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कड़वी हवा: बीमार आप नहीं, बीमार ये हवा हो गई है

दिल्ली और देश की अन्य जगहों में पिछले दिनों में जिस घातक स्मॉग का सामना आम लोगों ने किया है उसकी वास्तविकता से रूबरू कराती है फिल्म कड़वी हवा

Ankita Virmani Ankita Virmani Updated On: Nov 25, 2017 09:49 AM IST

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कड़वी हवा: बीमार आप नहीं, बीमार ये हवा हो गई है

क्या आपने कभी सड़क के बीच बैठी चिड़िया को देखा है? सामने तेज स्पीड से आती गाड़ी को देख अक्सर वो उड़ने की बजाय आंखे मूंद लेती है. सोचती है, वो नहीं देखेगी तो गाड़ी चुपचाप निकल ही जाएगी.

ये चिड़िया आपको कुछ अपने जैसी नहीं लगती? सामने से आते तूफान को देख कुछ ऐसा ही तो करते हैं हम. आंखें मूंद लेते हैं. सोचते हैं अभी ये तूफान निकल जाए फिर देख लेंगे. आपका ये जानना जरूरी है भले आप आंख बंद कर लीजिए, पर कड़वी हवा नाम का ये तूफान अब आपको छोड़कर कही नहीं जाने वाला. कड़वी हवा बोलते ही शायद आपको लग सकता है कि बात सिर्फ दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों की स्मॉग की हो रही है. पर नहीं, इस परेशानी को आप जितना छोटा समझ रहे है ये उतनी है नहीं.

धूंए और धुध की चादर जिसे आप आमतौर पर स्मॉग के नाम से जानते है, उसने जब आपको घेरा तो आपने मास्क लगा लिया. आपको लगा मैं बच गया, मेरा परिवार बच गया. बाकी सब से मेरा क्या लेना देना? बाकी सब सरकार का ठेका. बहुत ज्यादा गुस्सा आया भी तो सड़क पर प्रोटेस्ट करने उतर गए.

लेकिन सवाल ये, कि उससे बदला क्या? आपको लग रहा है इस हवा से आप बीमार हो रहे हैं तो आप गलत हैं. दरअसल बीमार ये हवा हो गई है. कुछ को 4 दिन परेशान करती है, और कुछ को साल भर.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

दरअसल हम इंसानों की एक बड़ी अजीब बात है. किसी चीज को आदत बनाते हमें देर नहीं लगती. थोड़ा नाक मुंह बनाकर ही सही हम खुद को हर हालात में ढाल लेते हैं. जैसे हमने अपने आपको इस कड़वी हवा में ढाल लिया है. दो दिन गुस्सा आया, सरकार को जमकर कोसा. फिर क्या, फिर ढल गए. गलती हमारी है, हम लोग बहुत जल्दी यूज टू हो जाते हैं.

अपनी परेशानी को तो हम मास्क लगा कर ढक लेते है. अब परेशानी उस किसान की समझिए जिसकी पूरी जिंदगी इस हवा के इर्द-गिर्द घूमती है. जरा सा हवा ने अपना रुख बदला नहीं कि उसकी जिंदगी बदल गई. आपकी थाली में रोटी भेजने वाला किसान दो जून रोटी का मोहताज हो गया. अब आप कहेंगे इसमें आपकी क्या गलती. तो बताइए उस किसान की क्या गलती. वो तो ना एसी चलाता है, ना गाड़ी से चलता है.

डायरेक्टर नीला माधब पांडा की नई फिल्म, कड़वी हवा, इसी हवा की बात करती है. सूखे की मार झेल रहे बीहड़ के महुआ गांव में फिल्माई गई इस फिल्म के एक सीन में जब टीचर बच्चों से पूछता है कि साल में मौसम कितने होते है. तो सारे बच्चे इसका जवाब चार देते हैं. एक बच्चा इस बात पर अटक जाता है कि साल में मौसम तो सिर्फ 2 ही होते है. एक सर्दी का और एक गर्मी का. जब टीचर गुस्से में पूछता है कि बाकी के दो कहां गए तो बड़ी मासूमियत से बच्चा जवाब देता है कि टीचर बारिश तो अब चार पांच दिन ही होती है, उसे मौसम कैसे कह दें?

ये सिर्फ एक फिल्म नहीं है. ये एक कड़वा सच है. मुंह पर खींच कर मारा गया एक थप्पड़ है.

इस फिल्म में एक तरफ वो किसान है जो कर्जे में इतना डूबा है कि उसके पास आत्महत्या के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. उसे इंतजार है हवा के रुख बदलने का. हवा का रुख बदले तो बरसात हो... उसके सूखे खेत फिर से लहलहाएं. वहीं दूसरी तरफ ओडिशा का एक और गांव है...जहां हवा का रुख बदलने से चारों तरफ सिर्फ पानी-पानी है. साइक्लोन की मार झेल रहे यहां के किसान को तो ये भी नहीं पता कि उसकी जमीन थी कहां?

कड़वी हवा फिल्म का एक दृश्य

कड़वी हवा फिल्म का एक दृश्य

फिल्म में अंत में गुलजार साहब की नज्म है, जो आपको सोचने पर मजबूर कर देती है. इसकी लाइनें कुछ यूं हैं...

बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड़, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील छील के खाल ज़मीं की टुकड़ा टुकड़ा बांट रहा है आसमान से उतरे मौसम सारे बंजर होने लगे हैं मौसम बेघर होने लगे हैं...

इस फिल्म और सच्चाई में अब ज्यादा फासला नहीं बचा हैं. वक्त है. संभल जाइए. आपके बच्चों के चित्रों में आसमान का रंग तो पहले ही नीले की जगह ग्रे हो चुका है. अब ऐसा ना हो कि चार मौसम की ये कहानी सिर्फ इतिहास में पढ़ाई जाए.

दीवाली से पहले सुप्रीम कोर्ट के पटाखा बैन को हमने बिना सोचे समझे धर्म का मुद्दा बना दिया. क्यों? क्या वो बैन हम सब के भले के लिए नहीं था? क्या ये धुंआ हमसे हमारा धर्म पूछकर हमारी जान लेगा? हम कब समझेंगे कि इस जहरीली हवा का हमारे मजहब से कोई लेना देना नहीं है?

कुछ लोगों ने अपना गुस्सा दिखाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के बाहर पटाखे फोड़े. क्या आपका बच्चा किसी और हवा में सांस लेगा? पुलिस और कानून के डर से बाइक पर हेलमेट और गाड़ी में सीट बेल्ट लगाने वाले हम लोग अब बिना किसी के कहे मास्क लगाने लगे हैं.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल दिवाली के दिन दिल्ली में आइटीओ पर पीएम 10 का स्तर 438 था, जो पिछले साल दिवाली के दिन 878 था. दिल्ली में सात जगह दिवाली के दिन की तुलना पिछले साल से की गई. सातों जगह वायु प्रदूषण पिछले साल से कम था.

ऐसा नहीं कि 438 पर आप सुरक्षित है, हालात 438 पर भी चिंताजनक है. लेकिन जरा सोचिए अगर ये बैन ना लगाया गया होता तो क्या होता? प्रदूषण पैमानों के मुताबिक पीएम 10 का 100 और पीएम 2.5 का 60 से उपर होना खराब है.

कब बदलेंगे हम?

अब ठीकरा फोड़ने से आपको लगता है कि परेशानी खत्म हो जाएगी तो फोड़ लीजिए और मजे कीजिए. फिर स्मॉग हो तो मास्क खरीद लीजिएगा, घर गाड़ी में एयर प्यूरिफाइर लगा लीजिएगा.

और सच में चिंता है तो इस बात पर विचार कीजिए कि आखिरी बार कब आपने पेड़ या पौधा लगाया था. गाड़ी पूल करने का ख्याल कब आया था? ऐसी कब ये सोच के बंद किया था कि एक से भी फर्क पड़ता है... वगैरह...वगैरह...

यकीन कीजिए कोई और कुछ बदलने नहीं आने वाला. सरकार के बदलाव का इंतजार तो बिल्कुल मत कीजिए. सरकारों पर इसके लिए बड़े स्तर पर प्रयास के लिए दबाव बनाने से पहले हमें खुद को भी बदलना होगा.

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