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जिन्ना दो चेहरों वाले आदमी, जिसे याद रखना बहुत ज़रूरी है

जिन्ना का विरोध ज़रूर होना चाहिए, जब ज़रूरत पड़े तब होना चाहिए, लेकिन इस विरोध में इस बात का ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि कहीं विरोध के इस रास्ते पर चलते हुए कहीं हम जिन्ना के नक्शे-कदम पर ही तो नहीं चलने लगे हैं

Nazim Naqvi Updated On: May 09, 2018 08:41 AM IST

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जिन्ना दो चेहरों वाले आदमी, जिसे याद रखना बहुत ज़रूरी है

जिन्ना जरूर मुस्कुरा रहे होंगे क्योंकि उनकी लड़ाई उनसे थी जो धार्मिक-विश्वासों की विविधता की वकालत कर रहे थे. जो कह रहे थे कि धर्म एक निजी-मामला है और विशेष रूप से एक बहुलवादी समाज में, राज्य के साथ इसका कुछ लेना-देना नहीं है.

लोगों को शायद ये ग़लतफ़हमी है कि देश की बहुलतावादी सोच में बुनियादी बदलाव, 2014 के सत्ता परिवर्तन के बाद आने शुरू हुए. लोग शायद भूल जाते हैं कि 2006 में सच्चर समिति की रिपोर्ट ने अधिकारिक तौर पर देश के एक धार्मिक-समुदाय की आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा की गिरती हुई स्थिति को उजागर करते हुए उसकी स्थिति में सुधार लाने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाने की मांग की थी.

ये वही वर्ष है जब बॉलीवुड के स्टार शाहरुख खान की फिल्म ‘डॉन’ सिनेमाघरों में लोकप्रियता और मुनाफ़े के नए प्रतिमान गढ़ रही थी. क्या सच्चर समिति पिछड़े समुदायों में किसी एक समुदाय-विशेष को अलग करके बहुलतावाद के भारतीय सिद्धांत को सियासी तौर पर कमज़ोर नहीं कर रही थी?

प्रजा, गुलाम... फिर बने नागरिक

जब हम मुगलों के अधीन थे तो हम ‘प्रजा’ थे. फिर जब अंग्रेजों के अधीन हुए तो ‘गुलाम’ कहलाए और जब हमें आजादी मिली और हमने अपना संविधान बनाया तो हम ‘नागरिक’ हो गए. हमें यह याद रखना चाहिए कि 15 अगस्त 1947 के बाद से, भारतीय राष्ट्र की मौलिक इकाई नागरिक हैं, न कि धार्मिक-समुदाय.

निष्पक्षता और सुरक्षा हमारे संविधान की नायाब देन है. हमारा संविधान, धर्म-जाति-वंश-लिंग या जन्म-स्थान पर आधारित किसी भेदभाव को स्वीकार नहीं करता. यह समझ से परे है कि निष्पक्षता और सुरक्षा को ‘पहचान’ के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है. और अगर ये कोशिश की जा रही है तो एक तरह से यह जिन्ना के नज़रिए का ही अनुमोदन किया जा रहा है क्योंकि जिनके हाथों में संचालन की पतवार है उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों और हमारी विरासत को त्याग दिया है.

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और जैसा कि लेखक पहले ही कह चुका है कि जो फसल दिखाई दे रही है उसके बीज 2006 में सच्चर-रिपोर्ट ने बोए थे. जिसके बाद मुसलामानों का तो कोई भला नहीं हुआ, उलटे साम्प्रदायिक राजनीति को खुलेआम अपनाया जाने लगा.

यह लगभग अब तय हो गया है कि जब-जब देश में चुनाव होंगे (जो लगातार होते ही रहते हैं) तो कोई टीपू, कोई औरंगजेब और कोई जिन्नाह उभारे जाते रहेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण किया जाता रहेगा. टीपू तो बस अब चंद दिन के मेहमान हैं, 12 मई के बाद उन्हें कौन पूछेगा. लेकिन जिन्ना अभी मार्केट में रहेंगे, इसलिए बात जिन्ना पर.

क्यों कर रहे हैं जिन्ना का विरोध?

हम किस जिन्ना का विरोध कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए क्योंकि जिन्ना दो चेहरे वाले एक आदमी का नाम है. एक चेहरा वो है जो दिल की सुनता है, दूसरा वो है जो दिमागी मक्कारियों के चक्रव्यूह में फंस जाता है. पहले चेहरे के दादा का नाम प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर है. वह लोहाना जाति के हैं और गुजरात के कठियावाड़ के पनेली गांव के रहने वाले हैं.

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दादाजी मछली का कारोबार करके पैसा तो बहुत कमाते हैं लेकिन उनकी अपनी शाकाहारी लोहाना जाति उन्हें जाति-बाहर कर देती है. बाद में वह कारोबार बंद करके जब अपनी जाति में वापस आने की कोशिश करते हैं तो बदले में उन्हें धिक्कार मिलती है. नतीजा यह होता है कि उनके बेटे पुंजलाल ठक्कर (जिन्ना के पिता) का जवान खून इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाता और वह अपने चार बेटों समेत इस्लाम क़ुबूल कर लेते हैं.

Jinnah

दूसरी पीढ़ी का ये भारतीय मुस्लिम चेहरा, लंदन में बैरिस्टरी की शिक्षा पूरी करता है और देश लौटकर बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत करने लगता. कुशाग्र बुद्धि वाला यह चेहरा जल्दी ही देश की राष्ट्रीय राजनीति में उन लाखों दिलों के साथ धडकने लगता है जिन्हें अंग्रेजों की ग़ुलामी से छुटकारा चाहिए.

20वीं शताब्दी के पहले दो दशकों में यह चेहरा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली पंक्ति में प्रमुखता हासिल करता है. और हिंदू-मुस्लिम एकता की पुरजोर वकालत करता है. कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच 1916 के लखनऊ समझौते को आकार देने में आगे-आगे रहता है.

जब तिलक के सपोर्ट में उतरे थे जिन्ना

यहां ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि 1916 ही वह वर्ष है जब लखनऊ में नेहरू पहली बार गांधी जी से मिलते हैं. यह वही मंच है जहां से सरोजनी नायडू, जिन्ना को हिन्दू-मुस्लिम एकता का दूत कहती हैं. यही वह वर्ष भी है जब जिन्ना, बाल गंगाधर तिलक पर लगे ‘राजद्रोह’ का मुकदमा जीतते हैं. यह वह समय है जब नेहरू राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं और दूसरी तरफ जिन्ना, बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले, देश की आजादी के मसूबों पर काम कर रहे हैं.

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1916 में राष्ट्रीय राजनीति के शिखर पर रहने वाला एक शख्स जिसे, गोखले जैसे राजनैतिक बुद्धि के धनी व्यक्ति, धर्म और जाति के पूर्वाग्रहों से मुक्त इंसान की श्रेणी में रखते हों, जिसके बारे में बॉम्बे के गवर्नर ‘सर जॉर्ज’ की यह राय हो कि जिन्ना काफी खतरनाक सियासी शख्सियत हैं इसलिए उनके क़द को कम करना चाहिए. वह चेहरा क्यों 1920 में अपने देश का स्वाधीनता आंदोलन छोड़कर लंदन लौट गया और वकालत करने लगा. इस चेहरे से आखिर किसी को नफरत कैसे हो सकती है? चलिए कहानी को आगे बढ़ाते हैं.

क्या है असली कहानी?

14 साल का बनवास बिताकर एक बार फिर जिन्ना 1934 में भारत लौटते हैं. यह जिन्नाह का दूसरा चेहरा है. भारत को यह चेहरा बदला-बदला हुआ लगता है. वह जो कुछ कह रहा है, सोच रहा है, वह सब कुछ अजीब है. यह वह भारत है जिसे हिन्दू-मुस्लिम एकता की पहले से कहीं ज्यादा ज़रूरत है, लेकिन जिन्ना की अब इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है. वह बहुलतावाद के अपने सारे अध्याय भूल चुका है. वह एक ख़तरनाक जुआ खेल रहा है. वह नाम से भले ही मुसलमान है लेकिन शराब पीता है, सूअर का मांस खाता है, फिर भी कट्टरपंथी मुसलमान उसे कन्धों पर बिठाकर घूम रहे हैं. वह जानते हैं कि यही चेहरा उनके इस सियासी जुएं में जोकर की भूमिका निभाकर बाज़ी उनके हक में पलट सकता है.

जिस कांग्रेस के मंच से कभी जिन्ना ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को मज़बूत किया था, अब वह उसे हिन्दू-दल कह रहा था. और मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग कर बैठा था. विभाजन की ज़िम्मेदारी किस पर? इस सवाल पर लोग अक्सर गांधी और नेहरू का नाम लेकर जिन्ना के शातिर दिमाग़ को समझने में भूल कर बैठते हैं.

1934 के बाद का जिन्ना, हो सकता है व्यक्तिगत रूप से ‘कुछ ख़ास लोगों को’ अपने ख़तरनाक दांव का कायल कराना चाहता हो, लेकिन किस कीमत पर? वतन के टुकड़े करके? यकीनन हर भारतीय को इस चेहरे से नफरत करनी चाहिए और इससे सीख लेनी चाहिए कि धर्म और बंटवारे की सियासत के क्या नतीजे होते हैं.

सच तो यह है कि जिन्ना का विरोध ज़रूर होना चाहिए, जब ज़रूरत पड़े तब होना चाहिए, लेकिन इस विरोध में इस बात का ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि कहीं विरोध के इस रास्ते पर चलते हुए कहीं हम जिन्ना के नक्शे-कदम पर ही तो नहीं चलने लगे हैं. क्योंकि उस रास्ते पर चलके तो पकिस्तान बना था, तो क्या हम...? छोड़िए लेख के अंत में अशुभ बातें करना ठीक नहीं.

हम तो बस ये कहना चाहते हैं कि ‘एक चेहरा तस्वीर से बहार लाने में/ जाने कितने मंज़र काटने पड़ते हैं. क्या सही है ये चाहे हम भूल भी जाएं लेकिन क्या गलत है इसे याद रखने में ही समझदारी है.

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