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'किसी ने हमें बचाने की कोशिश नहीं की'- आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच फंसे परिवार का दर्द

कचडोरा गांव में मुबीना लोन के घर पर पांच हथियारबंद आतंकियों ने कब्जा कर रखा था और घर के बाहर सैकड़ों की तादाद में सुरक्षाबलों ने मोर्चा संभाल रखा था

Sameer Yasir Updated On: Apr 04, 2018 02:11 PM IST

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'किसी ने हमें बचाने की कोशिश नहीं की'- आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच फंसे परिवार का दर्द

कश्मीर घाटी में आतंकवाद के खिलाफ अभियान में सुरक्षाबलों को रविवार को बड़ी कामयाबी मिली. शोपियां जिले में दो जगहों पर हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने 13 आतंकियों को ढेर कर दिया. इनमें से 5 आतंकी शोपियां के कचडोरा गांव में मारे गए.

शोपियां के कचडोरा गांव में मुबीना लोन के घर पर पांच हथियारबंद आतंकियों ने कब्जा कर रखा था. सभी आतंकी घर की दूसरी मंजिल पर बने चार कमरों में छिपे बैठे थे. आतंकियों ने घर के चारों कोनों पर सावधानीपूर्वक पोजीशन ले रखी थी ताकि सुरक्षाबलों को निशाना बना सकें. वहीं मुबीना के घर के बाहर सैकड़ों की तादाद में सुरक्षाबलों ने मोर्चा संभाल रखा था ताकि आतंकियों को मौके से भागने से रोका जा सके. अपने घर में आतंकियों की घुसपैठ और सुरक्षाबलों की घेराबंदी से मुबीना लोन और उनकी तीन बेटियां दहशत में थीं. मुबीना की एक बेटी तो खौफ के चलते कुछ देर के लिए अपने होशो-हवास खो बैठी थी. बेटी की हालत देखकर मुबीना ने उसका सिर सीमेंट की दीवार से इतनी जोर से टकराया कि वह दर्द से चीख उठी.

फ़र्स्टपोस्ट से बात करते हुए मुबीना ने बताया, 'जब वह चीखी तो मेरे बाकी बच्चे भी रोने लगे. मुझे लगा था अब सब कुछ खत्म होने वाला है, हमारा अंत निकट था.' मुबीना ने आगे बताया कि, 'मुठभेड़ के वक्त हर तरफ अंधेरा था, हमारे घर में सिर्फ सेना द्वारा इस्तेमाल की जा रही रोशनी ही पर्दों से छन-छनकर आ रही थी.' मुबीना और उसके परिवार के 14 सदस्यों ने फिलहाल अपने एक पड़ोसी के घर में शरण ले रखी है.

कचडोरा गांव आतंकियों के लिए मुफीद

दक्षिणी कश्मीर के शोपियां जिले का कचडोरा गांव सेब के विशाल बागान के बीच बसा हुआ है. यह गांव आतंकियों के लिए एकदम मुफीद जगह है. आतंकी कचडोरा गांव और उसके आसपास के इलाके में पनाह लेकर सुरक्षाबलों के साथ आंख-मिचौली का खेल खेलते हैं. दिलचस्प बात यह है कि कचडोरा गांव से महज कुछ सौ मीटर की दूरी पर एक सैन्य शिविर है, फिर भी आतंकी बेखौफ होकर इलाके में आवागमन करते रहते हैं. रविवार को मुठभेड़ से पहले सात हथियारबंद आतंकी गांव के आसपास घूमते पाए गए थे. इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि इलाके के लोगों के सिर पर मौत हमेशा नाचा करती है. यहां जिंदगी और विनाश के बीच का फासला महज एक गन शॉट है.

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शनिवार रात 10:30 बजे सात आतंकी कचडोरा गांव स्थित मुबीना के पति मोहम्मद मकबूल लोन के घर में जबरन घुस आए थे. मकबूल लोन संयुक्त परिवार में रहते हैं. वह चार भाइयों में सबसे बड़े हैं. मकबूल लोन के घर में घुसकर आतंकियों ने सबसे पहले अपने लिए खाने की मांग की. मजबूरन परिवार को आतंकियों को खाना देने के लिए बाध्य होना पड़ा. आतंकी खाना खाकर फारिग ही हुए थे कि तभी मकबूल लोन का दूसरा बेटा नियाज़ इलाही लोन दौड़ा-दौड़ा आया. नियाज़ इलाही ने आतंकियों को बताया कि सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके को घेर लिया है.

नियाज़ इलाही ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि, 'जब आतंकियों ने मेरी बात सुनी तो वे खड़े हो गए. इसके बाद उन्होंने हमें अलविदा कहा और हमारा घर छोड़कर चले गए.' नियाज़ इलाही की बात की गवाही गांव के हज़ारों लोगों ने दी है. यह सभी गांववाले मुठभेड़ के वक्त घटनास्थल पर बिखरे पड़े भयंकर विस्फोटकों से अडिग होकर मौके पर मौजूद थे. आगे की कहानी नियाज़ के पिता मकबूल लोन ने सुनाई. उन्होंने बताया, 'सातों आतंकी हमारे घर से निकलकर गली में बमुश्किल कुछ कदम दूर ही गए होंगे कि तभी गोलियां चलने की आवाज आई. गोलियों की आवाज सुनकर दो आतंकी तो भाग निकले, लेकिन पांच आतंकी मेरे घर वापस लौट आए. घर आकर उन्होंने दरवाजे को अंदर से बंद कर लिया. आतंकियों के साथ हमारा परिवार भी घर में फंस गया था.'

10 घटों तक आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच फंसा रहा परिवार

इसके बाद, दो बुजुर्ग दंपति, मकबूल लोन के तीन भाइयों की पत्नियां और चार बच्चों समेत परिवार के 14 सदस्यों ने अगले 10 घंटे पांच आतंकियों के साए में बिताए. घर के बाहर भारतीय सेना की एक बड़ी टुकड़ी, कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ के जवान सुबह होने का इंतजार कर रहे थे. वहीं घर के अंदर लोन परिवार रात भर अपनी खैरियत की दुआएं करता रहा. परिवार के हर सदस्य को लग रहा था कि यह उनकी जिंदगी का आखिरी दिन है.

मकबूल लोन की पत्नी मुबीना ने बताया, 'उस वक्त हम बेहद खौफजदा थे. मेरी तीन बेटियां हैं. मैं सोच रही थी कि अगर हम आतंकियों और सुरक्षाबलों की क्रॉस फायरिंग में फंस गए और मारे गए तो हमारी मौत पर कोई रोने वाला भी नहीं बचेगा. हमारी तीन पीढ़ियां एक साथ मिट जाएंगी, तब हमारी मौत पर मातम कौन मनाएगा.'

नियाज़ इलाही और काले दुपट्टे में मुबीना लोनी. (फोटो- समीर यासिर)

नियाज़ इलाही और काले दुपट्टे में मुबीना लोनी. (फोटो- समीर यासिर)

सोमवार को ढलती दोपहर के वक्त जब तबाह हो चुके घर से काला धुआं उठा तो 10 साल की अरबीन लोन दर्द और खौफ से चिल्ला उठी. अरबीन की चीख सुनकर मां ने उसका मुंह दबाकर एक दीवार की ओट में छिपा लिया. कक्षा एक में पढ़ने वाली अरबीन अपने पड़ोसी के आंगन में खेला करती थी. मासूम अरबीन यह समझने में असमर्थ है कि हजारों लोग क्यों उस मलबे के आसपास इकट्ठा हुए हैं जो कभी उसका घर हुआ करता था.

मासूम अरबीन ने फ़र्स्टपोस्ट से रोते हुए कहा, 'हमारे घर को मिट्री (मिलिट्री यानी सेना) ने तबाह कर दिया है. अब रहने के लिए हमारे पास कोई घर नहीं है. उन्होंने हमें बाहर जाने की इजाज़त भी नहीं दी थी, लेकिन हम लोग सुबह वहां से निकल आए.'

खूंरेजी से बच्चों की मानसिकता बदल रही है

कश्मीर घाटी में जब से शूटआउट (गोलीबारी) और हत्याओं का नया दौर शुरू हुआ है, तब से इस मुसीबतजदा इलाके में बच्चे सबसे ज्यादा कष्ट उठा रहे हैं. रोज-रोज की हिंसा देखकर बच्चों की मासूमियत खत्म होती जा रही है. बंदूकों की इस जंग ने एक पूरी पीढ़ी को तबाह कर दिया है.

मकबूल लोन की क्रमश: 13, 10 और 7 साल की नाजुक उम्र वाली तीन बेटियों के लिए सेना, आतंकी, शहीद, फायरिंग, मुठभेड़, कनीगंज (पथराव), घेराव (कॉर्डन) इत्यादि जैसे शब्द अब स्वाभाविक हो गए हैं. यह शब्द इलाके के बच्चों की जुबान पर ऐसे आते हैं जैसे कि वे उनके स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा हों.

नन्हीं अरबीन बडे़ दुख के साथ अपने पिता मकबूल लोन से पूछती है, 'मेरी सभी किताबें, मेरी सभी कॉपी और मेरी पेंसिल तो घर के साथ ही जल चुकी हैं. अब मैं स्कूल कैसे जाऊंगी पापा?' अरबीन के सवाल का जवाब मकबूल की दूसरी बेटी रज़िया देती है. रज़िया अपनी बड़ी बहन से कहती है, 'पापा तुम्हारे लिए नई किताबें, कॉपी और पेंसिल ला देंगे, लेकिन अभी उनके पास पैसे नहीं हैं. हमारा सब कुछ खत्म हो चुका है.'

मकबूल लोन को सांत्वना देने के लिए गांववालों का तांता लगा हुआ है. सभी गांववाले उनका घर तबाह होने और परिवार के बेघर होने पर दुख जता रहे हैं. कचडोरा गांव में मकबूल के पड़ोस में रहने वाले अब्दुल अहद सोफी ने अफसोस जताते हुए कहा, 'हमारे इलाके के बच्चों ने कभी शांति नहीं देखी है. वे शांति का मतलब तक नहीं जानते हैं.'

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कश्मीर घाटी में जारी खून-खराबे से न सिर्फ बच्चों की मासूमियत खत्म हो रही है बल्कि वे बेखौफ भी होते जा रहे हैं. घाटी के बच्चों के व्यवहार में हो रहे इस बदलाव से विशेषज्ञ खासे चिंतित हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि, कश्मीरी बच्चों में निडरता का स्तर अपनी सीमाएं लांघ चुका है. इलाके में हो रहे रक्तपात को ज़्यादातर बच्चों ने अपना आंखों के सामने देखा है. वहीं कई बच्चे टीवी और समाचार पत्रों के माध्यम से इस खूंरेज़ी के आदी हो चुके हैं. लिहाज़ा अब गोलीबारी, मुठभेड़ और खून-खराबा देखकर भी बच्चों पर खौफ तारी नहीं होता.

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कश्मीर के जाने-माने मनोचिकित्सक मुश्ताक मरग़ूब के मुताबिक, 'नब्बे के दशक के शुरुआती दिनों में हमारे बच्चों ने सड़कों पर केवल सेना के जवानों, आतंकियों, सेना की कार्रवाइयों (क्रैकडाउंस) को देखा है. जब हम युवा थे तब पुलिस वैन के सायरन की आवाज़ सुनकर ही वहां से भाग जाते थे. लेकिन इस नई पीढ़ी को मौत का कोई खौफ नहीं है. आजकल के बच्चे कहते हैं, 'सेना हमारा क्या कर लेगी?' यह जानते हुए भी कि वे मौत के मुहाने पर खड़े हैं, कुछ बच्चे बेखौफ होकर सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने से भी नहीं चूकते हैं.'

आतंकियों और सुरक्षाबलों दोनों के हाथों मारे जाते हैं बच्चे

घाटी में सबसे बड़े मानवाधिकार संगठनों में से एक 'जम्मू कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी' (JKCCS) ने पिछले हफ्ते अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि, साल 2003 के बाद से अब तक जम्मू और कश्मीर में एक साल से लेकर 17 साल तक की उम्र के 318 बच्चे हिंसा में मारे जा चुके हैं. इनमें से 144 बच्चे सुरक्षाबलों और जम्मू एवं कश्मीर पुलिस की गोलियों का शिकार होकर मारे गए, 12 बच्चों की हत्या आतंकियों ने की, 147 बच्चों को अज्ञात बंदूकधारियों ने मौत के घाट उतारा जबकि 15 बच्चे एलओसी पर क्रॉस फायरिंग और गोलाबारी में मारे गए. JKCCS की रिपोर्ट के मुताबिक, घाटी में बीते 15 साल में मारे गए 318 बच्चों में से 121 बच्चे 12 साल से कम उम्र के थे.

लोन परिवार के सदस्यों का आरोप है कि, मुठभेड़ के दौरान किसी ने भी उनसे बचाव या घर से सुरक्षित बाहर निकालने की कोशिश नहीं की. सुरक्षाबलों और पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान आम नागरिकों के फंसने पर अपनाए जाने वाले नियमों और प्रक्रिया का पालन नहीं किया. मुठभेड़ के वक्त लोन परिवार के अलावा आसपास के करीब छह घरों में 50 लोग फंसे हुए थे. पुलिस ने पड़ोस के घरों में फंसे लोगों को तो सुरक्षित बाहर निकाल लिया लेकिन लोन परिवार की किसी ने भी सुध नहीं ली. लोन परिवार के सभी सदस्यों को भाग्य के भरोसे और आतंकियों के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया था.

मकबूल लोन के बेटे नियाज़ इलाही के मुताबिक, 'उन्होंने हमें घर से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कुछ नहीं किया. न तो किसी पुलिसवाले और न ही गांव के सरपंच ने हमें घर से बाहर निकलने के लिए कहा. हम आतंकियों और सुरक्षाबलों की फायरिंग के बीच रात भर फंसे रहे. सुबह लगभग सात बजे हमने आतंकियों से दस मिनट के लिए गोलीबारी बंद करने की गुज़ारिश की. आतंकियों ने हमारा अनुरोध मान लिया और कुछ देर के लिए फायरिंग रोक दी. इस तरह हमारा परिवार घर से सुरक्षित बाहर निकल पाया.'

शोपियां के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) श्रीराम दिनकर ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि, आतंकियों ने लोन परिवार के चौदह सदस्यों को बंधक बना रखा था. मुठभेड़ की खबर सुनकर गांव समेत ज़िले में कई जगहों पर लोगों ने पथराव शुरू कर दिया था. ज़्यादातर पुलिसकर्मी पथराव कर रहे लोगों को नियंत्रित करने में व्यस्त थे. पथराव वाली पांच जगहों पर सबसे ज़्यादा पुलिस बल तैनात करना पड़ा था. यही वजह है कि पुलिसवाले लोन परिवार के सदस्यों को घर से बाहर निकलने में मदद नहीं कर पाए. अगर पुलिस पथराव करने वाले स्थानीय नागरिकों को नियंत्रित न करती तो हताहतों की तादाद बहुत ज़्यादा हो सकती थी.

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एसएसपी दिनकर के मुताबिक, 'घर में छिपे आतंकियों में से एक आतंकी नहीं चाहता था कि लोन परिवार के सदस्य घर छोड़कर सुरक्षित बाहर निकल जाएं. वह आतंकी बंधक स्थिति को और लंबा करना चाहता था.' दिनकर ने आगे बताया कि वह जानते थे कि घर के भीतर बच्चे हैं, यही वजह थी कि मुठभेड़ के वक्त सुरक्षाबलों ने 'अधिकतम संयम' दिखाया.

मलबे में तब्दील हो चुका मुबीन लोन का घर. (फोटो- समीर यासिर)

मलबे में तब्दील हो चुका मुबीना लोन का घर. (फोटो- समीर यासिर)

चलिए अब कचडोरा गांव वापस लौटते हैं. सोमवार शाम मकबूल लोन की तीनों बेटियां मुठभेड़ में तबाह हो चुके अपने घर को देखने जा रही हैं. उनका घर पूरी तरह से बर्बाद होकर मलबे में तब्दील हो चुका है. गांव के सैकड़ों लड़के घर के मलबे को उलट-पुलटकर खोजबीन कर रहे हैं ताकि बचा-खुचा कुछ हो तो उसे लोन परिवार को सौंपा जा सके. अपने घर के सामने पहुंचने पर मकबूल लोन की तीनों बेटियां सन्न रह जाती हैं. उनके दो मंज़िला घर का सिर्फ लोहे का गेट ही थोड़ा सही-सलामत बचा है, बाकी चीजें तबाहो-बर्बाद हो चुकी हैं. नम आंखों के साथ तीनों लड़कियां वहां मौजूद लोगों की भीड़ में गुम हो जाती हैं.

बेटियों के बाद मुबीना भी अपने तबाह हो चुके घर को देखने पहुंचीं हैं. घर को मलबे का ढेर बना देखकर उन्हें भी गहरा सदमा लगता है. लेकिन तभी उन्हें घर में छिपे एक आतंकी की एक बात याद आती है. मुबीना ने बताया कि, 'जिस वक्त हम लोग घर छोड़कर भागने वाले थे, उसी वक्त एक आतंकी ने पीने के लिए मुझसे ठंडा पानी मांगा था. लेकिन मुझे घर से निकलने की जल्दी थी और मेरे पास वक्त नहीं था. इसलिए मैं ठंडे पानी की उसकी ख्वाहिश पूरी नहीं कर पाई. मुझे अब ज़िंदगी भर इस बात का अफसोस रहेगा.'

लोन परिवार के घर में छिपे पांचों आतंकियों को सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ में मार गिराया. पांचों आतंकियों के शव घटनास्थल से बरामद किए गए.

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