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प्रभु के राज में चल रही 'मौत' की रेल, 3 साल में मारे गए 700 यात्री

आंकड़ों के मुताबिक सुरेश प्रभु के कार्यकाल में भारतीय रेल में डिरेलमेंट (ट्रेन के पटरी से उतरने) के मामलों में 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है

FP Staff Updated On: Aug 23, 2017 11:57 AM IST

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प्रभु के राज में चल रही 'मौत' की रेल, 3 साल में मारे गए 700 यात्री

रेल मंत्री सुरेश प्रभु के 3 साल के कार्यकाल में करीब 700 लोग रेल हादसों में अपनी जान गवां चुके हैं. ये आंकड़ा साल 2014-15 से अब तक का है. इस दौरान 346 छोटे बड़े रेल हादसे हुए हैं. रेल सुरक्षा पर बड़े-बड़े दावों के बाद भी मुसाफिरों की जान भारतीय रेल में सुरक्षित नहीं है. इससे पहले लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहते साल 2004-05 से 2006-07 तक 663 रेल हादसे हुए थे जिनमें 759 लोगों की मौत हुई थी.

मुजफ्फरनगर में हुए रेल हादसे को एक सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ है और कानपुर के पास औरैया जिले में आजमगढ़ से दिल्ली आने वाली कैफियात एक्सप्रेस बड़े हादसे का शिकार हो गई. डंपर से टकरा कर ट्रेन की 10 बोगियां डिरेल हो गई. इस हादसे में करीब 74 यात्री घायल हुए हैं, जिनमें कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है.

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आंकड़ों पर गौर करें तो सुरेश प्रभु के कार्यकाल में भारतीय रेल में डिरेलमेंट (ट्रेन के पटरी से उतरने) के मामलों में 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. पिछले 5 साल के आंकड़ों पर गौर करें तो 2012-13 में 69 हादसों में 49 डिरेलमेंट के मामले थे. साल 2013-14 में 71 हादसों में 53, 2014-15 में कुल 85 रेल हादसों में 63, 2015-16 में 78 हादसों में 65 और साल 2016-17 में करीब 100 रेल हादसे हुए जिनमें से 80 मामले डिरेलमेंट के थे.

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सुरेश प्रभु के कार्यकाल में 20 नवंबर 2016 को कानपुर के पास एक बड़ा हादसा हुआ जब इंदौर-राजेंद्र नगर एक्सप्रेस के पटरी से उतर जाने की वजह से 151 मुसाफिरों की जान चली गई. उसके ठीक एक महीने के बाद 28 दिसंबर को कानपुर के पास ही रुरा में अजमेर-सियालदह एक्सप्रेस के 15 डब्बे पटरी से उतर गए. हालांकि बहुत बड़ा हादसा होने के बाद भी किस्मत से किसी मुसाफिर की जान नहीं गई.

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इस हादसे के बाद 29 दिसंबर को ही रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने रेल बोर्ड और सभी जोन के महाप्रबंधकों के साथ मीटिंग में साफ तौर पर कहा गया था, 'मैं यहां छोटे से संदेश के साथ आया हूं. अगर आपसे हालात नहीं संभल रहे हैं तो हम दूसरे अधिकारियों की तलाश कर लेंगे'. लेकिन मंत्री के कड़े संदेश के बाद भी रेलवे में हालात नहीं बदले और उसके बाद भी पटरियों के टूटने के दर्जनों मामले सामने आए.

रेल अधिकारी हर बार इन मामलों पर लीपापोती करते रहे और रेल के फ्रैक्चर होने का कारण सर्द मौसम को बताते रहे. उसके बाद फिर 21 जनवरी 2017 को कुनेरु जहदलपुर- भुबनेश्वर हीराखण्ड एक्सप्रेस पटरी से उतर गई, जिसमें 40 से ज्यादा मुसाफिरों की मौत हुई और 70 से ज्यादा घायल हुए.

रेल अधिकारी इस घटना को नक्सली षडयंत्र बताकर बचने की कोशिश कर ही रहे थे कि 30 मार्च को उत्तर प्रदेश के महोबा के पास महाकौशल एक्सप्रेस पटरी से उतर गई और इसमें 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए. इन तमाम हादसों में करीब 700 लोगों की मौत होने के बाद भी भारतीय रेल के अधिकारी सोए रहे.

इसलिए मुजफ्फरनगर हादसे के तुरंत बाद 4 इंजीनियरों को निलंबित किया गया. इसके अलावा रेल बोर्ड के मेंबर इंजीनियर, उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक और दिल्ली के डीआरएम को छुट्टी पर भेज दिया गया. हालांकि इस कदम से कितना सुधार हो पाएगा और मुसाफिरों की मौत के अलावा रेलवे को हो रहे अरबों रुपए के नुकसान को कहां तक बचाया जा सकेगा कह पाना मुश्किल है क्योंकि इसके पीछे वजह भी साफ है. दरअसल रेल के हर बड़े हादसे (जिसमें मुसाफिरों की जान गई हो) की जांच की एक प्रक्रिया निर्धारित है.

Muzaffarnagar: Rescue and relief works underway on Sunday near the mangled coaches of the Puri-Haridwar Utkal Express train which derailed at Khatauli near Muzaffarnagar on Saturday day. PTI Photo by Shahbaz Khan (Story DES18 ) (PTI8_22_2017_000081B)

यह जांच कमिश्नर रेलवे सेफ्टी करते हैं. इन्हें हर हादसे की जांच की एक प्रारंभिक रिपोर्ट एक महीने के अंदर रेलवे को सौंपना होता है. इसका मकसद ये होता है कि रेल सुरक्षा के लिहाज से फौरी तौर पर कदम उठा सके. लेकिन 9 महीने गुजर जाने के बाद भी न तो पुखरायां हादसे और न ही 7 महीने गुजर जाने के बाद कुनेरु हादसे की कोई रिपोर्ट आई है. न ही इसकी कोई जानकारी साझा की गई है. भले ही ये हादसे किसी षड्यंत्र की वजह से हुए हों लेकिन इस पर आज तक कोई रिपोर्ट साझा नहीं की गई है. यानि यहां मुद्दों पर पर्दा डालकर बचने की कोशिश ज्यादा होती है.

(न्यूज़ 18 से चंदन कुमार की रिपोर्ट)

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