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JNU छात्रसंघ चुनाव में राजनीतिक पार्टियों की दिलचस्पी क्यों बढ़ रही है?

देश की सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां यहां के छात्रसंघ चुनावों में ऐसे रुचि लेती हैं जैसे कि यही देश का मुस्तकबिल तय करेगा!

Updated On: Sep 13, 2018 07:19 AM IST

Saqib Salim

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JNU छात्रसंघ चुनाव में राजनीतिक पार्टियों की दिलचस्पी क्यों बढ़ रही है?

भारतीय राजनीति में क्या कुछ गलत है ये जानने के लिए आपको ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, बस इतना है कि आप जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, यानि जेएनयू के छात्र-संघ चुनावों को ध्यान से देख लीजिये. देश की सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां यहां के छात्रसंघ चुनावों में ऐसे रुचि लेती हैं जैसे कि यही देश का मुस्तकबिल तय करेगा! आखिर ऐसा क्यों है कि ये पार्टियां आम लोगों के बीच गली-मोहल्लों में न जा कर भारत की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में अपना समय लगाती हैं. ऐसा नहीं है कि इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी से पढ़ने के बाद किसी को सामाजिक उत्थान की जरूरत हो. उल्टा यहां से उच्च शिक्षा हासिल करने वाले छात्र ही देश के विकास में भूमिका निभा सकते हैं.

बहुजन समाज पार्टी के जनक कांशीराम ने कभी अपनी पार्टी का छात्र संगठन नहीं बनाया. उनका मानना था कि इस देश का असली पिछड़ा वो है जो कि स्कूल तक भी नहीं जा पाता. वो मानते थे कि जिस देश में एक बड़ी आबादी अनपढ़ है और एक बड़ा हिस्सा आबादी का भूखे पेट सोने को मजबूर है उस देश में कॉलेज या यूनिवर्सिटी में जिनका दाखिला होता है वे खुद सामाजिक दृष्टि से अगडे़ होते हैं.

Kanshiram

ऐसे में ये मानना कि समाज उनके लिए लड़ेगा बेईमानी है, इसके उलट होना ये चाहिए कि जिस समाज से वो आगे बढ़ कर शिक्षा के गलियारों तक आये हैं अब वो, उस समाज के उत्थान के लिए कार्य करें. तो ऐसे में राजनीतिक पार्टियां अपना समय और धन यूनिवर्सिटी और कॉलेज पर खर्च न कर के आम पिछड़े देशवासियों पर खर्च करें.

पर असल में इस देश में हो क्या रहा है, हमारे राजनीतिक दल आखिर कर क्या रहे हैं ? अभी जेएनयू में छात्र संघ चुनाव होने वाले हैं, जिसकी तैयारियां जोरों शोरो पर हैं. सभी पार्टियों की चाहत है कि वे यहां वर्चस्व हासिल कर सकें. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जो कि बीजेपी और संघ का छात्र संगठन है.

अपने चुनावी कार्यक्रमों में बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं को बुलाता है. अभी हाल ही में एक हॉस्टल मेस के छोटे से कार्यक्रम में उन्होंने तीन प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को वक्ता के रूप में बुलाया था. 28 अगस्त को हुए इस कार्यक्रम में असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने भाग लिया था. एक अन्य कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो और दिल्ली बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मनोज तिवारी ने हिस्सा लिया था. कैंपस पर लेफ्ट, और अन्य पार्टियों ने इसकी खूब निंदा की कि आखिर यूनिवर्सिटी की पॉलिटिक्स में राष्ट्रीय नेताओं का क्या औचित्य है ?

निंदा करने वालों में कांग्रेस का संगठन एनएसयूआई भी शामिल थी. अब विडंबना ये देखिये कि उनके खुद के चुनावी प्रोग्राम में कांग्रेस के दिग्गज नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्रियों ने शिरकत की. उनके एक कार्यक्रम में पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम शामिल हुए और दो अन्य कार्यक्रमों में क्रमशः सलमान खुर्शीद और शशि थरूर ने छात्रों को संबोधित किया. न जाने किस मुंह से ये बीजेपी पर आरोप लगा रहे हैं कि वे कैंपस पर राष्ट्रीय नेताओं को ला कर राजनीति की गरिमा गिरा रहे हैं.

दूसरी ओर अरसे से छात्रसंघ पर लेफ्ट काबिज है. उनको इन दोनों ही पार्टियों के नेताओं से परेशानी है. उनका कहना है इतने बड़े नेताओं को कैंपस की राजनीति में लाना गलत है. यहां पर वे खुद सीताराम येचुरी जो कि भारतीय लेफ्ट के सबसे प्रसिद्ध नेता हैं को भाषण के लिए बुलाते हैं. वृंदा करात और कविता कृष्णन भी आती हैं. अब इसमें किसी की क्या गलती अगर लेफ्ट के पास इससे मशहूर चेहरे नहीं हैं. यहां तक कि पहली बार चुनाव लड़ रही लालू प्रसाद यादव की छात्र राष्ट्रीय जनता दल भी मनोज झा, और संजय यादव जैसे प्रथम पंक्ति के नेताओं को भाषण के लिए बुला लाई.

यहां इन नामों को लिखने से मेरा तात्पर्य ये कतई नहीं है कि मैं कोई लिस्ट बना दूं कि कौन-कौन नेता जेएनयू आये. असल में मैं एक अहम मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं और वह है भारतीय राजनीति का नैतिक पतन. अभी चार रोज पहले राजधानी दिल्ली में ही 5 सफाई कर्मचारी बंद नाले में दम घुटने से मर गए. क्या आपने सुना कि ये सारे नेता उनके परिवारों की या उनके मुद्दों की सुध लेने गए ? थोड़ा पीछे चलिए तीन बच्चियां इस ही राजधानी में भूख से मर गयीं क्या ये नेतागण वहां तक जा पाए ?

Supreme Court

लिंचिंग का संज्ञान स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने लिया है क्या ये नेता वहां तक जा पाते हैं ? क्या ये नेता गोरखपुर, जहां अगस्त में बच्चे मरते हैं, वहां तक गए ? क्या ये नेता आम लोगों के आम मुद्दों पर जैसे महंगाई, भ्रष्टाचार आदि पर आम लोगों के बीच उनसे मिलने जाते हैं ?

क्या राजनीतिक लड़ाई पर पहला हक गरीब, पिछड़ों का नहीं होना चाहिए ? क्या मंत्रियों को, सांसदों को या विधायकों को हम इसलिए चुनते हैं कि वे यूनिवर्सिटी और कॉलेज में चुनाव प्रचार करें ? क्या इसलिए ही देश की जनता के पैसे से इनको मोटी तनख्वाह मिलती है कि ये उस पर चुनाव प्रचार करें, वो भी छात्रसंघ का और आम आदमी को भूल जाएं ?

मोटे तौर पर देखा जाए तो इसके दो प्रमुख कारण नजर आते हैं. पहला तो ये कि शूरु से ही जेएनयू बुद्धिजीवियों का गढ़ भी रहा है और एक तरीके से उनको तैयार करने वाली फैक्ट्री के रूप में भी काम करता है. यहां से पढ़े छात्र आगे चल कर मीडिया, फिल्म,लेखन, अकादमिक करियर और सिविल सेवा आदि के क्षेत्र में बड़ा योगदान देते हैं.

ये वो क्षेत्र हैं जहां से कि लोगों की सोच पर असर पड़ता है. आज जब चारों ओर मीडिया, फिल्म आदि के बिकाऊ होने की बात होती है तो ये याद रखना चाहिए कि इन सब को खरीदने से आसान और कारगर है कि उनको छात्र जीवन के दौरान ही अपनी विचारधारा में ढाल लिया जाए. ये भी एक कारण रहा है कि शुरू से ही जेएनयू पर सभी पार्टियों का जोर रहा है ताकि वे देश के युवा बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी ओर खींच सकें. जेएनयू में इस कारण से सदैव से ही बड़े नेताओं की नजर रहती है.

दूसरा एक और कारण 2016 से शुरू हुआ है और वह है कि ये सब लोगों का मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए किया जाता है. अगर ये भ्रष्टाचार की या महंगाई की बात करेंगे तो सब एक थाली के चट्टे-बट्टे नजर आएंगे. इसलिए मुद्दे बनाये जाते हैं. पहले आप देखते थे कि 80 के दशक से 2010 तक देश में राम मंदिर मुद्दा था. अब एक नया मुद्दा बना है जेएनयू और उसका ‘भारत के टुकड़े होंगे गैंग’. आप सरकार से सवाल कीजिये तो आपसे पूछा जायेगा जेएनयू से हो क्या ? आप विपक्ष से पूछिए तो वो जेएनयू को आजादी दिला देंगे!

kanhaiya_jnu

भई आपका काम है देश चलाना, हम इसलिए वोट देते हैं. आप पेट्रोल पर ध्यान दीजिये, कीमतों पर ध्यान दीजिये, रोजगार दीजिये और देश की सुरक्षा का ध्यान रखिये. यकीन जानिये जेएनयू हो या कोई और कैंपस कहीं के भी छात्र को इस से अधिक आजादी नहीं चाहिए. छात्र भी समाज का हिस्सा है. वो पढ़ रहा है कि उसको रोजगार मिले, वो चैन से जी सके और आप क्या चाहते हैं ? आप चाहते हैं कि हम बस कैंपस की राजनीति में उलझे रहें. नेताओं से ये प्रार्थना है कि देश की जनता ने उनको वोट जनसेवा के लिए दिया है और इसके लिए ही उनको वेतन मिलता है, कृपा कर के वे अपने कर्तव्यों पर ध्यान दें.

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