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जेएनयू: वामदलों के घड़ियाली आंसुओं में डूबा ‘नजीब कहां है’

पूरे मामले में आईसा-एसएफआई भी एबीवीपी जितने ही दोषी हैं

Updated On: May 02, 2017 10:30 AM IST

Saqib Salim, Sharjeel

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जेएनयू: वामदलों के घड़ियाली आंसुओं में डूबा ‘नजीब कहां है’

बायोटेक्नोलॉजी (जैव-प्रौद्योगिकी) के प्रथम वर्ष के परास्नातक छात्र नजीब अहमद को जेएनयू के आवासीय परिसर के माही छात्रावास से गायब हुए 6 महीने से अधिक समय बीत चुका है. गायब होने की पिछली रात को कुछ छात्रों के बीच कथित तौर पर एक झड़प हुई जिसके बाद नजीब को कुछ छात्रों ने पीटा. अगली सुबह वह गायब हो गया.

उसके गायब होने के बाद आईसा-एसएफआई नीत जेएनयूएसयू ने घटना का जो विवरण दिया उसके अनुसार 'नजीब को एबीवीपी के गुंडों की सांप्रदायिक भीड़ ने मुसलमान होने के कारण ‘लिंच’ किया (पीटा).'

वारदात के इस ब्यौरे के मुताबिक घटना के तीन चरण हैं: तथाकथित झड़प, भीड़ द्वारा पिटाई और नजीब का गायब होना.

भीड़ द्वारा हिंसात्मक गतिविधि के दौरान ही जेएनयूएसयू के अध्यक्ष मोहित पांडे घटनास्थल पर पहुंच गए और उनका दावा है कि उन्होंने हमलावरों को रोकने की कोशिश की. इस सर्वप्रचलित विवरण के अनुसार आईसा-एसएफआई के नेतृत्व वाली यूनियन हिंसा को रोकने का प्रयास कर रही थी. इस विवरण से आईसा-एसएफआई खुद को कैंपस में दबे-कुचले मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए संघर्षरत नायकों के रूप में प्रदर्शित करते हैं.

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कहानी में कुछ काला है

घटना के तथ्यों पर एक सरसरी निगाह डाली जाए तो पता चलता है कि आईसा-एसएफआई नीत जेएनयूएसयू की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में इसके ठीक उलट थी और वे भी कम से कम एबीवीपी जितने ही दोषी हैं, बल्कि कहा जा सकता है कि उनका दोष एबीवीपी से अधिक ही है. सच्चाई तो यह है कि उन्होंने अपनी संदेहास्पद भूमिका को छुपाने के लिए ही नजीब के गायब होने के बाद का घटना का अपना ब्योरा पूरी तरह से बदल दिया.

पहली बात तो यह है कि उनके द्वारा ‘लिंचिंग’ शब्द का प्रयोग स्वयं में ही भय फैलाने की श्रेणी में आता है जिससे कि सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिलता है और परिणामस्वरुप मुस्लिम समुदाय का ही नुकसान होता है. शब्दकोश में अंग्रेजी के इस शब्द का अर्थ 'किसी कथित अपराध के लिए आरोपी की बिना कानूनी सुनवाई के हत्या- विशेष तौर पर फांसी द्वारा' बताया जाता है. नजीब का गायब होना किसी भी प्रकार से 'लिंचिंग' का मामला तो नहीं ही कहा जा सकता है.

कहानी में दूसरी विसंगति इस बात से संबंधित है कि मोहित पांडे के घटनास्थल पर पहुंचने के बाद भी नजीब को दोबारा पीटा गया था. प्रश्न है कि यदि भीड़ नजीब पर बुरी तरह हिंसक हमले कर रही थी तो मोहित और उनके समर्थकों ने इस हिंसा को क्यों नहीं रोका? अगर उन्होंने प्रयास किया किंतु विफल रहे तो वे भी बुरी तरह क्यों नहीं पीटे गए? यदि वोटों में एक बड़े अंतर से चुनाव जीतने के एक महीने बाद ही मोहित कैंपस के सबसे बड़े संगठन से दो कार्यकर्ताओं को भी अपने समर्थन में नहीं जुटा पाए तो क्या उन्हें अपने पद से फौरन इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए?

क्या ऐसा हो सकता है कि छात्रावास के जिस विंग में रहने वाले अधिकतर छात्र मुसलमान हों, वहां एक मुस्लिम छात्र को कुछ मुस्लिम विरोधी लोग उसकी मुस्लिम आस्था के कारण बुरी तरह पीटें और विरोध में कोई बड़ा टकराव न हो?

आइए हम जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों द्वारा घटना की रात को दिए गए फौरी बयानों पर एक नजर डालते हैं-

पहली बात तो यह है कि उन सभी बयानों में जिन पर मोहित पांडे ने घटना की रात हस्ताक्षर किए यह कहा गया है कि ‘नजीब ने बिना किसी उकसावे के दो गवाहों के सामने विक्रांत को थप्पड़ मारा.' आज जो तथ्य साबित हो चुका है कि नजीब को छात्रों के एक दल द्वारा पीटा गया था, वह इन बयानों से पूरी तरह गायब है. नजीब के रूममेट कासिम दरगाही, जो कि स्वयं आइसा के एक नेता और जेएनयूएसयू के पदाधिकारी भी हैं, ने उस रात जो बयान दिया वह और भी दिलचस्प है. अपने पत्र में वह वार्डन को सूचित करते हैं कि नजीब से उनकी जान-पहचान और बातचीत सीमित ही थी क्योंकि नजीब हॉस्टल में कुछ ही दिन पहले आया था.

आश्चर्य है कि इस सीमित जान-पहचान के बाद भी कासिम ने अपने बयान में कहा है कि ‘नजीब का मानसिक तौर पर असंतुलित होने का दावा गलत है’. आगे वे कहते हैं कि ‘घटना की रात नजीब के अजीबोगरीब व्यवहार से वे खुद भी असुरक्षित महसूस कर रहे थे’. कासिम भी उस रात के अपने बयान में इस बात का उल्लेख करने से चूक गए कि पीटा नजीब को गया था. साफ है कि कासिम और मोहित दोनों ही वार्डन के सामने नजीब का पक्ष नहीं रख रहे थे और दरअसल उसके विरुद्ध ही बयान दे रहे थे. इसके बाद नजीब को 6 दिनों में हॉस्टल से निकल जाने का आदेश दिया गया.

पहले दोषी, फिर पीड़ित बना नजीब

जेएनयूएसयू के यह दोनों पदाधिकारी घटना की रात केवल और केवल नजीब को ही हिंसा के लिए दोषी ठहरा रहे थे लेकिन बाद में यह एक दूसरे अवतार में नजर आते हैं जिसमें कि वे नजीब के लिये न्याय के योद्धा के रूप में खुद को पेश करते हैं. घटना की रात वह इस महत्वपूर्ण तथ्य को गोल कर गए कि उस हिंसा का वास्तविक पीड़ित नजीब था. सच्चाई तो यह है कि यदि नजीब गायब न हुआ होता तो इन लोगों को भीड़ द्वारा एक मुस्लिम छात्र की ‘लिंचिंग’ कहकर इस पूरे मुद्दे का सांप्रदायीकरण करने की कोई आवश्यकता न महसूस होती.

जेएनयूएसयू का पाखंड उनके 23 अक्टूबर के पर्चे में भी साफ नजर आता है जिसमें कि वे कुलपति पर खुद यही आरोप लगाते हैं. इस पर्चे में वे लिखते हैं कि विश्वविद्यालय के प्रशासन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में नजीब पर हुए हमले का कोई उल्लेख नहीं किया गया है और प्रशासन नजीब को मुख्य आरोपी दिखाने का प्रयास कर रहा है. यह दोनों ही आरोप मोहित और कासिम पर भी सही बैठते हैं. जेएनयूएसयू के इस पर्चे में वह इस बात को गोल कर जाते हैं कि प्रशासन की अवस्थिति स्वयं मोहित और कासिम के लिखित बयानों पर आधारित है और वह तो महज़ उस बात को दोहरा रहा है जो इन्होंने उस रात लिखी थी.

जेएनयूएसयू के इस यू-टर्न को देखने के बाद अब इस बात पर भी कोई आश्चर्य नहीं होता कि उन्होंने उसी रात कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई और न ही उन्होंने किसी चिकित्सीय-रपट में दिलचस्पी दिखाई. वो तो गायब होने के बाद मोहित के नेतृत्व वाली जेएनयूएसयू के लिए नजीब ‘मुख्य आरोपी’ से ‘एकमात्र पीड़ित’ में तब्दील हो गया.

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मोहित पाण्डेय और कासिम के हस्ताक्षर किए बयान.

यद्यपि जेएनयूएसयू की अग्रणी वकीलों और कानूनी राय तक आसानी से पहुंच है फिर भी वह कानूनी कार्यवाही के मोर्चे पर भी पीड़ित का पक्ष लेने से चूक गए.

पहली बात तो यह कि जेएनयूएसयू इस घटना में शामिल कोई पक्ष नहीं है. सच्चाई तो यह है की एक महीने तक कोई 'हीबियस कॉर्पस याचिका’ नहीं डाली गई. नजीब 15 अक्टूबर को गायब हुआ था और इस घटना के राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बन जाने के बाद 7 नवंबर को जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने फेसबुक पर जेएनयूएसयू के नेताओं को टैग करके उनसे ऐसी याचिका दायर करने को कहा और इस मामले में सहायता की पेशकश भी की.

ताज्जुब है कि 22 दिनों तक जेएनयूएसयू को यह विचार भी नहीं आया. आखिरकार, न्यायमूर्ति काटजू के सुझाव की मीडिया में व्यापक रिपोर्ट के बाद 14 नवंबर को नजीब की मां फातिमा नफीस ने ही यह याचिका डाली.

इस सब से यह तो स्पष्ट है कि या तो आईसा-एसएफआई नीत जेएनयूएसयू निहायत ही नालायक और पूरी तरह अक्षम है - या फिर उसका इरादा ही इस पूरे मामले का राजनीतिकरण करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का था.

हमें उम्मीद भी है और विश्वास भी कि इन पार्टियों के वाक-पटु नेता अक्षम तो नहीं हैं इसलिए हम निष्कर्ष निकालते हैं कि एआईएसए-एसएफआई के नेतृत्व में जेएनयूएसयूद्वारा चलाया गया यह पूरा अभियान वास्तव में गलत जानकारी फैला कर अपना खुद का चेहरा बचाने का एक प्रयास है. इस मामले का सांप्रदायीकरण करके और सांप्रदायिक भावना से भड़की हुई एबीवीपी की भीड़ के बारे में अनर्गल प्रचार करके वह इस घटना में उनकी खुद की निंदनीय भूमिका को छिपाना चाहते हैं.

दूसरी ओर एबीवीपी ने आदत के मुताबिक अपनी मुस्लिम विरोधी कट्टरता यह दावा करके दिखाई है कि ‘नजीब आईएसआईएस में शामिल होना चाहता था.'

नजीब के मुद्दे पर आंदोलन कैंपस-परिसर में भी सीमित ही है. अधिकतर विरोध-सभाओं का नेतृत्व स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाइजेशन, मुस्लिम स्टूडेंट फेडरेशन और अन्य मुस्लिम संगठनों ने ही किया है. आईसा-एसएफआई ने इनमें केवल नाम-मात्र उपस्थिति ही दर्ज कराई है.

जरा इसकी तुलना कन्हैया की गिरफ्तारी से कीजिए जबकि परिसर के अंदर और बाहर दोनों ही जगह व्यापक आक्रोश-प्रदर्शन का माहौल था. कन्हैया एक राजनीतिक कैदी थे और नजीब की तरह जीवन मृत्यु के प्रश्न से नहीं जूझ रहे थे. हमने इन संगठनों को बहुत बार पलटी मारते हुए भी देखा है और उनकी झूठी सहानुभूति का प्रदर्शन भी.

आंदोलन में इनका अधिक से अधिक इतना ही योगदान होता है कि यह नजीब की तस्वीर अपने प्रोफाइल-फोटो के तौर पर लगा लेते हैं. लेकिन ये संगठन नजीब के मुकदमे  के कानूनी अपडेट सोशल मीडिया पर चिपका-चिपका कर ऐसा प्रदर्शित करते हैं मानो नजीब की खोज के अभियान का नेतृत्व यही कर रहे हों.

JNU students protest

नजीब के नजरिए से देखा जाएगा तो सिर्फ हमला करने वाले छात्र ही दोषी नहीं हैं, बल्कि नजीब के विरुद्ध बयान देने वाले जेएनयूएसयू के अध्यक्ष मोहित और स्वयं नजीब के रूममेट कासिम भी उतने ही दोषी हैं. परिसर के सबसे बड़े संगठनों, आईसा व एसएफआई जो कि व्यापक जनादेश के साथ छात्रसंघ के नेतृत्व में हैं, ने तब कोई हस्तक्षेप नहीं किया जबकि नजीब को पीटा जा रहा था बल्कि हमलावरों का ही साथ दिया, नजीब की आवाज को दबाया, घटनाक्रम के बारे में झूठ बोला और उसे ही हमलावर घोषित कर दिया. ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि नजीब की जगह कोई भी होता तो वो जान का खतरा महसूस करता.

ऊपर दिए गए घटनाक्रम को जानकर बहुत लोगों को आश्चर्य भी हो सकता है, खासकर उन लोगों को जो कि आईसा-एसएफआई  के धर्मनिरपेक्षता के दावे को गंभीरता से लेते हैं. लेकिन जिन लोगों ने उनकी कार्यपद्धति को पास से देखा है उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि उनका परिचय भारतीय-वाम के अंतर्निहित मुस्लिम-विरोधी चरित्र से पहले ही चुका होगा.

दोनों लेखक जेएनयू के इतिहास विभाग में शोध-छात्र हैं, और उसी हॉस्टल के उसी विंग में रहते हैं जिसमें नजीब रहता‌ था.

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