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JNU के अनिवार्य उपस्थिति सर्कुलर के असली भुक्तभोगी रिसर्च स्कॉलर हैं

छात्रावासों में नहीं रहने वाले ये ‘डे स्कॉलर’ कहलवाने वाले छात्र अक्सर जेएनयू छात्रसंघ और प्रशासन की उपेक्षा झेलते हैं. इन छात्रों के मसले जेएनयू परिसर में कोई राजनीतिक छात्र-संगठन नहीं उठाता

Updated On: Feb 16, 2018 11:33 AM IST

Martand Jha

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JNU के अनिवार्य उपस्थिति सर्कुलर के असली भुक्तभोगी रिसर्च स्कॉलर हैं

अनिवार्य उपस्थिति के मसले पर जेएनयू के छात्रों का विरोध जेएनयू के बाहर की दुनिया को बेमानी-मतलब की चीज जान पड़ सकता है. बहुत से लोग कहते हैं कि जेएनयू के स्टुडेंट्स की यह रवायत ही बन चली है, वे विरोध जारी रखने के मकसद से विरोध करने के आदी हो चले हैं. यों पूरी दुनिया में शिक्षा की संस्थाओं में छात्रों की उपस्थिति दर्ज करना एक आम चलन है और आमतौर पर लोग स्टुडेंट्स के अटेंडेंस के मसले को इसी चश्मे से देखते हैं. सो, कंपल्सरी अटेंडेंस के मसले पर जेएनयू के छात्रों का विरोध उन्हें अटपटा जान पड़ेगा.

लेकिन एक दुनिया जेएनयू के भीतर भी है और इसमें आपकी भेंट छात्रों के कई ऐसे समूह से होगी जिनपर कंपल्सरी अटेंडेंस के सर्कुलर की सीधी चोट पड़ी है. छात्रों का एक वर्ग तो जेएनयू स्टुडेंट्स यूनियन का ही है. ये सभी जेएनयू परिसर में रहने वाले रिसर्च स्कॉलर हैं. जेएनयू एक आवासीय विश्वविद्यालय (रेजिडेंशियल यूनिवर्सिटी) है और ज्यादातर छात्र परिसर के अंदर ही रहते हैं, बीए, एमए, एम.फिल तथा पीएच.डी कर रहे छात्र जेएनयू के अलग-अलग हॉस्टल्स में रहते हैं.

रिसर्च स्कॉलर हैं असली भुक्तभोगी

जेएनयू को लेकर चलने वाली बातचीत हॉस्टल्स में रहने वाले इन्हीं छात्रों पर केंद्रित रहती है. जेएनयू परिसर में पढ़ाई करने वाले ज्यादातर स्टूडेंट्स छात्रावासों में ही रहते हैं. इन छात्रों के लिए अपने छात्रावास से क्लासरूम तक जाना बस 10 मिनट पैदल चलने भर का मामला है. सो एक तर्क यह भी दिया जाता है कि आखिर ये छात्र अपनी अटेंडेंस क्यों नहीं दर्ज करवा सकते, बस आधा घंटा ही तो लगना है फिर इतना बखेड़ा किसलिए?

लेकिन यहां सवाल क्लासरूम से छात्रावास की दूरी का नहीं- कम से कम रिसर्च कर रहे छात्रों के एतबार से तो कत्तई नहीं. सवाल यह है कि क्लास ना हो तो फिर अटेंडेंस लगाने का तुक क्या है? एम.फिल के दूसरे साल में जा चुके या फिर पीएचडी कर रहे छात्रों के लिए कोई क्लास नहीं होती. इन छात्रों का कोर्स वर्क इस वक्त तक पूरा हो चुका होता है और उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपना पूरा ध्यान अब रिसर्च पर लगाएंगे.

ध्यान रहे कि छात्र एक बार एम.फिल का पहला साल पूरा कर लेते हैं तो फिर उनके लिए कोई क्लास नहीं होती जो वे वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं. वे फुल टाइम रिसर्च स्कॉलर होते हैं या कह लें कि उनसे पूरे वक्त रिसर्च की उम्मीद की जाती है यानी एक ऐसा अध्येता जो अपना समय डिजर्टेशन या थीसिस लिखने, सेमिनार, वर्कशॉप, कांफ्रेंस आदि में भाग लेने और शोध-पत्र प्रस्तुत करने और लेख लिखने में लगाएगा.

क्लास नहीं फिर कॉलेज क्यों आना?

लेकिन ऐसे भी रिसर्च स्कॉलर हैं जो छात्रावासों में नहीं रहते, भले ही इनकी तादाद थोड़ी कम है. इन्हें रोजाना जेएनयू आने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. हॉस्टल्स में रहने वालों के विपरीत इन छात्रों के लिए लंबी दूरी तय करने का मसला अहम है. नोएडा, द्वारका, रोहिणी आदि जगहों से जेएनयू आने वाले छात्रों को कम से कम 40 किमी. की दूरी तय करनी पड़ती है और इसमें न्यूनतम 200 रुपए खर्च होते हैं जबकि इसके लिए कोई यात्रा-भत्ता नहीं मिलता. ऐसे छात्रों पर सबसे ज्यादा चोट पड़ती है. ये आम छात्र हैं और इनका कैंपस की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं. ये बस क्लास करने के लिए आते हैं और क्लास खत्म होने पर शाम के समय अपने-अपने घर लौट जाते हैं.

छात्रावासों में नहीं रहने वाले ये ‘डे स्कॉलर’ कहलवाने वाले छात्र अक्सर जेएनयू छात्रसंघ और प्रशासन की उपेक्षा झेलते हैं. इन छात्रों के मसले जेएनयू परिसर में कोई राजनीतिक छात्र-संगठन नहीं उठाता. इन्हें तकरीबन बे-वजूद मानकर चला जाता है. हाल में जारी अटेंडेंस सर्कुलर के बाद इन छात्रों को सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए लंबी दूरी तय कर आना और फिर घर लौट जाना होगा. यह इन छात्रों की ऊर्जा, समय और पैसे की बर्बादी के सिवाय और कुछ नहीं है.

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दिव्यांग छात्रों का क्या?

इन छात्रों (जो हॉस्टल्स में नहीं रहते) में कुछ दिव्यांग हैं. अगर अनिवार्य उपस्थिति का जारी सर्कुलर अपने मौजूदा रूप में वापस नहीं लिया जाता तो ऐसे दिव्यांग छात्रों को इतनी लंबी दूरी तय कर आने में कितनी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है. अगर कोई क्लास होती तो सारी कठिनाई, यात्रा का खर्च और लंबी दूरी का सफर- ये सब बातें उचित जान पड़तीं लेकिन इस बात का क्या कीजिएगा कि रिसर्च स्कॉलर्स के लिए कोई क्लास नहीं होती क्योंकि वे अपना कोर्स वर्क पूरा कर चुके होते हैं.

अटेंडेंस सर्कुलर के मौजूदा रुप में एक प्रावधान यह भी है कि रिसर्च स्टूडेंट को अपने सुपरवाइजर से महीने में कम से कम दो दफे मिलना होगा और उन्हें शोध के सिलसिले में हुई प्रगति का ब्यौरा देना होगा. रिसर्च स्कॉलर से ऐसी उम्मीद रखना बिल्कुल ठीक है. दरअसल, सुपरवाइजर से मिलने का समय महीने में दो दिन से बढ़ाकर चार दिन कर देना चाहिए. इससे शोध की गुणवत्ता बढ़ेगी.

रिसर्च स्कॉलर के साथ स्कूली बच्चों जैसा बरताव करने की जरुरत नहीं. सवाल यह नहीं है कि हर कोर्स के लिए अनिवार्य उपस्थिति के नियम को फायदेमंद मानकर उसे एक चुनौती की तरह पेश किया जाए. यहां असल बात है कि पढ़ाई के विभिन्न स्तरों पर पहुंच चुके छात्रों के अलग-अलग समूह के बीच अंतर किया जाए. अटेंडेंस के मामले में प्रशासन का एक सा नियम बना लेना और उसे हर छात्र पर समान रुप से लागू करना कोई बढ़िया तरीका नहीं.

छोटी तादाद है, इसलिए नजरअंदाज किया गया

ग्रेजुएशन, पोस्ट-ग्रेजुएशन और रिसर्च के स्तर पर शिक्षा का चरित्र और स्वभाव एक-दूसरे से बहुत अलग होता है. हर स्तर के छात्र को एक घेरे में समेटने के मसले पर जेएनयू प्रशासन ने अच्छी तरह से सोच-विचार नहीं किया.

जेएनयू में अनिवार्य अटेंडेंस के मसले पर पक्ष और विपक्ष में जो आलेख सामने आए हैं उनमें डे रिसर्च स्कॉलर को पेश आने वाली परेशानियों को सिरे से छोड़ दिया गया है. आखिर, इस छोटी-सी तादाद के लिए कौन फिक्र करे भला? बहस अटेंडेंस सिस्टम के गुणों पर हो रही है, असल मुद्दे पर नहीं. असल मुद्दा तो यह है कि कोई लेक्चर या क्लास होगी तो ही यह सवाल उठाया जा सकता है कि छात्रों ने उसमें अपनी अटेंडेस दर्ज करवाई या नहीं. अटेंडेंस दर्ज करवाने का सवाल तो क्लास या लेक्चर के होने से जुड़ा हुआ है.

यह लेख छात्रावास में नहीं रहने वाले रिसर्च स्टूडेंट के नजरिए से लिखा गया है. छात्र-समुदाय का हिस्सा होने के बावजूद वे हमेशा ही अल्पसंख्यक रहे हैं. जेएनयू के छात्र-संगठनों के तमाम विरोध-प्रदर्शन ज्यादातर उन मुद्दों पर केंद्रित होते हैं जिनकी जद में वो खुद हों या फिर जिनसे उनके वोट-बैंक पर असर पड़ता हो (यानि परिसर के छात्रावासों में रहने वाले स्टूडेंट्स).

बुनियादी सुविधा मुहैया कराने, जैसे जेएनयू से नजदीकी मेट्रो स्टेशन हौजखास तक परिवहन की सुविधा, पर बात नहीं होती. इस समस्या का अभी तक समाधान नहीं हो पाया है. छात्र अगर ऑटोरिक्शा लेते हैं तो उन्हें कैंपस से हौजखास मेट्रो स्टेशन आने-जाने में रोजाना 120 रुपये खर्च करने होते हैं. कैंपस में डीटीसी की बसें आती हैं लेकिन उनकी सेवा नियमित नहीं है और बस से सफर करने की सूरत में छात्रों का बहुत समय जाया होता है. जेएनयू छात्रसंघ और अन्य राजनीतिक दलों के छात्र-संगठन छात्रावास में ना रहने वाले स्टूडेंट्स की परेशानियों से जुड़े मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन नहीं करते क्योंकि ऐसे मुद्दों से उनका हित प्रभावित नहीं होता.

निष्कर्ष के तौर पर कहें तो जेएनयू प्रशासन को ठोस समाधान के साथ आगे आना होगा. या तो रिसर्च स्टूडेंट्स के लिए भी क्लासेज शुरू की जाएं ताकि उन क्लासेज के लिए उपस्थिति दर्ज करवाई जा सके या फिर जिन छात्रों के लिए क्लासेज नहीं होतीं उनपर कंपल्सरी अटेंडेंस की बाध्यता ना रहे. जेएनयू प्रशासन को इन दो विकल्पों में से एक को चुनना होगा, दोनों एक साथ लागू नहीं की जा सकतीं.

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