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जिगर मुरादाबादीः क्लासिकल गजल के आखिरी शायर

अली सिकंदर उर्फ जिगर मुरादाबादी का जन्म आध्यात्मिक नगरी वाराणसी में छह अप्रैल 1890 को हुआ था

Updated On: Apr 05, 2018 10:24 PM IST

FP Staff

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जिगर मुरादाबादीः क्लासिकल गजल के आखिरी शायर

उर्दू गज़ल को अवाम में मकबूल करने में यादगार किरदार अदा करने वाले जिगर मुरादाबादी ‘क्लासिकी’ गजल के आखिरी शायर थे और शायरी को हर ऐब का आईना बनाकर अलग मकाम बना चुके इस शायर को पढ़े बगैर उनकी गजल विधा से पूरे तौर पर वाकिफ नहीं हुआ जा सकता.

मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने जिगर मुरादाबादी को गजल की बुनियाद मजबूत करने वाला शायर करार देते हुए कहा कि जिगर ने उर्दू गजल को अवाम तक पहुंचाने में बहुत अहम किरदार अदा किया है. वह क्लासिकल गजल के आखिरी शायर थे.

उन्होंने बताया कि जिगर के बाद गजल ने नए रूप लेना शुरू कर दिया था. इन नए रूपों में तरक्की पसंदगी, जदीदियत, मआबाद जदीदियत शामिल है, लेकिन गजल की बुनियाद यानी क्लासिक गजल को मजबूत करने में जिगर के किरदार को कभी भुलाया नहीं किया जा सकता.

अली सिकंदर उर्फ जिगर मुरादाबादी का जन्म आध्यात्मिक नगरी वाराणसी में छह अप्रैल 1890 को हुआ था. उन्होंने मुरादाबाद में अरबी, फारसी और उर्दू की तालीम हासिल की. बाद में उन्होंने रजा रामपुरी की सरपरस्ती में शायरी की तरबियत ली. जिगर को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने डी. लिट की मानद उपाधि प्रदान की थी.

राणा ने कहा कि जिगर के जमाने के बाद तरक्की पसंदगी एक फैशन बन गया. हालांकि उस जमाने में भी मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी और अली सरदार जाफरी जैसे तरक्की पसंद शायरों की बुनियाद भी क्लासिकल शायरी में थी. वे अपनी शायरी में गरीबी, मजलूमी और दीगर नए दुनिवायी मसलों को लेकर आए, लेकिन उनके अल्फाज में उसी पुरानी मिट्टी की महक थी.

दुनिया के सामने जाहिर किया कैसी हो इंसानियत की जबान 

जिगर से अपनी वाबस्तगी के बारे में राणा ने कहा कि जिगर को पढ़े बगैर आप क्लासिकल गजल से पूरे तौर पर वाकिफ नहीं हो सकते. चूंकि वह क्लासिकल गजल के आखिरी शायर थे, लिहाजा उनकी शायरी जिंदगी के हर पहलू का आईना है. तारीख (लिखित इतिहास) तो झूठ बोल सकती है लेकिन शायरी में सच मिल जाता है. तारीख यह छुपा सकती है कि बंगाल में सूखा पड़ा था, लेकिन शायरी इसे नहीं छुपाती. जिगर ने अपनी गजलों में बंगाल के अकाल को उकेरा.

उन्होंने कहा कि शायर को पहले बहुत अच्छा इंसान होना चाहिए. जिन लोगों ने जिगर को देखा और समझा, उन्होंने पाया कि जो शराफत उनमें थी, उसकी मिसाल आसानी से मिलना मुश्किल है. मेरी सलाह है कि नौजवान नस्ल अपने क्लासिक शायरों को पढ़ें. जब पढ़ेंगे तो पहली सीढ़ी के तौर पर जिगर मिलेंगे. उसके बाद फानी, गालिब, मीर और इकबाल समेत पूरी दुनिया मौजूद है.

शायर अजहर इनायती ने जिगर को एक बेहतरीन इंसान बताते हुए कहा कि इस शायर ने दुनिया के सामने यह जाहिर किया कि इंसानियत की जबान कैसी हो सकती है.

उन्होंने बताया कि समकालीन मुशायरों के मंच पर जितनी इज्जत जिगर मुरादाबादी को मिली, उतनी शायद ही उनके जमाने के किसी दूसरे शायर को मिली हो. जिगर की प्रमुख रचनाओं में ‘आतिश-ए-गुल‘ के अलावा ‘इंतखाब दीवान-ए-जिगर‘, ‘कुल्लियात-ए-जिगर‘ और ‘शोला-ए-तूर‘, शामिल हैं.

जिगर मुरादाबादी हिंदी फिल्मों के लिए अनेक यादगार नग्मों को कलमबंद करने वाले मशहूर गीतकार मजरूह सुलतानपुरी के सलाहकार भी कहे जाते हैं. जिगर ने नौ सितम्बर 1960 को उत्तर प्रदेश के गोंडा में आखिरी सांस ली, लेकिन अपनी गजलों और अशआर के रूप में वह हमेशा कद्रदानों के बीच जिंदा रहेंगे.

(भाषा से इनपुट)

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