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झारखंड: सामाजिक डर से नवजात बच्चों को बेसहारा कर रही माएं

झारखंड में ऐसी कई सिंगल मदर हैं, जो सामाजिक कलंक से मिलने वाले उत्पीड़न से बचने के डर से बच्चे को त्याग देती हैं

Updated On: Jun 08, 2018 04:36 PM IST

Kelly Kislaya

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झारखंड: सामाजिक डर से नवजात बच्चों को बेसहारा कर रही माएं

गुरुग्राम के सिविल अस्पताल में झारखंड के गुमला जिले की 18 साल की अनिता (बदला हुआ नाम) ने 31 मई को सुंदर बच्ची को जन्म दिया. अनिता बच्ची को स्तनपान कराने को तो तैयार हो गई, लेकिन उसने नवजात का पालन-पोषण करने से इनकार कर दिया.

गुरुग्राम के एक घर में अनिता का रेप हुआ और वो गर्भवती हो गई. आरोपी उसी घर में रसोइया था, जहां अनिता काम करती थी. अनिता के गर्भवती होने का पता चलते ही आरोपी भाग गया. अनिता को उसका मालिक अस्पताल लेकर आया था. मालिक ने ही आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई. बच्ची होने के बाद अनिता ने उसका चेहरा देखने तक से इनकार कर दिया. उनसे कहा, 'मैं उसे अपनाना नहीं चाहती हूं. मेरे गांव में लोग क्या कहेंगे? मेरी कभी शादी नहीं होगी.' झारखंड मे अनिता उन कई सिंगल मदर में से एक है, जो सामाजिक कलंक से मिलने वाले उत्पीड़न से बचने के डर से बच्चे को त्याग देती हैं.

इस साल अब तक 27 बच्चों को परित्यक्त किया जा चुका है

शिशु हत्या और बच्चों को त्यागने के खिलाफ काम करने वाले एनजीओ अशरयानी फाउंडेशन की ‘पाल लो ना’ पहल के तहत जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक 2016 से लेकर इस साल मई तक 121 बच्चों का परित्याग किया गया. इनमें से 63 की मौत हो गई. 2016 में जहां 29 बच्चों को छोड़ा गया था, वहीं 2017 में ये आंकड़ा बढ़कर 65 पर पहुंच गया. इस साल मई तक परित्यक्त बच्चों की संख्या 27 थी. हालांकि ये आंकड़े सड़क किनारे या दूसरी जगहों पर छोड़े हुए बच्चों के हैं. राज्य में ऐसे मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं, जिनमें माताएं अपने बच्चों को दूसरों को गोद देने के लिए सरेंडर कर रही हैं.

रांची स्थित बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी ) के सदस्य श्रीकांत कुमार कहते हैं, 'औसतन हमें हर महीने तीन से चार ऐसे मामले मिल जाते हैं, जिनमें माताएं अपने बच्चों को दूसरों को गोद देना चाहती हैं.' परित्यक्त बच्चों के अधिकतर मामलों में माताओं का विवाह नहीं हुआ है. बच्चे का जन्म या तो रेप या फिर प्यार में विफलता का परिणाम है.

महिलाओं के साथ काम करने वाले स्थानीय एनजीओ दिया सेवा संस्थान की सीता स्वांसी ने बताया, 'मेरे सामने कई ऐसे मामले आए हैं, जिनमें महिलाएं अपने बच्चों को सरेंडर करना चाहती हैं. अधिकतर मामलों में बच्चों का जन्म या तो रेप या फिर प्रेम प्रसंग की वजह से हुआ है, जहां लड़की का प्रेमी बच्चे और माता को अपनाने से मना कर देता है.' उन्होंने कहा, 'ऐसे भी मामले हैं जिनमें महिलाओं की तस्करी कर उन्हें राज्य से बाहर ले जाया गया, जहां उनका रेप हुआ और वो गर्भवती हो गईं. जब वो घर लौटीं तो समाज के डर से बाध्य होकर उन्हें अपने बच्चों को छोड़ना पड़ा.'

सामान्य जिंदगी में नकारे जाने के डर से बच्चे को नहीं अपनाती

श्रीकांत कहते हैं कि कई मामलों में माताओं ने अपने मन से बच्चों का सरेंडर नहीं किया, बल्कि अभिभावकों ने उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया. उन्होंने कहा, 'ऐसा अक्सर 14 से 17 साल की नाबालिग लड़कियों के साथ होता है. ऐसी माताओं के परिजनों का कहना है कि बच्चा उनकी बेटी के लिए भार बन जाएगा और वो सामान्य जिंदगी नहीं जी पाएगी.' उनके मुताबिक, 'यहां तक कि जब लड़की बच्चे को पालने के लिए तैयार है, तब भी उनके माता-पिता बच्चे को छोड़ने के लिए उसे बाध्य करते हैं क्योंकि इससे उसकी शादी में दिक्कत होगी.'

स्वांसी ने एक घटना का उदाहरण दिया, जहां समाज के दबाव के कारण लड़की को अपना बच्चा छोड़ना पड़ा. उन्होंने बताया, 'माता-पिता ने लड़की को बच्चा छोड़ने के लिए मजबूर किया क्योंकि वह विवाह से पैदा हुआ था. मैं उस लड़की को परामर्श दे रही थी, जब उसके बच्चे के साथ दूसरी महिला कमरे में आई. लड़की एक बार उस बच्चे को गोद में लेने के लिए बेताब थी. मैं उसकी आंखों में अपने बच्चे को खोने का दर्द देख सकती थी.'

स्वांसी ने कहा, जब तक लोग पीड़ित का अपमान करना नहीं छोड़ेंगे, ऐसी घटनाएं सामने आती रहेंगी. उन्होंने कहा, 'परिजन पीड़ित को अपमानित करने लगते हैं; ऐसे में उसके पास बच्चे को त्यागने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता, भले ही वो इसके लिए तैयार नहीं हो. लोगों को अब यह समझ मे आ जाना चाहिए कि लड़की अपनी गलती से गर्भवती नहीं होती है. अगर लड़की का परिवार मदद करे तो वह कभी भी अपने बच्चे को नही छोड़ेगी.'

हालांकि, श्रीकांत इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि ऐसे भी मामले हैं, जिनमें सीडब्ल्यूसी के सदस्यों के परामर्श के बाद मां और उसके परिजन बच्चे को पालने के लिए तैयार हो गए.

लेकिन, वहीं लोग सीडब्ल्यूसी से संपर्क करते हैं, जिन्हें बच्चा सरेंडर करने की प्रक्रिया के बारे में पता है. जो लोग इस प्रावधान से वाकिफ नहीं हैं और अपनी पहचान उजागर करने के लिए तैयार नहीं हैं, वो बच्चों को सड़क किनारे छोड़कर चले जाते हैं. स्वांसी कहती हैं, 'कई महिलाएं हैं, जो दूरदराज के इलाकों से आती हैं और उन्हें बच्चों को सरेंडर करने का नियम पता नहीं होता है. बिना विवाह के बच्चा पैदा होने के सामाजिक कलंक के डर से वो अपने नवजात शिशुओं का त्याग कर देती हैं.'

बस 50 फीसदी बच्चे रह पाते हैं जिंदा

श्रीकांत कहते हैं कि सड़क किनारे छोड़े गए बच्चों में से 50 फीसदी ही जीवित रह पाते हैं. ऐसे बच्चों को जिंदा रखने के लिए सीडब्ल्यूसी ने अडॉप्शन सेंटरों को अपने घर के आगे क्रेच खोलने का निर्देश दिया है, जहां महिलाएं आ सकती हैं और सड़क पर बच्चों को छोड़ने के बजाए यहां छोड़ सकती हैं.

श्रीकांत के मुताबिक, ऐसे मामलों में जहां सीडब्ल्यूसी परित्यक्त बच्चों को बचाती हैं, वहां स्थानीय अखबारों में विज्ञापन दिया जाता है और दो महीने तक कानूनी अभिभावक के आने और बच्चे पर दावे का इंतजार किया जाता है. अगर इस दौरान कोई नहीं आता है तो सीडब्ल्यूसी उसे कानूनी रूप से गोद लेने के योग्य करार देकर अडॉप्शन होम को सौंप देती है.

पाल लो ना की संयोजक मोनिका गुंजन आर्या 2015 से ही माओं द्वारा बच्चों को छोड़ने के खिलाफ सक्रियता से अभियान चला रही हैं. वो मीडिया, प्रदर्शनी और नुक्कड़ नाटक के जरिए जागरूकता फैला रही हैं. उन्होंने कहा, 'नवजात बच्चों को त्यागने की घटनाएं रोकने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है. जागरूक लोग इस बारे में उन लोगों को बताएंगे जिन्हें बच्चा सरेंडर करने की नीति के बारे में पता नहीं है, जिससे बच्चे की जान बचाई जा सकती है.'

आर्या इस मामले में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाती हैं. आर्या इस ओर इशारा करती हैं कि 2016 में आईपीसी की धारा 315 (शिशु हत्या) और 317 (बच्चे को त्यागना और उसे आश्रयविहीन करना) के तहत एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया.

उन्होंने कहा, 'एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2016 में शिशु हत्या और बच्चे को त्यागने व आश्रयविहीन करने का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ, जबकि सीडब्ल्यूसी के पास ऐसे कई मामले आए. मेरे पास भी ऐसे मामलों के एकत्र किए गए आंकड़े हैं.'

आर्या ने कहा कि जब तक पुलिस ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करने की शुरुआत नहीं करती है, ऐसे मामले सामने नहीं आएंगे और कभी भी इन्हें समस्या नहीं माना जाएगा. उन्होंने कहा, 'जब एफआईआर दर्ज होती है तो जांच करना जरूरी है और इससे बच्चों को त्यागने के पीछे की असली वजह खोजी जा सकती है. एक बार जब हम समस्या की जड़ तक पहुंच जाएंगे, तब हम इसे मिटा पाएंगे.'

(लेखक बेंगलुरु स्थित स्टार्ट-अप न्यूजकार्ट के सदस्य हैं)

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