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झारखंड: जवान होता राज्य, बूढ़ी होती उम्मीदें

झारखंड अपनी स्थापना के 16 साल बाद यह गरीब लोगों वाला एक अमीर राज्य है...

Updated On: Nov 18, 2016 02:56 PM IST

Pawas Kumar

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झारखंड: जवान होता राज्य, बूढ़ी होती उम्मीदें

झारखंड देश के ऐसे राज्यों में से है जहां से अभी भी भुखमरी, डायन के नाम पर हत्या और घोर पिछड़ेपन की कहानियां सामने आती हैं.

इस राज्‍य को बने हुए 16 साल हो गए. साल 2000 में जब बिहार के दक्षिणी हिस्से को काटकर झारखंड का निर्माण हुआ था तो माना जा रहा था कि बिहार के उत्तरी भाग से दबा रहा, यह हिस्सा अब तरक्की की उड़ान भरेगा.

इस पर प्रकृति की मेहरबानी थी. 16 साल बाद यह गरीब लोगों वाला एक अमीर राज्य है.

झारखंड में देश की 40 फीसदी खनिज संपदा है. यह देश के कोयला उत्पादन का करीब 40 फीसदी हिस्सा देता है.

यहां लौह अयस्क का 3.7 अरब टन का भंडार है. यह स्थिति तब है, जब यहां कि क्षमता का सही आकलन भी आज तक नहीं हो पाया है.

ऐसे में यह आश्चर्य की बात नहीं कि आर्सेलर मित्तल, टाटा, जिंदल और रुइया जैसे कई बड़े उद्योगपति यहां बिजनेस करने के लिए उत्साहित थे. लेकिन यह पुरानी बात हो चुकी. अब वर्तमान मुख्यमंत्री को बड़े-बड़े समिट कर निवेशकों को बुलाना पड़ रहा है.

उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ से पीछे रह गया झारखंड

साल 2000 में ही छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे दो और राज्य अस्तित्व में आए. प्राकृतिक संसाधनों के मामले में ये दोनों झारखंड के काफी पीछे हैं लेकिन तरक्की में मामले में आगे निकल गए हैं.

झारखंड की तरह छत्तीसगढ़ भी नक्सली समस्या से पीड़ित राज्य है जबकि उत्तराखंड लगातार प्राकृतिक आपदाओं से जूझता रहा है.

2013-14 के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में प्रति व्यक्ति आय 46,131 रुपए है. उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय 1.03 लाख रुपए और छत्तीसगढ़ में 58,547 रुपए है.

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2014-15 में झारखंड में प्रति व्यक्ति आय 52,147 रुपए रही तो उत्तराखंड में यह 1.15 लाख और छत्तीसगढ़ में 64,442 रुपए हो गई.

2014-15 में झारखंड की जीडीपी विकास दर 8.53 फीसदी थी, जबकि उत्तराखंड की विकास दर 9.34 और छत्तीसगढ़ की 5.86 फीसदी रही. इस मामले में झारखंड बिहार से भी पीछे था जिसकी अर्थव्यस्था 9.45 फीसदी से बढ़ रही थी.

राजनीतिक अस्थिरता से परेशान

जब झारखंड बिहार का हिस्सा था तो माना जाता रहा कि इस क्षेत्र का सही विकास न होने का कारण पटना में बैठी सत्ता का सौतेलापन था. लेकिन झारखंड के बन जाने के बाद भी यह सौतेलापन खत्म क्यों नहीं हुआ?

इसका जवाब बिहार से तुलना में ही छुपा है. 2000 में दोनों राज्यों के अलग होने के बाद बिहार में तीन लोग मुख्यमंत्री बने हैं. 2005 से जीतनराम मांझी के कुछ महीनों के छोड़ दें तो नीतीश कुमार लगातार सत्ता में हैं.

16 साल के अपने अस्तित्व में झारखंड ने 10 बार मुख्यमंत्री बदलते देखा. 6 अलग-अलग चेहरे राज्य की सत्ता संभाल चुके हैं. लंबे समय के लिए राष्ट्रपति शासन भी लागू रहा है.

इस दौरान राज्य ने एक निर्दलीय सीएम भी देखा जिसे बाद में करप्शन के आरोप में जेल भी जाना पड़ा.

इसके उलट छत्तीसगढ़ में 2 मुख्यमंत्री हुए हैं. रमन सिंह 2003 से लगातार मुख्यमंत्री हैं. उत्तराखंड में हाल के कुछ वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता रही है लेकिन शुरुआती वर्षों में सत्ता स्पष्ट बहुमत से ही चली.

झारखंड में वर्तमान सीएम रघुवर दास स्पष्ट बहुमत वाले पहले मुख्यमंत्री हैं.

संभावनाएं अपार लेकिन जमीनी हकीकत अलग 

हालांकि झारखंड की समस्याओं की अकेली जड़ राजनीतिक अस्थिरता नहीं है. यहां तक कि अपने शुरुआती दिनों में झारखंड ने अपने साथी राज्यों को पछाड़ते हुए करीब 3 लाख करोड़ रुपए का निवेश प्रस्ताव पाए थे. लेकिन इनमें से अधिकतर प्रस्ताव कागजों में ही रह गए.

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झारखंड के पीछे रह जाने के पीछे एक बड़ा कारण वहां स्पष्ट भूमि अधिग्रहण नीति का नहीं होना रहा. झारखंड में अधिकतर भूमि अधिग्रहणों को स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ा है. कई जगहों पर संभावितों निवेशकों पर हमले भी किए गए.

साल 2008 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के सदस्यों ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया और कई निजी कंपनियों के दफ्तरों में तोड़फोड़ भी की. रोचक बात है कि झामुमो के सुधीर महतो उस समय राज्य के उपमुख्यमंत्री और उद्योग मंत्री थे.

ऐसा नहीं कि सरकारों ने प्रयास नहीं किया है. 2008 में ही राज्य में नई रिहैबिलिटेशन और रिसेटलमेंट पॉलिसी लाई गई थी. इसे भूमि देने वालों के लिहाज से काफी अच्छा माना गया था लेकिन इसके नतीजे खुश करने वाले नहीं रहे.

दरअसल झारखंड में जमीन का मामला केवल राजनीतिक नहीं है. जंगल को लेकर लोगों की संवेदनशीलता अलग है. जंगल में रहने वालों का मानना है कि यह उनकी संपत्ति है.

जहां उद्योगीकरण के पक्षधरों ने इस संवेदनशीलता को समझने की कोशिश नहीं की है, वहीं उनके विरोधियों ने इसका इस्तेमाल राजनीतिक हित और फायदे के लिए किया है.

नक्सलवाद की समस्या ने धकेला पीछे

राज्य में नक्सली समस्या भी विकास की राह में बड़ा रोड़ा है. झारखंड बनने से कुछ दिन पहले लोहरदगा के तत्कालीन एसपी अजय कुमार सिंह की हत्या जैसी घटनाओं ने संकेत दे दिया था कि यह इस नए राज्य के लिए बड़ा खतरा होगी.

राज्य के कई हिस्सों में माओवादी संगठनों का प्रभुत्व है. यहां छोटे-बड़े बिजनेसमैन से लेवी वसूली होती है. माओवादी सरकारी योजनाओं और कार्यकर्मों का विरोध करते हैं.

वह पक्की सड़कें नहीं बनने देना चाहते क्योंकि इससे सुरक्षाबलों को मदद मिलेगी. गांवों से बच्चे उठा लिए जा रहे हैं क्योंकि उन्हें माओवादी बनाया जा सके. बैंक-स्कूल संगीनों के साये में या माओवादियों की मर्जी से चलते हैं. जब-तब चक्काजाम और बंद की घोषणा होती है.

मेरे शहर गुमला में आए दिन होने वाले बंद के कारण व्यापारियों ने अपनी साप्ताहिक बंदी ही खत्म कर दी. अब दुकानें सिर्फ माओवादियों के घोषित बंद के दिन बंद होती है. ऐसे माहौल में विकास कैसे होगा?

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एक बड़ी समस्या छुटभैये माओवादियों की हैं. ये अपराधी हैं जो ‘पार्टी’ के नाम पर लोगों को धमकाकर पैसे वसूलते हैं. इनका किसी विचारधारा से लेना-देना नहीं हैं. इनके कारण छोटे-मोटे व्यापारियों से लेकर आम जनता भी परेशान है.

झारखंड की कहानी विरोधाभासों का अद्भुत मेल है. एक राज्य जहां प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है, वहां जनता सबसे गरीब भारतीय नागरिकों में है. जहां निवेश की अपार संभावनाएं हैं, वहां से व्यापार का पलायन हो रहा है.

झारखंड में फिलहाल एक स्थिर सरकार है. पूरा बहुमत है. मुख्यमंत्री रघुबर दास उग्रवाद और अपराध मुक्त झारखंड बनाने का दावा कर रहे हैं. वह निवेशकों को लुभाने के लिए मुंबई में समिट कर रहे हैं.

लेकिन उनके सामने कई चुनौतियां भी हैं. उन्हें आदिवासी-गैर आदिवासी की खाई को पाटना होगा. राज्य में व्यापक भ्रष्टाचार को खत्म करना होगा. भूमि अधिग्रहण को लेकर एक ऐसी नीति बनानी होगी जिससे उद्योगों और लोगों दोनों को फायदा हो सके.

झारखंड में माद्दा है कि वह न केवल दुनिया में तेजी से उभर रही अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत कर सके बल्कि इस उभार का नेतृत्व भी कर सके. उम्मीद है कि 2 साल बाद जब झारखंड वयस्क होगा तो हालात अलग होंगे.

आंकड़ों का स्रोत: statisticstimes.com

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