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JNU की जंग: लापता नजीब के सहारे चुनावी नैया पार करने की कवायद

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में इस बार अगर सबसे प्रमुख मुद्दा कोई है तो वह लापता छात्र नजीब अहमद का है

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Sep 07, 2017 11:30 AM IST

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JNU की जंग: लापता नजीब के सहारे चुनावी नैया पार करने की कवायद

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में अगर सबसे प्रमुख मुद्दा कोई है तो वह लापता छात्र नजीब अहमद का है. जेएनयू का छात्र नजीब पिछले साल अक्टूबर से ही लापता है. दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई तक नजीब के मामले में अभी तक खाली हैं.

पिछले साल अक्टूबर में एबीवीपी के कुछ कार्यकर्ताओं से माही-मांडवी हॉस्टल में हुए मारपीट के बाद से नजीब गायब है. उस वक्त नजीब अहमद के साथ मारपीट करने को लेकर लंबी प्रॉक्टोरियल जांच के बाद एबीवीपी के कई कार्यकर्ताओं को सजा सुनाई गई थी. इस दौरान प्रशासन पर नजीब के साथ मारपीट करने वाले छात्रों को बचाने का भी आरोप लगा. इस मामले की आतंरिक जांच के दौरान जांच अधिकारी ने प्रॉक्टर पद से इस्तीफा भी दिया था.

वैसे तो जेएनयू चुनावों में कोई भी पार्टी सीधे-सीधे जातीय या धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर वोट मांगने से बचती है क्योंकि ऐसा करना उनके लिए ज्यादा नुकसानदेह ही साबित होता है. जेएनयू कल्चर का यह अंग रहा है कि आम छात्र ऐसा करने वाली पार्टियों के खिलाफ बहुत जोर-शोर से मुखर होते हैं. अगर आम छात्र किसी पार्टी के खिलाफ खुलकर बोलने लगे तो फिर उस पार्टी के लिए चुनाव जीतना नामुमकिन ही हो जाता है.

नजीब मामले में 'दोषी' चुनावी मैदान में  

लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है. आरएसएस की छात्र इकाई एबीवीपी इस बार नजीब के मुद्दे पर लेफ्ट पार्टियों से सीधे मुठभेड़ लेने की मुद्रा में है. नजीब के गायब होने के बाद जहां एबीवीपी ने इसे लेफ्ट की साजिश कहकर इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी, वहीं इस चुनाव में उसने एक ऐसे उम्मीदवार को उतारा है जिसे नजीब अहमद पर हमले के आरोप में दोषी ठहराया गया था.

एबीवीपी ने स्कूल ऑफ लैंग्वेज लिटरेचर एंड कल्चरल स्टडीज से से अंकित रॉय नामक एक छात्र को काउंसलर पद के लिए उतारा है. अंकित को नजीब के साथ मारपीट करने के आरोप में जेएनयू के प्रॉक्टर ऑफिस द्वारा हॉस्टल ट्रांसफर की 'सजा' सुनाई जा चुकी है.

वैसे किसी भी सजायाफ्ता के छात्रसंघ चुनाव लड़ने पर लिंगदोह कमेटी के मुताबिक रोक लगी हुई है, फिर भी एबीवीपी ने अंकित को खड़ा करने का जोखिम उठाया है. अंकित के नामांकन को खारिज करने की अर्जी अन्य दलों ने चुनाव के लिए बनी ‘ग्रीवांस रिड्रेसल सेल’ में भी दी है. बहुत संभव है कि अंकित का नामांकन वोटिंग से पहले या बाद में खारिज भी हो जाए.

वैसे एबीवीपी अंकित रॉय के हॉस्टल ट्रांसफर को 'सजा' के तौर पर नहीं देख रही है.

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एबीवीपी का मशाल जुलूस

 खुलकर वैचारिक लड़ाई के मूड में एबीवीपी 

फिर भी यह सवाल है कि एबीवीपी ऐसा जोखिम क्यों ले रही है, जबकि यह बात सभी को पता है कि किसी उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने से आप चुनाव से पहले ही वो सीट जाते हैं. दरअसल जिस स्कूल से अंकित खड़े हैं वहां मुस्लिम छात्रों की संख्या काफी अधिक है और अंकित को खड़ा करने वाला एबीवीपी 'अप्रत्यक्ष ढंग' से इसे धार्मिक रंग देने की कोशिश कर रहा है. अंकित का नामांकन खारिज होने की भी स्थिति में एबीवीपी इसे तूल जरूर देगा.

नजीब के गायब होने के बाद भी एबीवीपी के समर्थकों ने यह कहा था कि नजीब ने एक ‘हिंदू प्रतीक’ के खिलाफ कुछ कहा था.

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जेएनयू जैसे सुरक्षित माने जाने वाले कैंपस से नजीब का गायब होना एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा है. इस वजह से निवर्तमान जेएनयू छात्रसंघ भी कई संगठनों के निशाने पर है. पिछली बार लेफ्ट यूनिटी यूनियन में थी. इस वजह से लेफ्ट यूनिटी के खिलाफ लड़ रहे अन्य दल नजीब मामले पर लेफ्ट को घेरने की कोशिश में लगे हैं. वहीं लेफ्ट यूनिटी नजीब मामले को लेकर सीधे-सीधे एबीवीपी, जेएनयू प्रशासन और केंद्र सरकार को निशाना बना रही है.

बहरहाल जो भी हो एबीवीपी द्वारा अंकित को खड़ा करने से नजीब का मुद्दा इस चुनाव में अन्य मुद्दों पर भारी पड़ रहा है. एबीवीपी जेएनयू में अभी तक ‘साफ्ट हिंदुत्व’ की लाइन पर ही चलना पसंद करती थी लेकिन इस चुनाव में अंकित रॉय के खड़ा होने से यह माना जा रहा है कि एबीवीपी ने जेएनयू के भीतर भी सीधी वैचारिक लड़ाई का मोर्चा खोल दिया है.

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