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जजों को रिश्वत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने SIT जांच की मांग खारिज की

शीर्ष अदालत ने कहा कि जिस तरीके से याचिकाएं दायर की गईं और उन पर जिरह हुईं उनसे पिछले कुछ दिनों में पूरी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई

Bhasha Updated On: Nov 14, 2017 10:24 PM IST

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जजों को रिश्वत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने SIT जांच की मांग खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों के नाम पर कथित रूप से रिश्वत मांगने के मामले में एसआईटी जांच की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए इसे ‘पूरी तरह अपमानजनक’ बताया.

इसने बिना किसी कारण के संस्थान को बदनाम करने के उद्देश्य से याचिका दायर करने के लिए वकीलों की भी निंदा की.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ आरोप लगाया गया और न्यायपालिका में ‘दरार पैदा करने’ के लिए याचिका दायर की गई. इसने कहा कि पीठ से एक न्यायाधीश को हटाने की मांग कर ‘फोरम को भी शिकार’ बनाने का प्रयास किया गया है जो अदालत की अवमानना है.

सुप्रीम कोर्ट ने वकील कामिनी जायसवाल की याचिका को खारिज करते हुए असंतोष जताया कि वरिष्ठ वकील शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने व्यवस्था और प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ ‘निराधार आरोप’ लगाए.

न्यायमूर्ति आर के अग्रवाल, न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की पीठ ने मामले में एक न्यायाधीश को सुनवाई से हटाने के लिए प्रयास करने पर भी प्रतिकूल टिप्पणी की और कहा, ‘हमने पाया कि व्यवस्था को बदनाम करने का यह एक और प्रयास है. अवांछित आक्षेप लगाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से चोट पहुंचाना है.’

याचिका में दावा किया गया था कि मेडिकल कॉलेज से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए रिश्वत लेने के आरोप लगाए गए थे जिसमें ओडिशा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश इशरत मसरूर कुदुशी भी आरोपी हैं.

शीर्ष अदालत ने कहा कि जिस तरीके से याचिकाएं दायर की गईं और उन पर जिरह हुईं उनसे पिछले कुछ दिनों में पूरी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई.

दायर याचिकाएं अपमानजनक थीं

पीठ ने कहा, ‘इस अदालत में दरार पैदा करने का प्रयास किया गया. नाहक गंभीर और अवांछित संदेह पैदा किए गए और जो याचिकाएं दायर की गईं वे अपमानजनक थीं और इस तरह से दायर नहीं की जानी चाहिए थीं. यह कानून के मानक के खिलाफ है.’ इसने कहा कि व्यवस्था और वह भी सीजेआई के खिलाफ ‘नाहक आरोप’ नहीं लगाए जाने चाहिए थे.

शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का यह कहना कि सीजेआई दीपक मिश्रा को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए या इसे प्रशासनिक पक्ष को नहीं देना चाहिए, ‘काफी अनुचित’ था और ‘यह कहकर फोरम चुनने का प्रयास था कि भारत के प्रधान न्यायाधीश को पीठ का गठन नहीं करना चाहिए.’

पीठ ने अपने 38 पन्ने के आदेश में कहा, ‘एक और निराशाजनक बात है जो स्थिति बिगाड़ने का काम करता है कि हममें से एक न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर को मामले से खुद को हटा लेना चाहिए. यह कुछ और नहीं फोरम का शिकार करने का प्रयास है जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती.’

याचिकाकर्ता ने न्यायमूर्ति खानविलकर को मामले से हटने की मांग करते हुए कहा था कि उन्होंने मेडिकल कॉलेज से जुड़े मामले पर निर्णय किया था जिस बारे में सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज की थी.

पीठ ने कहा कि इस तरह की चीजों की उपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि यह भारतीय न्यायिक व्यवस्था के लिए ‘सबसे दुखद दिन’ है कि निराधार आरोपों और सामग्रियों पर ऐसे पहलुओं को नजरअंदाज करें.

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