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JNU: क्या आरोपी प्रोफेसर को सस्पेंड नहीं करना जेंडर जस्टिस की भावना के साथ खिलवाड़ है!

जेंडर जस्टिस का नियम यह कहता है कि महिला और पुरुष में हमेशा महिला कमजोर स्थिति में होती है. ऐसी स्थिति में किसी भी संस्था की कार्रवाई से सबसे पहले यह दिखना चाहिए कि वो महिला को न्याय दिलाने और मामले की निष्पक्ष जांच के लिए प्रतिबद्ध है

Updated On: Mar 19, 2018 10:25 PM IST

Piyush Raj Piyush Raj
कंसल्टेंट, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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JNU: क्या आरोपी प्रोफेसर को सस्पेंड नहीं करना जेंडर जस्टिस की भावना के साथ खिलवाड़ है!

पिछले 2 सालों से जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानी जेएनयू किसी न किसी वजह से लगातार सुर्खियों बना हुआ है. लगता है यह अब जेएनयू की नियति हो गई है. जेएनयू राष्ट्रीय मीडिया के आकर्षण का केंद्र पहले गाहे-बगाहे ही बनता था लेकिन अब हर महीने जेएनयू की खबरें अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर देखने को मिल ही जाती है. पिछले कुछ दिनों से जेएनयू यौन उत्पीड़न के मुद्दे के लिए सुर्खियों में बना हुआ है.

जेएनयू के लाइफ साइंस के एक प्रोफेसर पर 9 छात्राओं ने छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है. यह मुद्दा लगातार मीडिया में छाया हुआ है. इसकी सबसे बड़ी वजह से जेएनयू प्रशासन द्वारा इस मामले पर कोई कड़ी और ठोस कार्रवाई का नहीं करना. इससे भी बड़ी बात है एफआईआर दर्ज हो जाने के बाद भी दिल्ली पुलिस के तरफ से किसी ठोस कार्रवाई का अभाव, वह भी तब जब शिकायतकर्ताओं ने खुलकर प्रोफेसर के खिलाफ आरोप लगाए हैं.

इस तरह सामने आया मामला

दरअसल यह मामला तब सामने आया जब जेएनयू के लाइफ साइंस की एक शोध-छात्रा गायब हो गई. बाद में अपने एक रिश्तेदार के घर मिली. पूछताछ के दौरान यह बात सामने आई कि शोध-छात्रा ने लाइफ साइंस के अपने प्रोफेसर के खराब व्यवहार की वजह से परेशान होकर ऐसा कदम उठाया था. छात्रा ने अपने प्रोफेसर के खिलाफ शिकायत में यह कहा था कि प्रोफेसर को यह भी पता नहीं है कि लड़कियों या महिलाओं के साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए. छात्रा ने कहा था कि कोई अनपढ़ भी महिलाओं से इस तरह का व्यवहार नहीं करता, जिस तरह का व्यवहार ये प्रोफेसर करते हैं.

यह भी पढ़ें: JNU में यौन उत्पीड़न: सड़क पर उतरे छात्र, आरोपी प्रोफेसर पर FIR दर्ज

इस आरोप के बाद अन्य छात्राओं ने भी साहस दिखाया और सामने आकर प्रोफेसर द्वारा यौन उत्पीड़न की बात कही. इसके बाद प्रशासन ने जिस तरह की ढिलाई बरती उसके बाद मजबूरी में शिकायतकर्ताओं को पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवाना पड़ा. शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया के दौरान ही जेएनयू प्रशासन का पक्षपात दिख गया. सबसे पहली बात, प्रशासन ने कहा कि शिकायतकर्ताओं ने मौखिक शिकायत की है, जबकि प्रशासन को चाहिए था कि वो छात्राओं को इस बात का भरोसा दिलाता कि उन्हें न्याय मिलेगा तो शिकायत मौखिक नहीं लिखित होती.

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जेएनयू छात्रसंघ ने यह भी आरोप लगाया है कि पूछताछ के दौरान छात्राओं से बंद कमरे में पूछताछ की और इस दौरान किसी को उनसे मिलने नहीं दिया गया. छात्रसंघ और कई छात्रों का आरोप है कि बंद कमरे में शिकायतकर्ताओं पर शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया.

इस संस्था को भंग करने से लेना छात्राओं को लेना पड़ा पुलिस का सहारा

जेएनयू छात्रसंघ की इस बात में दम है क्योंकि अभी तक इस तरह के मामलों में जेएनयू के स्टूडेंट जेएनयू के भीतर की एक संस्था जीएसकैश (जेंडर सेंसेटाइजेशन कमिटी अगेंस्ट सेक्युअल हैरेसमेंट) में शिकायत दर्ज करवाते थे और पुलिस में जाने से अमूमन परहेज ही करते थे. लेकिन वर्तमान जेएनयू प्रशासन ने जीएसकैश जैसी मजबूत संस्था को भंग करके एक इंटरनल कंप्लेन कमिटी (आईसीसी) का गठन कर दिया. इसके सभी सदस्य प्रशासन द्वारा चुने होते हैं जबकि जीएसकैश के सदस्य मनोनीत और निर्वाचित दोनों होते थे और इसमें जेएनयू के छात्रों, शिक्षकों के साथ-साथ कर्मचारियों और अधिकारियों के भी प्रतिनिधि होते थे. इसमें हर केस की सुनवाई के लिए एक खास प्रक्रिया और नियमों का पालन होता था. इस वजह से कोई स्टूडेंड, कर्मचारी या शिक्षक बेझिझक इसमें जाकर अपनी शिकायतों और दिक्कतों को बताते थे.

जीएसकैश नामक यह संस्था सिर्फ शिकायतों की जांच ही नहीं करती थी बल्कि जेंडर के मुद्दे पर जेएनयू के हर हिस्से को जागरूक करने के लिए कई काम भी करती थी.

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इस संस्था की सबसे बड़ी खासियत थी कि इसमें जेएनयू प्रशासन की दखलंदाजी न के बराबर थी जबकि आईसीसी पूरी तरह से जेएनयू प्रशासन के मातहत है. जीएसकैश कई प्रोफेसरों को जांच के बाद दोषी ठहरा चुका है और उन्हें सजा भी दी है. लेकिन जेएनयू के छात्रों के भीतर आईसीसी नामक संस्था के ऊपर इसके गठन के ढांचे को देखकर जीएसकैश वाला भरोसा नहीं पैदा हो रहा है. जीएसकैश जैसी निरपेक्ष संस्था को भंग करने की वजह से ही शिकायतकर्ताओं को पुलिस के पास जाना पड़ा.

क्या सिर्फ प्रशासनिक पदों से इस्तीफा काफी है

आरोपी प्रोफेसर अतुल जौहरी प्रशासन से अपनी नजदीकी के लिए जाने जाते हैं. अटेंडेंस मामले उन्होंने खुलकर जेएनयू प्रशासन के फैसले का पक्ष लिया. एकेडमिक काउंसिल की बैठक में छात्रसंघ और शिक्षक संघ से कई बार प्रशासन का पक्ष लेते हुए बहस किया है. ऐसे प्रोफेसर के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाना अपने आप में बहुत साहस का काम है. ऐसे में मामले की सच्चाई चाहे जो हो जेंडर जस्टिस की मूलभूत भावना के तहत जेएनयू प्रशासन को तुरंत उन्हें सस्पेंड करना चाहिए था.

भले जौहरी ने अपने प्रशासनिक पदों से इस्तीफा दे दिया है लेकिन वे अभी भी लाइफ साइंस में प्रोफेसर हैं और वहां वे उन लैबों में जाएंगे जहां शिकायत करने वाली छात्राएं भी अपना शोध कर रही होंगी. जेंडर जस्टिस का एक साधारण सा नियम ऐसे हर मामले में फॉलो होता है कि आरोपी को जांच प्रक्रिया के पूरे होने तक सस्पेंड कर दिया जाए ताकि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल शिकायतकर्ताओं पर न कर सके.

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अकादमिक जगत में तो यह और भी जरूरी हो जाता है. हर कोई जानता है कि प्रोफेसर और एक शोधार्थी (उसमें भी महिला) में कौन अधिक प्रभावशाली है. दूसरी तरफ पुलिस एफआईआर होने के बाद भी अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. छात्रसंघ का कहना है कि दिल्ली पुलिस राजनीतिक दबाव में आरोपी प्रोफेसर को गिरफ्तार नहीं कर रही है क्योंकि ये प्रोफेसर खुलकर केंद्र में सत्ताधारी पार्टी का पक्ष लेते रहे हैं.

यौन-उत्पीड़न के किसी भी मामले में न्याय का नियम यह कहता है कि महिला और पुरुष में हमेशा महिला कमजोर स्थिति में होती है. ऐसी स्थिति में किसी भी संस्था की कार्रवाई से सबसे पहले यह दिखना चाहिए कि वो महिला को न्याय दिलाने और मामले की निष्पक्ष जांच के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन जेएनयू के मामले में ऐसा होता नहीं दिख रहा है. शिकायत दर्ज होने 4 दिन बाद भी आरोपी प्रोफेसर के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं करना जेएनयू प्रशासन की जेंडर जस्टिस के लिए प्रतिबद्धता पर सवालिया निशान खड़ा करती है.

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