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कमला मिल्स हादसा: हमें आगजनी से निपटने के लिए बदलना होगा नजरिया

रिहायशी बस्ती का हर व्यक्ति अपनी तरफ कुछ ना कुछ ऐसा जरूर ही करते रहता है जो आग लगने की वजह साबित हो सकता है

Bikram Vohra Updated On: Dec 30, 2017 06:47 PM IST

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कमला मिल्स हादसा: हमें आगजनी से निपटने के लिए बदलना होगा नजरिया

आग लगना खतरनाक है तो भी आम तौर पर हम इस खतरे को लेकर तटस्थ रुख अपनाए रखते हैं. दफ्तरों और रिहाइशी इलाकों में फायर अलार्म बेल (आग लगने की चेतावनी देने वाली घंटी) को जरा भी तवज्जो नहीं दिया जाता. अस्पताल, सिनेमा-घर, समारोह के आयोजन के स्थल, बाजार या फिर रिहाइशी इलाके— हर जगह एक-सी हालत है. शार्ट-सर्किट, सिगरेट के सुलगते टुकड़े और एहतियात के बुनियादी उपायों के अभाव के बीच हम हर वक्त इस खतरे से जूझ रहे होते हैं कि कहीं आग ना लगे.

कमला मिल्स में लगी आग और इस हादसे में 14 लोगों की मौत से पूरा देश सदमे में है लेकिन ऐसी स्थिति से निपटने के लिए क्या कुछ किया जाना चाहिए, इसकी कोई सीख हम नहीं ले रहे. ऑफिस में आग-बुझाने के उपकरण रखना अनिवार्य है और ऐसे उपकरण ऑफिस में होते भी हैं लेकिन एक्सपायरी डेट वाले, ऑफिस की दीवारों पर लटके इन उपकरणों के ऊपरी हिस्से पर जंग लग चुकी होती है. अपने प्लोर पर आप खुद ही इसे आजमा कर देख सकते हैं. इस्तेमाल करने की बात तो जाने दें, आपको शायद यह भी नहीं पता होगा कि उपकरण को जहां लटकाया गया है, वहां से उसे उतारा कैसे जाए.

आग के खतरे को लेकर हम लापरवाह क्यों हैं?

हिफाजती इंतजाम के तौर पर रखी बालू भरी गुलाबी बाल्टियां कचरे से भर जाती हैं, कूड़े की पेटी के रूप में उनका बड़ा खुलकर इस्तेमाल होता है और हममें से ज्यादातर लोगों को ये भी नहीं पता होता कि इमरजेंसी की हालत में निकलने के लिए दरवाजा किस ओर बना है. यही वजह है जो विमान-दुर्घटना की स्थिति में ज्यादातर मौत (तकरीबन 80 फीसद मामलों में) इस वाकये की वजह से नहीं बल्कि जहरीले धुएं के बीच दम घुटने से होती है, यात्रियों ने हिफाजत की सलाह पर अमल ही नहीं किया होता कि नीचे झुकना है, फुर्ती दिखानी है, झटपट बाहर निकलना है.

Mumbai: A view of a building in which a fire broke out in Mumbai on Friday. At least 14 people were killed and as many injured after a major fire in Kamala Mills Compound in Lower Parel. PTI Photo (PTI12_29_2017_000026B)

मुंबई रेस्तरां आग लगने के कई घंटे बाद इस एक्जिक्टिव ऑफिस में मैं बैठा हूं. इस बीच घंटी की आवाज आने लगती है. कोई भी नहीं हिलता. मैनेजर का चाय सुड़कना उसी तरह जारी है. उसकी सेक्रेटरी उसके ऊपर किसी पंखे की तरह डोल रही है. उसे तेज गूंजती आवाज से झल्लाहट हो रही है. शीशे की दीवार के बाहर, दिख रहा है कि कर्मचारी अपने काम में पहले की तरह लगे हैं, ऐसा लगता है जैसे किसी ने घंटी की आवाज सुनी ही नहीं.

अलार्म की आवाज अब बहुत ज्यादा तेज हो गई है, हर कोई अपने दांत निपोर रहा है, कंधे उचका रहा है. मैंने सोचा, चलो मैं ही मैनेजर का ध्यान इस तरह दिलाऊं. मेरा दिल अभी पत्थर का नहीं हुआ, चीजें अभी मुझपर असर करती हैं.

मैनेजर कहता है, 'इसमें नई बात क्या है?' वह अपने कंधे उचकाता है. मैं कहता हूं, 'कहीं आग लगी हो सकती है, हमलोग अभी मुंबई में घटी त्रासदी के बारे में बात कर ही रहे थे.' मैनेजर कहता है, 'ना, कहीं आग नहीं लगी.' वह एक आदमी को अलार्म बजने की वजह जानने के लिए भेजता है. उसे खुद जाना गवारा नहीं. दरअसल फायर-ड्रिल चल रही थी, वह खुद एमडी है. लेकिन उसे अपनी कुर्सी से उठना और दूसरों के साथ जाना गवारा नहीं. यही अपराधी मानसिकता हम सबके मन में मौजूद है.

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यह भी देखें कि तेजी से आग पकड़ने वाली चीजों का इस्तेमाल हम कितना करते हैं. फायरप्रूफ क्लैडिंग (आवरण) शायद ही कहीं मिले. इमारतों में अल्यूमिनियम की जगह प्लास्टिक क्लैडिंग का इस्तेमाल होता है. वायरिंग घटिया दर्जे की होती है. रिहायशी बस्ती का हर व्यक्ति अपनी तरफ कुछ ना कुछ ऐसा जरूर ही करते रहता है जो आग लगने की वजह साबित हो सकता है. यह चमत्कार ही कहा जाएगा कि इतना सब होने के बावजूद आग लगने जैसे हादसे और ज्यादा तादाद में नहीं होते.

ताक पर रखे जाते हैं नियम

बिल्डर का नियमों को ताक पर रखना चलना अपने आप एक कहानी है. साल 2016 का नेशनल बिल्डिंग कोड (एनबीसी) और उसके अलग-अलग उपबंध बहुत व्यापक हैं. इसमें आग लगने की घटना के नियमन और रोकथाम के निर्देश हैं. एनबीसी 2016, दरअसल 2006 की संहिता (कोड) पर आधारित है और इसे कई दफे संशोधित किया गया है. लेकिन इसे कोई तवज्जो नहीं दी जाती. आग लगने की घटना जब हो जाती है तब किसी इमारत के मालिक या फिर संचालक को गिरफ्तार किया जाता है जो कि हमारी प्राथमिकताओं के भटकाव का ही संकेत है और बताता है कि औपचारिक तौर पर होने वाला निगरानी का काम किस कदर लचर है.

हर राज्य के अपने नियम और कानून हैं लेकिन उनपर शायद ही कभी अमल होता है, आग लगने का हादसा जब हो जाता है तो इन नियमों पर से धूल झाड़कर उन्हें सामने लाया जाता है, लोगों को बताया जाता है कि फलां नियम का उल्लंघन हुआ है.

पहले भी हो चुके हैं बड़े-बड़े हादसे

एक बड़ा मसला अस्थायी तौर पर होने वाले निर्माण-कार्य तथा तंबू-पंडाल खड़ा करने का है. याद कीजिए, मुंबई के गिरगाम बीच पर ‘मेड इन इंडिया’ वीक के दौरान चल रहे जलसे में हुई आगजनी की घटना, जिसमें सबकुछ मिनटों में खाक हो गया था. साल 1997 के जून में उपहार सिनेमा हॉल की कुख्यात त्रासदी घटी. आगजनी की इस त्रासदी में 59 लोगों की जान गई. ज्यादातर की मौत दम घुटने से हुई. कोलकाता की ऐतिहासिक इमारत स्टीफेन कोर्ट में आग लगी तो 42 लोग मारे गए. लगभग एक घंटे तक फायर ब्रिगेड नहीं पहुंच सका, उचित फायरस्केप मौजूद नहीं थे, निकासी का रास्ता बंद था और चाबी किसी के पास नहीं थी.

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साल 2004 में तमिलनाडु के कुंभकोणम जिले में एक स्कूल में आग लगने की घटना हुई. 900 छात्र एक कच्ची छत के नीचे फंस गए. आग लगने की इस घटना में 94 बच्चों की जान गई. स्कूल में आग से बचने के एक भी नियम का पालन नहीं हो रहा था.

ऐसी एक घटना 1995 में हरियाणा के मंडी डबवाली में हुई. डीएवी स्कूल के एक कार्यक्रम के लिए हड़बड़ी में तंबू ताने गए. आग लगने पर 300 व्यक्तियों की जान गई, इनमें ज्यादातर स्कूली बच्चे थे. यहां भी आग से बचने के लिए जो बुनियादी इंतजाम जरूरी होते हैं उनकी अनदेखी की गई थी.

शिवकासी शहर अपने कुटीर उद्योगों के लिए प्रसिद्ध है, खासकर पटाखों बनाने के उद्योग के लिए. यहां पटाखा बनाने की एक फैक्ट्री में 2012 में आग लगी और कुल 25 लोग जिंदा जल गए.

सावधानी हटी दुर्घटना घटी

ऊपर जो उदाहरण गिनाए गए हैं, सबमें कोई ना कोई असावधानी दुर्घटना की वजह बनी. कहीं पानी नहीं था, कहीं निकासी का रास्ता बंद था, कहीं ज्वलनशील पदार्थों को इस्तेमाल किया जा रहा था तो कहीं ऐसे कर्मचारी काम पर रखे गए थे जिन्हें आग से बचने के बारे में कोई प्रशिक्षण हासिल नहीं था. कहीं वायरिंग में खराबी थी तो कहीं बिजली का उपयोग हद से ज्यादा हो रहा था.

आखिर हम सब आग लगने के खतरे की इतनी अनदेखी क्यों करते हैं? शायद हम मानकर चलते हैं कि ऐसा हादसा हमारे साथ पेश नहीं आएगा. अगर आपको हिफाजती इंतजाम सिखाने के लिए हो रही ड्रिल बेवकूफी भरी हरकत लगती है तो इसका बड़ा कारण यह सोच है कि आग लगती है तो लगे, हम इतने काबिल हैं कि उसे बुझा लेंगे.

अगर आपको ऐसा लगता है तो इस खयाल से बाज आइए और याद रखिए कि आग कहीं भी जीत सकती है, वह आपको जरा भी मौका नहीं देती.

हम भूल जाते हैं कि यह हाईटेक जमाना है, इस जमाने में जरूरी नहीं कि आग लगे तो धुआं उठे ही.

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