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कैलाश मानसरोवर यात्री चीन की तरफ विकसित हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर से प्रभावित

यात्रा के 15 वें जत्थे के लायजन अधिकारी संजीव कुमार ने बताया कि चीन ने न केवल लिपुलेख में स्थित अपनी आखिरी सीमा चौकी तक चार लेन की सड़क बना ली है बल्कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तकलाकोट के पहाड़ों में सड़कों का जाल बिछा लिया है

Updated On: Sep 30, 2018 06:05 PM IST

Bhasha

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कैलाश मानसरोवर यात्री चीन की तरफ विकसित हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर से प्रभावित

कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी कर लौटे श्रद्धालु लिपुलेख दर्रे के आगे भारत-चीन सीमा पर तिब्बत की तरफ विकसित की जा रही इंफ्रास्ट्रक्चर से काफी प्रभावित नजर आ रहे हैं. एक श्रद्धालु ने कहा कि सीमा पर पश्चिमी तिब्बत में जहां चीन द्वारा तेजी से आधारभूत संरचनाएं बनायी जा रही हैं वहीं भारत में यह काम धीमा चल रहा है.

इस साल यात्रा पर गए 16 वें जत्थे में शामिल नैनीताल जिले के निवासी सुधीर वर्मा ने बताया कि भारत की सडकें अभी भी दर्रे से 75 किलोमीटर दूर हैं जबकि चीन दर्रे तक पहुंच गया है और महज 500 मीटर दूर है.

उन्होंने कहा कि भारत-चीन सीमा पर आखिरी भारतीय चौकी को जोड़ने के लिए बनाए जा रहे तीनों मार्गों के काम की गति काफी धीमी है. इस संबंध में धारचूला के सब-कलेक्टर आरके पांडे ने कहा कि पिथौरागढ़ की दारमा घाटी में सोबला-सेला-तेदांग मोटर मार्ग पर काम पांगबावे में बडी चट्टानों के कारण रूका पड़ा है जबकि घाटियाबगड़-लिपुलेख सडक का निर्माण नजांग में पिछले एक साल से कछुए की गति से रेंग रहा है.

मुनस्यारी के सब-कलेक्टर केएन गोस्वामी ने बताया कि मुनस्यारी की जौहार घाटी में भारत-चीन सीमा पर आखिरी सुरक्षा चौकी को जोड़ने के लिए बनाया जा रहा 61 किलोमीटर लंबा मार्ग 10 सालों में केवल 18 किलोमीटर ही बन पाया है.

उन्होंने कहा, 'वर्ष 2008 में शुरू हुआ सड़क निर्माण का कार्य 2012 में खत्म होना था लेकिन अभी तक इसमें से केवल आठ किमी सड़क ही बन पाई है.' एक श्रद्धालु का कहना है कि संभवत: चीन इस साल के आखिर तक सीमा चौकी तक पहुंच जाएगा.

भारत के एक अन्य श्रद्धालु धर्मेंद्र उपाध्याय ने कहा कि लिपुलेख तक पहुंचने के लिए चीनियों ने तकलाकोट तक चार लेन की सडक बना ली है लेकिन हम अभी तक अपने पैदल रास्ते की मरम्मत भी नहीं कर पाये.

पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी सी रविशंकर ने कहा, 'सिविल प्रशासन को सीमा सडक संगठन (बीआरओ) ने आश्वस्त किया है कि व्यास घाटी में निर्माणाधीन सडक वर्ष 2020 तक बन जाएगी.' यात्रा की नोडल एजेंसी कुमांउ मंडल विकास निगम (केएमवीएन) के एक कर्मचारी दिनेश गुरूरानी ने कहा कि जब वह 30 साल पहले श्रद्धालुओं को आखिरी भारतीय शिविर नाभीढांग से रवाना करते थे तो उन्हें चीन में वाहनों तक पहुंचने के लिये दस किलोमीटर तक चलना पडता था लेकिन अब चीन ने लिपुलेख दर्रे के निकट तक सडकें बना ली हैं.

यात्रा के 15 वें जत्थे के लायजन अधिकारी संजीव कुमार ने बताया कि चीन ने न केवल लिपुलेख में स्थित अपनी आखिरी सीमा चौकी तक चार लेन की सड़क बना ली है बल्कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तकलाकोट के पहाड़ों में सड़कों का जाल बिछा लिया है.

पिछत्तर किलोमीटर लंबी निर्माणाधीन घाटियाबगड-लिपुलेख दर्रा मार्ग वर्ष 1998 में प्रस्तावित किया गया था और इसका निर्माण वर्ष 2007 में शुरू हुआ था. हालांकि कुछ अधिकारियों को उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में ये सडकें बन जाएंगी.

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