कहीं रोशनी की किरण नजर नहीं आती. अपने बच्चे बड़े करना और उन्हें इन आवारा गोलियों से मरते देखना असहनीय है. ये गोलियां कहीं से भी आती हैं और हमारे जिगर के टुकड़ों की छाती भेद जाती हैं.

सामान्य जगहों पर कनीज़ा और मेरी भतीजी ईशा जैसे बच्चे आइसक्रीम खाने और बाहर घूमने की जिद करते हैं लेकिन हमारे यहां बच्चे घरों के अंदर छिपकर रहने के आदि हैं. वह ऑटोमेटिक राइफलें लिए सैनिकों को देखते हैं. ये बच्चे विवादग्रस्त इलाकों के बच्चों की तरह शहीदों, लोगों को दफन करने, गोलियों, बंदूकों और आंसू गैस की कहानियां सुनते और देखते हैं.

हमारे बच्चे रैपुनजेल की परियों की कहानी नहीं सुनते, बल्कि साहस, असहयोग और संघर्ष की कहानियां सुनकर बड़े होते हैं. ऐसे में इनका जीवन और कल्पना विवादों के भंवर में घूमता रहता है. दुर्भाग्य से यह सब हमारी जिंदगियों का हिस्सा है.

मैं यह नहीं सोचना चाहता कि किसकी गोली ने कनीजा को शिकार बनाया. जो चीज अहमियत रखती है वह यह है कि एक निर्दोष बच्ची, जो किसी का भविष्य थी, मारी गई है. कनीज़ा के निर्जीव और शांत चेहरे को देखकर आप चाहे जो भी हों आपका दिल रो उठेगा.

India Kashmir Protests

श्रीनगर के लाल चौक पर कड़ी चौकसी करते हुए सुरक्षाबल  (फोटो: रॉयटर्स)

हर मौत के बाद जैसा होता है, इस बार भी हो रहा है. मृत बच्चे की तस्वीर वायरल हो गई है. एक सिंबल के तौर पर इसे हर राजनीतिक बहस और विचारधारागत बहसों में इस्तेमाल किया जाएगा.

हर बार जब भी कोई विरोध-प्रदर्शन होगा या जब भी नई दिल्ली लोगों के दिल जीतने का कोई असफल प्रोजेक्ट शुरू करेगी, इस तस्वीर का इस्तेमाल कश्मीर के लोगों पर की जा रही ज्यादतियों के सबूत के तौर पर किया जाएगा. जब भी कोई कश्मीरी किसी ऑल इंडिया एग्जाम को टॉप करेगा तब इस तस्वीर का इस्तेमाल उसके मुकाबले में किया जाएगा. इस तस्वीर को राज्य के किसी स्पोर्टस्टार के समांतर पोस्ट किया जाएगा.

यह तस्वीर हमें याद दिलाएगी कि हर दिन हमारा संघर्ष खुद को जिंदा रखने के लिए है. यह हमें याद दिलाएगी कि हमारे बच्चों को पृथकतावाद और राष्ट्रवाद की जंग के बीच कुछ भी हो सकता है.

हमें क्यों मारा जा रहा है?

मेरी भतीजी की तरह जिसने यह तस्वीर मेरे फोन में देखी, हमारे बच्चे निर्दोष मगर राजनीति से भरे सवाल पूछेंगेः हमें क्यों मारा जा रहा है? मैं पूरा जोर देकर कह रहा हूं कि एक मां का दर्द कोई नहीं समझ सकता है जिसका बच्चा घाटी में चल रहे कभी न खत्म होने वाले विवाद में फंसा हुआ है. न पैसा, न नौकरी या सुविधा या कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस इनके दिल की फांस को कभी निकाल पाएगी.

इनके जख्म खुले हुए हैं जिनसे बार-बार खून बहने लगता है. ये कड़वाहट, घृणा और लोगों के बीच एक बिना भरी जा सकने वाली खाई पैदा कर रहे हैं, जो कि भले ही बागी है, लेकिन शांतिप्रिय है.

जो चीज हमें सबसे ज्यादा परेशान करती है वह है मीडिया की चुप्पी. खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किसी सैनिक के मरने पर जितनी सुर्खियां बनाता है, उतना वह किसी कश्मीरी के मरने पर नहीं आगे आता.

गुरुवार की रात को मैं न्यूज चैनलों को बदल रहा था ताकि यह देख सकूं कि कश्मीर के इस फूल के मुरझाने पर किस चैनल पर बहस चल रही है. दुर्भाग्य से ऐसा कोई भी चैनल नहीं मिला.

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जम्मू-कश्मीर के नेता वहां की आम जनता में भरोसा पैदा कर पाने में नाकाम रहे हैं

शायद कनीज़ा की मौत किसी टॉक शो का हिस्सा बनने लायक अहमियत नहीं रखती है क्योंकि वह कोई ऐसी सैनिक नहीं है जिसके सिर पर तिरंगा बंधा हो. भारतीय समाज में छिछली सोच और आपराधिक चुप्पी की वजह से कनीज़ा जैसे मासूम बच्चों की मौत का कहीं कोई जिक्र नहीं होता. टेलीविजन मीडिया शोरगुल से भरा हुआ है, लेकिन वह भी कोई मददगार साबित नहीं होता. ये एक ऐसी खाई पैदा कर रहे हैं जो कि दशकों में भी शायद भरी न जा सके.

चीजों को कमतर दिखाने की कोशिश

कश्मीर जैसे विवादग्रस्त इलाकों में सुरक्षा बल असीमित ताकतों का आनंद उठाते हैं. ये ऐसी दुखद घटनाओं के लिए ‘छिटपुट घटनाएं’ शब्द का इस्तेमाल आसानी से अपने हाथ धोने के लिए कर लेते हैं. जो लोग विवाद को समझते हैं और राज्य के द्वारा हमें दिए गए इस अनोखे शब्द का मतलब समझते हैं वे जानते हैं कि ये घटिया हरकतें चीजों को कमतर दिखाने की कोशिशें हैं.

कुछ साल पहले तक कुछ उम्मीदें थीं कि उत्तरदायित्व को राष्ट्रवाद के शोर-शराबे ऊपर रखा जाएगा. लेकिन, कुछ उदाहरणों को छोड़कर जमीन पर कुछ नहीं हुआ. कश्मीर में ‘आवारा’ गोलियां एक के बाद एक जान लेती रहेंगी और यह हो-हल्ला अगली मौत तक जारी रहेगा - और मौत तो होनी ही है क्योंकि हर गोली पर किसी का नाम लिखा है.

छह साल की कनीजा की बेवजह मौत यह स्टोरी भारतीय सेना के एक जवान की त्राल के आतंक प्रभावित इलाके में आम नागरिकों के साथ जुड़ाव की दूसरी कहानी से बिल्कुल अलग है. लेकिन ये दोनों कहानियां मिलकर जमीन की एक बिलकुल अलग हकीकत को बयां करती हैं. इस अफसर की कहानी को यहां पढ़ें.

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