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जज लोया केस की सुनवाई कर रहे जस्टिस अरुण मिश्रा की काबिलियत कम नहीं

साल के अंत तक जस्टिस मिश्रा चार पायदान ऊपर चढ़कर छठे सबसे वरिष्ठ जज बन जाएंगे. उनसे सीनियर चार जज इस साल रिटायर हो रहे हैं

Updated On: Jan 16, 2018 01:01 PM IST

Sanjay Singh

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जज लोया केस की सुनवाई कर रहे जस्टिस अरुण मिश्रा की काबिलियत कम नहीं

शुक्रवार से ही जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने स्थापित परंपरा के खिलाफ जाते हुए अपनी शिकायतें रखने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस की, यह कहा जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआई) दीपक मिश्रा के जज बी एच लोया की मृत्यु के मामले को सुनवाई के लिए एक अपेक्षाकृत जूनियर जज को सौंपना इस घटनाक्रम की मुख्य वजह थी.

हालांकि, जज लोया के केस का जिक्र उस पत्र में नहीं था जिसे सीजेआई के बाद चार वरिष्ठतम जजों जे चेलामेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसफ ने सीजेआई को लिखा था. हालांकि, प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जस्टिस गोगोई ने लोया केस को इसकी वजह होने से संबंधित सवाल पर हां में जवाब दिया. इसके बाद से न्यूज चैनलों, वेबसाइट्स और अखबारों ने लोया मामले पर काफी ऊर्जा लगाई.

कांग्रेस, सीपीआई, मीडिया के एक तबके और विरोध का स्वर मुखर करने वाले चारों जजों के साथ समर्थन जताने वाले वकीलों ने जिस तरह से इस पूरी बहस को शक्ल दी, उससे यह लगा कि लोकतांत्रिक राजनीति और स्वतंत्र न्यायपालिका इस बात पर टिकी हुई है कि सर्वोच्च अदालत में किस वरिष्ठता वाली कौन सी बेंच लोया का केस सुनेगी. आश्चर्यजनक तौर पर लोया की मृत्यु का केस ऐसा है जिसमें अभी तक कोई केस नहीं है. इस मामले में केवल कारवां मैगजीन का छापा गया एक आर्टिकल ही ऐसा है जो कि उनकी मृत्यु को संदेहास्पद बता रहा है.

बेटे ने बताया नैचुरल डेथ

इस मामले में एक अनोखी स्थिति तब पैदा हो गई जब स्वर्गीय जज लोया के 21 साल के बेटे अनुज लोया ने कहा कि उनके पिता की मौत के पीछे कोई षड्यंत्र नहीं है. जज लोया की मृत्यु 1 दिसंबर 2014 को हार्ट अटैक से हो गई थी. लेकिन, समाज के अलग-अलग तबकों के प्रभावशाली लोग लोया के बेटे की बात मानने को राजी नहीं हैं और चाहते हैं कि बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में एक जांच का आदेश दें.

रविवार को अनुज लोया ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा, ‘पिछले कुछ दिनों से मीडिया रिपोर्ट्स के चलते, हमारे परिवार को काफी परेशानी हो रही है. हमारा किसी पर कोई आरोप नहीं है. हम वास्तव में काफी दुखी हैं. हम इस सबसे बाहर निकलना चाहते हैं...मैं आप लोगों से अनुरोध करता हूं कि कृपया हमें परेशान मत कीजिए, हमारे लिए मुश्किलें पैदा मत कीजिए.’ उन्होंने पीटीआई से कहा, ‘मेरे पिता प्राकृतिक कारणों से नहीं रहे, हमारा परिवार इस बात को मानता है कि यह एक प्राकृतिक मृत्यु थी...मैंने स्पष्ट किया है कि हमें कोई संदेह नहीं है...यह एक नैचुरल डेथ थी.’

anuj loya

इससे विवाद खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस तरह के तर्क दिए गए कि अनुज ने दबाव में यह बयान दिया है, लेकिन अनुज की बुआ के जज लोया की मृत्यु को लेकर लगाए गए आरोप अब भी फेस वैल्यू पर कायम हैं. अपनी मृत्यु के तीन साल बाद जज लोया आज भी इस वजह से दिलचस्पी का विषय बने हुए हैं क्योंकि मृत्यु के समय वह सोहराबुद्दीन शेख का केस देख रहे थे. इस केस में बीजेपी प्रेसिडेंट अमित शाह एक आरोपी हैं. लोया की मृत्यु में किसी भी तरह की गड़बड़ी के ऐसे में राजनीतिक और कानूनी दुष्परिणाम हो सकते हैं.

कारवां की स्टोरी को किया गया खारिज

कारवां की स्टोरी की हेडलाइन थी, ‘एक परिवार ने अपनी चुप्पी तोड़ीः सोहराबुद्दीन केस को देख रहे जज की मृत्यु के चौंकाने वाले ब्योरे’

इस स्टोरी को बिंदुवार तरीके से और तकरीबन पूरे तौर पर क्विंट और इंडियन एक्सप्रेस की दो इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स में खारिज कर दिया गया. क्विंट की रिपोर्ट की हेडिंग थी, ‘जज लोया की मृत्युः कारवां ने गड़बड़ रिकॉर्ड, बयानों पर सवाल उठाए.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की हेडिंग थी, ‘सीबीआई जज बी एच लोया की 2014 में मृत्युः हॉस्पिटल में मौजूद दो जजों ने कहा, कुछ भी संदेहास्पद नहीं.’ यद्यपि जांच की मांग करने वाली पीआईएल को बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में फाइल किया गया है. बॉम्बे हाईकोर्ट में फाइल पीआईएल को बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने दाखिल किया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल तहसीन पूनावाला ने दाखिल की है. तहसीन सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के बहनोई हैं.

इस बात के कयास हैं कि यही मसला इन चारों जजों के अपने सीनियर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ मोर्चा खोलने की वजह था. इससे लोया की मौत से जुड़े हुए तथ्यों और परिस्थितियों, चाहे वे सामान्य हों या असामान्य हों, को बेहद अहम बना दिया है. इन्हीं के चलते सुप्रीम कोर्ट के चार जज स्थापित परंपराओं को तोड़ते हुए अपनी बात कहने के लिए मीडिया के सामने आ गए. इन जजों ने यहां तक कहा कि देश में लोकतंत्र खतरे में है. इन जजों ने चाहे अनचाहे खुद को राजनीति का शिकार बना लिया और टीवी स्टूडियो, कोर्ट रूम्स, सरकारी दफ्तरों, राजनीतिक पार्टियों के दफ्तरों और नेताओं के घरों, जॉगिंग पार्कों और चाय के स्टॉल्स पर इस मसले पर आम बहसें शुरू हो गईं. निश्चित तौर पर यह एक स्वस्थ घटनाक्रम नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों ने 11 जनवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाया था.

सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों ने 11 जनवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाया था.

गुजरे कुछ दिनों में इस बात पर काफी बहस हुई है कि किस जज में इस केस को सुनने की ज्यादा काबिलियत है. एक तर्क दिया गया कि केवल टॉप पांच जजों- या तो चीफ जस्टिस या फिर सीजेआई के खिलाफ झंडा उठाने वाले बाकी के चार जजों को ही इसकी सुनवाई करनी चाहिए. जनता इस चीज का अपने-अपने हिसाब से मतलब और नतीजे निकालने के लिए स्वतंत्र है. आश्चर्यजनक तौर पर राहुल गांधी ने भी इसकी मांग की है.

क्या काबिल नहीं है जस्टिस अरुण मिश्रा?

फिलहाल, इस केस की सुनवाई जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच कर रही है, जो कि सुप्रीम कोर्ट के 25 जजों में 10वें नंबर पर हैं. तर्क यह था कि जस्टिस अरुण मिश्रा के पास पर्याप्त वरिष्ठता और अनुभव नहीं है कि वह इस तरह के केस की सुनवाई कर सकें और चीफ जस्टिस के बतौर मास्टर ऑफ रोस्टर इस केस को उन्हें सौंपने का फैसला चुनिंदा कोर्ट की तलाश करने या बेंच फिक्सिंग का मामला है. यह नोट किया जाना चाहे कि आम लोगों की आस्था संस्थान के प्रति है न कि किसी खास जज या उसकी वरिष्ठता के प्रति. वरिष्ठता के आधार पर किसी जज की काबिलियत पर सवाल उठाना आम लोगों की सर्वोच्च अदालत के प्रति आस्था को धक्का पहुंचाने वाला है.

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट, ‘गुजरे 20 सालों में सुपर सेंसिटिव केसों को जूनियर सुप्रीम कोर्ट जजों को सौंपा गया’, में ऐसे 15 सुपर सेंसिटिव मामलों का जिक्र किया गया है. इनमें राजीव गांधी हत्या, बोफोर्स केस, बाबरी मस्जिद ध्वंस में एल के आडवाणी पर मुकदमा, सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी एनकाउंटर, बेस्ट बेकरी, बीसीसीआई, दो साल या उससे ज्यादा की सजा पाए सांसदों, विधायकों को अयोग्य घोषित करने, कोल स्कैम, राम जेठमलानी का ब्लैक मनी केस को टॉप चार वरिष्ठतम जजों को नहीं दिया गया था, बल्कि इन्हें जूनियर जजों की सेलेक्ट बेंचों को सौंपा गया था. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के वाकये जब भी हुए हैं, तब उन पर किसी भी एक्टिविस्ट लॉयर ने बेंच फिक्सिंग का आरोप नहीं लगाया.

आइए नजर डालते हैं कि जस्टिस अरुण मिश्रा बाकी चार वरिष्ठतम जजों से कितने जूनियर हैं (अगर वरिष्ठता मामलों की सुनवाई के लिए मानक है). देखते हैं कि चौथे वरिष्ठतम जज कुरियन जोसफ के मुकाबले उनकी वरिष्ठता कितनी है. कुरियन जोसफ भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले चार जजों में शामिल थे.

जस्टिस कुरियन जोसफ ने सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर 3 मार्च 2013 को पदभार संभाला और वह 29 नवंबर 2018 को रिटायर हो जाएंगे. वहीं जस्टिस अरुण मिश्रा 7 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने और वह 2 सितंबर 2020 को रिटायर होंगे. निश्चित तौर पर वह इतने ज्यादा जूनियर जज नहीं हैं. जस्टिस अरुण मिश्रा राजस्थान और कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं.

साल के अंत तक जस्टिस मिश्रा चार पायदान ऊपर चढ़कर छठे सबसे वरिष्ठ जज बन जाएंगे. उनसे सीनियर चार जज इस साल रिटायर हो रहे हैं और अगले साल वह चार सीनियर मोस्ट जजों की लीग में शामिल हो जाएंगे क्योंकि उनसे सीनियर दो और जज रिटायर हो जाएंगे. इससे क्या यह तर्क बनता है कि अगले साल वह इस केस की सुनवाई करने की काबिलियत हासिल कर जाएंगे, जो कि फिलहाल नहीं है?

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