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महाराष्ट्र: कलावती की बेटी ने कुएं में कूदकर की खुदकुशी की कोशिश

कलावती की बेटी पपिता ने जान देने की कोशिश क्यों की, इसका कारण साफ नहीं हो सका है, लेकिन माना जा रहा है कि पारिवारिक कलह से तंग आकर उसने यह कोशिश की

Updated On: Jun 30, 2018 11:55 AM IST

FP Staff

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महाराष्ट्र: कलावती की बेटी ने कुएं में कूदकर की खुदकुशी की कोशिश

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में रहने वाली कलावती बांदुरकर की बेटी पपिता रामटेके ने कुएं में कूदकर कथित रूप से आत्महत्या की कोशिश की. हालांकि वहां मौजूद लोगों ने किसी तरह उसे बचा लिया.

किसान आत्महत्या से जूझ रहे विदर्भ के जालका गांव में रहने वाली कलावती के किसान पति ने कुछ सालों पहले आत्महत्या कर ली थी. कलावाती उस वक्त अचानक सभी अखबारों और समाचार चैनलों की सुर्खियों में आ गईं थी, जब मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उनके घर जाकर मुलाकात की थी और बाद में ससंद में किसान विधवाओं के लिए प्रतीक के तौर पर कलावती का जिक्र किया था.

कलावती के कुल 8 बच्चे थे, जिनमें से 2 की मौत हो चुकी है. ताजा मामला उनकी 28 साल की बेटी पपिता रामटेके का है, जिसने शुक्रवार शाम लगभग साढ़े 4 बजे मारेगांव में सिदना की पुराने कोर्ट परिसर में स्थित एक कुएं में छलांग लगा दी. हालांकि उस वक्त वहां मौजूद लोगों ने यह देखकर समय रहते उसे बाहर निकाल लिया जिससे उसकी जान बच गई.

लोगों ने फिर पुलिस को इस खबर दी, जिसके बाद मौके पर पहुंचकर पुलिस उसे अपने साथ थाने ले गई. वहीं पुलिस ने जब उससे इस कदम की वजह पूछी तो उसने कहा कि उसे किसी से कोई शिकायत नहीं. इसके साथ ही उसने अपनी मां को इस बारे में बताने से भी मना किया. इसके बाद पुलिस ने उसे समझा-बुझाकर उसके पति के हवाले कर दिया.

हालांकि पपिता के इस कदम के पीछे का कारण अभी तक साफ नहीं हो पाया है, लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि पारिवारिक कलह से तंग आकर उसने आत्महत्या की कोशिश की है.

राहुल गांधी ने कलावती के घर जाकर उनसे मुलाकात की थी

राहुल गांधी ने वर्ष 2008 में कलावती के घर जाकर उनसे मुलाकात की थी

कौन हैं कलावती?

कलावती यवतमाल जिले के मारेगांव तालुका स्थित जालका गांव में रहती है. उनके किसान पति ने कर्ज न चुका पाने के कारण वर्ष 2005 में आत्महत्या कर ली थी. साल 2008 में राहुल गांधी कलावती से मिलने उनके घर तक गए थे और फिर संसद में उनके साहस को सलाम किया तो वह अचानक से सुर्खियों में आ गई थीं. देशभर के मीडिया समूह उनके दरवाजे पर जा पहुंचे और देखते ही देखते हुए वह किसान विधवाओं के लिए प्रतीक बन गईं थीं. इसके बाद उन्हें सरकार की तरफ से कुछ आर्थिक मदद और खेती के लिए जमीन भी दी गई थी.

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