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असहमति सजीव लोकतंत्र का प्रतीक है : न्यायमूर्ति चंद्रचूड़

जस्टिस चंद्रचूड़ ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए एम खानविल्कर के बहुमत के फैसले से असहमति जताते हुए अपने अल्पमत के फैसले में कहा कि सत्ता में बैठे लोगों को रास न आने वाले मुद्दे उठाने वाला व्यक्ति भी संविधान के तहत प्रदत्त स्वतंत्रता का हकदार है

Updated On: Sep 28, 2018 10:12 PM IST

Bhasha

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असहमति सजीव लोकतंत्र का प्रतीक है : न्यायमूर्ति चंद्रचूड़

कोरेगांव-भीमा हिंसा मामले में अपने असहमति वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने शुक्रवार को कहा कि असहमति ‘सजीव लोकतंत्र’ का प्रतीक है और अलोकप्रिय मुद्दे उठाने वाले विपक्ष की आवाज को सताकर दबाया नहीं जा सकता.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए एम खानविल्कर के बहुमत के फैसले से असहमति जताते हुए अपने अल्पमत के फैसले में कहा कि सत्ता में बैठे लोगों को रास न आने वाले मुद्दे उठाने वाला व्यक्ति भी संविधान के तहत प्रदत्त स्वतंत्रता का हकदार है.

हालांकि, उन्होंने साफ कर दिया कि जब असहमति की अभिव्यक्ति हिंसा को उकसाने या गैर कानूनी साधनों का सहारा लेकर लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार का तख्तापलट करने के ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’ में प्रवेश करती है तो असहमति ‘महज विचारों की अभिव्यक्ति नहीं रह जाती.’

हाई कोर्ट ने शुक्रवार को कोरेगांव-भीमा हिंसा मामले में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के मामले में हस्तक्षेप करने और उनकी गिरफ्तारी की जांच के लिए एसआईटी गठित करने से इंकार कर दिया.

SIT गठन अनिवार्य:

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन अवश्य किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अदालतें निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए ‘प्रहरी’ के तौर पर काम करती हैं क्योंकि विधि के शासन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह महत्वपूर्ण है.

प्रतीकात्मक

प्रतीकात्मक

गिरफ्तार आरोपी प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रच रहे थे इस बारे में पुणे पुलिस के आरोपों को ‘गंभीर’ बताते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि इस पहलू पर ‘जिम्मेदारी से ध्यान’ दिए जाने की जरूरत है और पुलिस अधिकारी मीडिया से बातचीत में इस बारे में विस्तार से बात नहीं कर सकते.

उन्होंने 43 पन्नों के अपने फैसले में कहा, ‘असहमति सजीव लोकतंत्र का प्रतीक है. अलोकप्रिय मुद्दों को उठाने वाले विपक्ष की आवाज को सताकर दबाया नहीं जा सकता. हालांकि, जहां असहमति की अभिव्यक्ति हिंसा को उकसाने या गैर कानूनी साधनों का सहारा लेकर लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार का तख्तापलट करने के ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’ में प्रवेश करती है तो असहमति महज विचारों की अभिव्यक्ति नहीं रह जाती.’’

उन्होंने कहा कि ‘कानून का उल्लंघन करने वाली गैर कानूनी गतिविधियों से उसी अनुसार निपटा जाना चाहिये.’

उन्होंने कहा कि फैसले में उनकी ओर से दिए गए निर्देशों का उद्देश्य हर नागरिक जो आपराधिक मामले का सामना कर रहा है उसके बुनियादी हकों को सुनिश्चित करना है कि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘यह अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार) के तहत मनमानेपन के खिलाफ गारंटी का अभिन्न हिस्सा है. अगर यह अदालत अपने सिद्धांतों के पक्ष में खड़ी नहीं होती है तो हम स्वतंत्रता का शोकगीत देख सकते हैं.’

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