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एक था रोमियो, एक हैं मारकण्डेय काटजू: ‘एक्सपायरी डेट’ वाले प्रेमियों से बचके!

काटजू साहब को जिस उम्र में इश्क की याद सताई है, उसमें उन्हें निकम्मे होने का डर भी नहीं.

Piyush Pandey Updated On: Mar 28, 2017 01:40 PM IST

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एक था रोमियो, एक हैं मारकण्डेय काटजू: ‘एक्सपायरी डेट’ वाले प्रेमियों से बचके!

एक था रोमियो. एक हैं मारकण्डेय काटजू.

एक ने इश्क में जान दे दी. एक जान नहीं दे पाया. सिर्फ दिल दे पाया. दरअसल, वकालत की पढ़ाई इतनी ज्यादा थी कि जान देने का वक्त नहीं निकल पाया. दिल देने का वक्त था तो दे दिया अलबत्ता जान न दे पाने का अफसोस अब हो रहा है.

हां, दुनिया वालों ने दोनों का इश्क नहीं समझा. जिस रोमियो ने कभी चौराहे पर लड़कियों को नहीं छेड़ा. अश्लील फब्बियां नहीं कसीं. पचास रुपए का रेबेन का चश्मा लगाकर जो कभी स्कूल-कॉलेज के बाहर मोटरसाइकिल का एस्केलेटर बढ़ाते नहीं देखा गया-उस शरीफ रोमियो का नाम मनचले आशिकों पर ऐसा चस्पां किया गया कि आज पूरे यूपी में ‘एंटी रोमियो स्कॉयड’ जगह जगह सड़कछाप आशिकों को धुन रहा है.

समाज ने काटजू साहब के साथ ऐसी नाइंसाफी की कि उनकी आंखों में पल रहे इश्क को 50 साल से ज्यादा वक्त तक नजरअंदाज किया गया. नतीजा काटजू साहब को खुद एलान-ए-मुहब्बत करना पड़ा कि हां वो प्यार करते थे. हां, वो जयललिता से प्यार करते थे.

रोमियो लुटा-पिटा-मरा-गरा तो सिर्फ जूलियट के लिए. काटजू साहब लुटे-पिटे-मरे-गिरे तो नहीं अलबत्ता आंहें बहुत भरी जयललिता के लिए.

चूंकि काटजू साहब के नाम में ही मार्के निहित है तो उनकी हर बात मार्के की होती ही है. उनका प्यार भी मार्के का रहा होगा, वरना 71 की उम्र में ऐसे उछाल न मारता.

हिन्दुस्तान में ऐसे दिलजले आशिकों की संख्या सही-सही तो नहीं बताई जा सकती, जिन्होंने इकतरफा प्यार किया. या कहें प्यार किया मगर इकरार नहीं कर पाए. लेकिन एक अनुमान के मुताबिक हिंदुस्तान की जनसंख्या में शामिल कुल पुरुषों के करीब 80 फीसदी इसी श्रेणी में आते हैं. इन आशिकों का प्रेम इतना पवित्र होता है कि लड़की को ताउम्र पता नहीं चलता कि इन्होंने उसके लिए क्या किया.

मसलन-कुछ इकतरफा प्रेम करने वाले समस्त कॉलेज लाइफ के दौरान लड़की के अदृश्य और अनपेड अंगरक्षक की भूमिका निभाते हैं, मगर लड़की को पता तक नहीं चलने देते. कुछ इकतरफा प्रेम करने वाले लड़की के अन्य बॉयफ्रेंड की ठुकाई-पिटाई कर लड़की को बुरी नजर से बचाते हैं.

काटजू साहब भी इसी श्रेणी के आशिक हैं. दिलजले आशिक.

justice Markandey katju

यह अलग बात है कि जिन दिनों काटजू साहब को मुहब्बत हुई, जयललिता एमजीआर के संरक्षण में पहुंच गई थीं और काटजू साहब एमजीआर से पंगा ले नहीं सकते थे तो उन्हें अपनी मुहब्बत का गला घोंटना पड़ा.

सच्चा इश्क और सच्ची रिश्वत किसी चश्मदीद के मोहताज नहीं होते. तो भले लोगों ने उस वक्त देखा नहीं लेकिन सच यही है कि काटजू साहब को मुहब्बत हुई थी. मुहब्बत का कोई वीआरएस प्लान नहीं होता. इश्क की कोई रिटायरमेंट उम्र नहीं होती.

पढ़ें: मारकण्डेय काटजू का दिल जयललिता पर आ गया था

और जयललिता अगर जीवित होतीं तो प्रेमी समुदाय ये भी कह सकता था कि जब जागे तब सवेरा. टीवी चैनलों पर कुछ ज्योतिषी या पंडित बैठाकर इस तरह की बहस भी हो सकती थी कि क्या जयललिता की कुंडली में शादी का योग किसी जज से है? क्या जलललिता का विवाह इसलिए नहीं हुआ? क्या अमर प्रेम करने वाले मरने के बाद मिलते हैं? वगैरह-वगैरह. दुर्भाग्य से जलललिता जीवित नहीं हैं और तमाम न्यूज चैनल इस तरह की संभावित बहस से चूक गए. वरना नेशन रियली वांट्स टू नो- आखिर जयललिता ने शादी क्यों नहीं की.

चूंकि जयललिता अब जीवित नहीं, इसलिए काटजू साहब का कोई विरोध भी नहीं हो रहा. वरना, अखिल भारतीय युवा प्रेमी समाज सवाल उठा सकता था कि जिन लोगों को बीमा कंपनियां बीमा नहीं दे रहीं-उन्हें लड़की प्रेम कैसे दे सकती है? और प्रेम की ‘एक्सपायरी डेट’ निकल जाने के बावजूद लोगों के प्रपोज करने पर रोक लगाई जाए. दरअसल, युवा प्रेमियों की चिंता जायज भी है.

काटजू इकलौते नहीं हैं, जिन्होंने एक्सपायरी डेट निकल जाने के बाद आशिकी की दवा खाई है. दिग्विजय सिंह भी ऐसे ही हैं. दिग्विजय जी तमाम कोशिशों के बाद कांग्रेस का उद्धार भले न कर पाए हों लेकिन प्रेम की बाजी उन्होंने पहली कुछ चालों के साथ ही जीत ली. एनडी तिवारी तो इस क्षेत्र में पितामह की हैसियत रखते हैं, और वृद्धावस्था प्रेमी पेंशन नाम की कोई योजना अगर सरकार में होती तो वह इस पेंशन को पाने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते.

राघव जी ने उम्र के उस मोड़ पर प्रेम को जीया, जिस उम्र में लोग सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर श्मशान की सुविधाओं का पता लगाते हैं. वह प्रेम को नए युग में ले गए. ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं, मैं आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं’ गीत को उन्होंने सही मायने में चरितार्थ किया.

युवा प्रेमियों की चिंता जायज है क्योंकि हिन्दुस्तान में चार लड़कों के बीच एक प्रेमिका का औसत है. यानी इस क्षेत्र में पहले से कंपटीशन बहुत है और अगर तीरथ जाने की उम्र में बुजुर्ग भी इसी फील्ड में फाइट मारेंगे तो युवा क्या करेंगे? वैसे भी बुजुर्गों के पास बाकी कुछ हो न हो, पैसा और अनुभव तो युवाओं से ज्यादा होता ही है.

खैर, काटजू साहब से युवाओं को कोई खतरा नहीं. उन्होंने जिससे प्रेम किया-वो अब इस दुनिया में नहीं है. काटजू साहब अब चाहें तो ‘उस दुनिया’ में मिलने की दुआ कर सकते हैं.

यूं ग़ालिब ने कहा है-

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के

मजे की बात ये कि काटजू साहब को जिस उम्र में इश्क की याद सताई है, उसमें उन्हें निकम्मे होने का डर भी नहीं.

पढ़िए काटजू का पोस्ट

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