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आखिर क्यों छाया है मुंबई का जिन्ना हाउस सुखिर्यों में?

जिन्ना हाउस महात्मा गांधी जिन्ना वार्ताओं समेत कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा है

FP Staff Updated On: Apr 09, 2017 08:18 PM IST

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आखिर क्यों छाया है मुंबई का जिन्ना हाउस सुखिर्यों में?

‘क्या भवनों को ध्वस्त कर इतिहास को खारिज किया जा सकता है’ मशहूर क्रिक्रेटर इमरान खान का यह प्रश्न जिन्ना हाउस के प्रति इतिहासकारों की भावना को व्यक्त करता है जो जिन्ना गांधी वार्ताओं और मुस्लिम लीग की बैठकों का गवाह रहा है. इसी मुस्लिम लीग ने इस महाद्वीप की नियति बदल दी.

दक्षिण मुम्बई में ढाई एकड़ क्षेत्र में फैले इस विशाल भवन का निर्माण मोहम्मद अली जिन्ना ने 1936 में दो लाख रुपए में बनवाया था. उन्होंने इस पूरे निर्माण कार्य की व्यक्तिगत निगरानी की थी और वह इस महल में 1947 तक ठहरे थे.

करीब तीन दशक से खाली इस भवन का डिजायन वास्तुकार क्लाउड बेटली ने यूरोपीय शैली में तैयार किया था.

जिन्ना हाउस लंबे समय से भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय बना हुआ है. पाकिस्तान मांग कर रहा है कि मुम्बई में उसे अपना वाणिज्य दूतावास बनाने के लिए यह भवन उसे सौंप दिया जाए.

क्या जिन्ना हाउस 'विभाजन का प्रतीक' है?

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इस बंगला को ध्वस्त करने की एक बीजेपी विधायक की मांग पर पाकिस्तान ने हाल ही चिंता प्रकट की थी और इस पर अपना मालिकाना हक फिर से जताया था.

मालाबार हिल में भाउसाहब हीरे मार्ग पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के सरकारी निवास ‘वष्रा’ के सामने यह बंगला स्थित है. ब्रिटिश शासनकाल में यह माउंट प्लीजेंट रोड कहलाता था.

स्वतंत्रता के बाद इसे ब्रिटिश उच्चायोग को उप उच्चायुक्त के निवास के तौर पर लीज पर दिया गया था जो 1980 के दशक के प्रारंभ तक उसके पास रहा.

वर्ष 1983 में जिन्ना हाउस को बिना कब्जे वाली संपत्ति घोषित कर दिया गया और उसका रखरखाव राज्य लोक निर्माण विभाग के हवाले कर दिया गया.

जिन्ना हाउस हाल ही में तब सुखिर्यों में आया जब मालाबार के बीजेपी विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा ने मांग की कि इसे ध्वस्त कर दिया जाए. साथ ही यहां भारत और महाराष्ट्र की संस्कृति एवं परंपरा को दर्शाने वाला सांस्कृतिक केंद्र वहां बनाया जाए.

इसे ‘विभाजन का प्रतीक’ करार देते हुए लोढ़ा ने कहा कि जिन्ना हाउस भारत के विभाजन से जुड़े इतिहास का गवाह रहा है क्योंकि मुस्लिम लीग के नेता ने 1944 और 1947 के बीच दो राष्ट्र के सिद्धांत को आगे ले जाने के लिए वहां ढेरों महत्वपूर्ण बैठकें कीं.

भवनों को तोड़कर इतिहास नहीं बदला जा सकता

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जिन्ना और गांधी

पाकिस्तानी क्रिक्रेटर से नेता बने इमरान खान ने इसे ‘परेशान करने वाला’ बताया और कहा कि भवनों को ध्वस्त कर इतिहास को खारिज नहीं किया जा सकता.

इतिहास प्रेमियों ने इस शानदार भवन के संरक्षण की जोरदार पैरवी की है जो महात्मा गांधी जिन्ना वार्ताओं समेत कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा है.

जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस इस बंगले के मेहमान रह चुके हैं.

लोकमान्य तिलक स्वराज भूमि ट्रस्ट के प्रकाश सलीम चाहते हैं कि यह बंगला इस संगठन को सौंप दिया जाए ताकि वह राष्ट्रवादी तिलक, जो ‘महाराष्ट्र के शेर’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, के सम्मान में स्मारक का निर्माण करे.

उन्होंने कहा, ‘जिन्ना ने तिलक को स्वतंत्रता संघर्ष में मदद की और उनकी दोस्ती को ध्यान में रखते हुए जिन्ना हाउस को न्यास को दे दिया जाए.’

अपने आखिरी वक्त में मुंबई में रहना चाहते थे जिन्ना?

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जिन्ना ने मुंबई में बॉम्बे हाईकोर्ट में वकील के तौर पर प्रैक्टिस की थी और उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा बाल गंगाधर पर पर थोपे गए प्रसिद्ध राजद्रोह के मामले में उनका बचाव भी किया था.

पाकिस्तान इंडिया पीपुल्स फोरम फोर पीस एंड डेमोक्रेसी की भारतीय इकाई के सचिव जतिन देसाई ने कहा कि यह बड़ी विडंबना है कि मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र की विचार प्रतिपादित करने वाले जिन्ना दिल से मुंबईवासी थे और वह किसी अन्य शहर में बसने की कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे.

उन्होंने कहा, ‘विभाजन के पश्चात कराची चले जाने के बाद भी जिन्ना ने अपने प्रिय शहर मुंबई (तब बंबई) में अपने प्रिय घर में आखिरी दिन बिताने की इच्छा प्रकट की थी. हालांकि वह पाकिस्तान के बनने के कुछ ही महीने बाद गुजर गए.’

देसाई ने सुझाव दिया कि इस भवन का इस्तेमाल भारत और पाकिस्तान के बीच शांति एवं दोस्ती को बढावा देने वलो केंद्र या दक्षेस सांस्कृतिक केंद्र के रूप में किया जाए.

उन्होंने कहा कि नेहरू को जिन्ना के अपने मुंबई हाउस के प्रति लगाव के बारे में मालूम था इसलिए उन्होंने जिन्ना के निधन के बाद उसे शत्रु संपत्ति के बजाय खाली संपत्ति घोषित कर दिया.

मुशर्रफ ने वाजपेयी से मांगा था जिन्ना हाउस 

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जब पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ आगरा शिखर सम्मेलन के लिए वर्ष 2001 में भारत आए थे तब उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि जिन्ना हाउस का पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावास के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन भारत ने यह मांग ठुकरा दी थी.

मुम्बई के इतिहासकार दीपक राव ने कहा कि जिन्ना को इस शहर से बेपनाह मोहब्बत थी और वह विभाजन के बाद भी इस भवन से अपना जुड़ाव कायम रखना चाहते थे. पहले भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद इसका रखरखाव करता था.

दूसरे इतिहासकार रफीक बगदादी ने कहा, ‘जिन्ना मुंबई में रहे और उन्होंने कानून की प्रैक्टिस की. उन्होंने पाकिस्तान से नेहरू को पत्र लिखकर इस बंगले को सुरक्षित रखने की गुजारिश की थी. उनके पत्र व्यवहार को उस दौर के सदंर्भ और नेहरू जैसे नेताओं के व्यक्तित्व में देखा जाना चाहिए. वे कई मुद्दों पर असहमत हो सकते थे लेकिन एक दूसरे के प्रति विनम्र रहने और पत्र व्यवहार के प्रति उनमें सहमति थी.’

उन्होंने कहा कि संग्रहालय उस दौर को परिलक्षित करेगा और युवा पीढ़ी को उस दौर के मुम्बई के नेताओं का विचार जानने का मौका मिल सकता है.

वर्ष 2010 में केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट से कहा था कि उसे जिन्ना हाउस का पूर्ण स्वामित्व मिल गया है.

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